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बार-बार शारीरिक संबंध बनाना सहमति का सबूत नहीं, मद्रास हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी महिला के साथ बार-बार शारीरिक संबंध बनने मात्र से कानूनन यह नहीं माना जा सकता कि संबंध पूरी तरह उसकी स्वतंत्र और वैध सहमति से थे। अदालत ने धोखे, जबरदस्ती और ब्लैकमेल के दोषी टी. कासी उर्फ सूजी की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए यह महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है।

यह मामला कन्याकुमारी जिले के वर्ष 2020 का है, जहां आरोपी टी. कासी उर्फ सूजी पर कई महिलाओं को प्यार और शादी का झूठा झांसा देकर उनका यौन शोषण करने और उनकी अंतरंग तस्वीरों एवं वीडियो के जरिए लाखों रुपये ऐंठने का आरोप था। नागरकोइल की फास्ट ट्रैक महिला अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए प्राकृतिक मृत्यु तक उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ आरोपी ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।
न्यायमूर्ति एन. आनंद वेंकटेश और न्यायमूर्ति के. के. रामकृष्णन की खंडपीठ ने आरोपी की अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि इस मामले के सबूतों से साफ है कि पीड़ित महिला का आचरण स्वतंत्र इच्छा से नहीं, बल्कि आरोपी द्वारा रचे गए जाल और ब्लैकमेलिंग के डर के कारण था। कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को रोमांस फ्रॉड और धोखे व जबरदस्ती से किए गए बलात्कार की श्रेणी में रखा।
मद्रास हाई कोर्ट की खंडपीठ ने सहमति के सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करते हुए अपने फैसले में दर्ज किया:
केवल यह तथ्य कि पीड़िता आरोपी के साथ बार-बार शारीरिक निकटता में थी, अपने आप में यह साबित नहीं करता कि संबंध सहमति से थे। कानून की नजर में वैध सहमति होने के लिए यह देखना जरूरी है कि क्या वहां स्वतंत्र और सूचित चयन की स्थिति थी, या फिर वह सहमति जबरदस्ती, धोखे और डराने-धमकाने के कारण दी गई थी।
जस्टिस के. के. रामकृष्णन द्वारा लिखे गए इस फैसले में आगे कहा गया:
अदालतों को दोनों पक्षों के पूरे आचरण, रिश्ते की शुरुआत और आरोपी की असली मंशा की गहन जांच करनी होगी, ताकि यह तय हो सके कि संबंध वास्तविक प्रेम पर आधारित था या केवल एक सुनियोजित धोखा था।
इसी मामले में न्यायमूर्ति एन. आनंद वेंकटेश ने डिजिटल युग में बढ़ रहे इस खतरे पर युवाओं और विशेष रूप से युवतियों को चेतावनी देते हुए कहा:
चाहे भरोसा कितना भी गहरा हो या गोपनीयता का वादा कितना भी मजबूत क्यों न लगे, अंतरंग तस्वीरों या वीडियो को कभी भी डिजिटल माध्यमों से साझा नहीं किया जाना चाहिए। एक बार जब ऐसी सामग्री नियंत्रण से बाहर हो जाती है, तो इसका आसानी से दुरुपयोग किया जा सकता है, जिससे पीड़िता की निजता और मानसिक स्वास्थ्य को अपूरणीय क्षति पहुंचती है। भरोसे का एक गलत पल जीवन भर की पीड़ा नहीं बनना चाहिए।
