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कमाई नहीं तो माता-पिता देंगे खर्च! मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, अविवाहित बेटी को मिलेगा भरण-पोषण
9 जुलाई 2026 के आदेश में न्यायमूर्ति द्वारका धीश बंसल ने कहा- यदि वयस्क अविवाहित बेटी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं है तो माता-पिता उसका भरण-पोषण करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं।
Sonali16 जुल. 2026, 02:17 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई वयस्क अविवाहित बेटी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं है और अपनी आजीविका स्वयं चलाने में सक्षम नहीं है, तो वह अपने माता-पिता से भरण-पोषण (Maintenance) पाने की कानूनी हकदार है। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस अधिकार के लिए बेटी का दिव्यांग होना आवश्यक नहीं है।
यह फैसला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ के न्यायमूर्ति द्वारका धीश बंसल ने 9 जुलाई 2026 को सुनाया। अदालत ने सतना फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पिता गंगा सिंह को अपनी अलग रह रही अविवाहित बेटी रक्षा सिंह को अंतरिम भरण-पोषण के रूप में प्रति माह 2,000 रुपये देने का निर्देश दिया गया था।
क्या था मामला?
मामला सतना जिले का है, जहां रक्षा सिंह ने अपने पिता गंगा सिंह से भरण-पोषण की मांग करते हुए फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी। फैमिली कोर्ट ने बेटी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए पिता को हर महीने 2,000 रुपये अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश दिया।
इस आदेश को चुनौती देते हुए गंगा सिंह ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर की। पिता की ओर से दलील दी गई कि चूंकि उनकी बेटी बालिग है और दिव्यांग भी नहीं है, इसलिए वह हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 (Hindu Adoptions and Maintenance Act - HAMA) के तहत भरण-पोषण की हकदार नहीं है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति द्वारका धीश बंसल ने पिता की इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 20(3) स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करती है कि यदि कोई अविवाहित पुत्री अपनी आय या संपत्ति से अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है, तो उसके माता-पिता पर उसके भरण-पोषण की कानूनी जिम्मेदारी बनी रहती है।
अदालत ने कहा कि कानून का उद्देश्य केवल नाबालिग बच्चों की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसी अविवाहित बेटियों को भी संरक्षण देना है जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हैं। इसलिए केवल बालिग होने के आधार पर भरण-पोषण का अधिकार समाप्त नहीं किया जा सकता।
कानून क्या कहता है?
हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 20(3) के अनुसार, यदि कोई अविवाहित पुत्री अपनी आय या संपत्ति से स्वयं का पालन-पोषण करने में सक्षम नहीं है, तो उसके माता-पिता का यह कानूनी दायित्व है कि वे उसके भरण-पोषण और आवश्यक जरूरतों की व्यवस्था करें। अदालत ने इसी कानूनी प्रावधान के आधार पर फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराया।
फैसले का महत्व
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का यह फैसला उन हजारों अविवाहित बेटियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो शिक्षा, बेरोजगारी या अन्य कारणों से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हैं। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि माता-पिता अपनी आर्थिक रूप से निर्भर अविवाहित बेटी के भरण-पोषण से केवल इस आधार पर इनकार नहीं कर सकते कि वह बालिग हो चुकी है। यदि वह स्वयं अपना जीवनयापन करने में सक्षम नहीं है, तो उसे कानून के तहत भरण-पोषण का अधिकार प्राप्त रहेगा।
मामले का विवरण
* न्यायालय: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर पीठ
* न्यायाधीश: न्यायमूर्ति द्वारका धीश बंसल
* आदेश की तारीख: 9 जुलाई 2026
* मामला: गंगा सिंह बनाम रक्षा सिंह (सतना फैमिली कोर्ट के आदेश के विरुद्ध याचिका)
* प्रमुख कानून: हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 20(3)
