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57% महिलाएं एनीमिया की चपेट में, सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत क्या है?

भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक एनीमिया (खून की कमी) बनी हुई है। सरकार की ओर से आयरन-फोलिक एसिड (IFA) सप्लीमेंट, पोषण अभियान और एनीमिया मुक्त भारत जैसे कार्यक्रम चलाए जाने के बावजूद बड़ी संख्या में महिलाएं अब भी आयरन की कमी से प्रभावित हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार देश में 15 से 49 वर्ष की करीब 57 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं, वहीं गर्भवती महिलाओं में भी यह समस्या गंभीर बनी हुई है।

Vindhya Dubey20 जुल. 2026, 09:58 PM IST
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57% महिलाएं एनीमिया की चपेट में, सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत क्या है?

गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के शरीर को अधिक आयरन की जरूरत होती है क्योंकि मां के शरीर में बढ़ते भ्रूण के विकास के लिए अतिरिक्त खून बनता है। आयरन की कमी होने पर महिलाओं में कमजोरी, थकान, चक्कर आना जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। गंभीर एनीमिया की स्थिति में समय से पहले प्रसव, कम वजन वाले बच्चे का जन्म और प्रसव संबंधी जटिलताओं का खतरा भी बढ़ जाता है। इसी को देखते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय ने गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच, आयरन-फोलिक एसिड टैबलेट वितरण और एनीमिया की पहचान पर जोर दिया है।


सरकार ने साल 2018 में एनीमिया मुक्त भारत अभियान (Anemia Mukt Bharat) की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य बच्चों, किशोरियों, गर्भवती महिलाओं और प्रजनन आयु वर्ग की महिलाओं में एनीमिया की समस्या को कम करना है। इस अभियान के तहत स्वास्थ्य केंद्रों, स्कूलों और आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से आयरन और फोलिक एसिड की गोलियां उपलब्ध कराई जाती हैं। साथ ही हीमोग्लोबिन जांच, पोषण संबंधी सलाह और गंभीर मामलों में उपचार की व्यवस्था भी की जाती है। किशोरियों में एनीमिया को रोकने के लिए सरकार साप्ताहिक आयरन-फोलिक एसिड सप्लीमेंटेशन (WIFS) कार्यक्रम चला रही है। इसके तहत स्कूल जाने वाली किशोरियों को नियमित रूप से आयरन की गोलियां दी जाती हैं, जबकि स्कूल से बाहर रहने वाली किशोरियों को आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से जोड़ा जाता है। किशोरावस्था में एनीमिया का असर सिर्फ वर्तमान स्वास्थ्य पर नहीं पड़ता, बल्कि भविष्य में गर्भावस्था के दौरान भी जोखिम बढ़ सकता है।


महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के पोषण अभियान के जरिए महिलाओं और बच्चों में पोषण सुधारने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को पोषण संबंधी सलाह, टेक-होम राशन और स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने का प्रयास किया जाता है। सरकार का फोकस अब सिर्फ आयरन की गोली उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि खान-पान में बदलाव और पोषण जागरूकता बढ़ाने पर भी है। हालांकि, योजनाओं के बावजूद एनीमिया की समस्या कम नहीं होने के पीछे कई कारण हैं। कई महिलाएं आयरन की गोलियां नियमित रूप से नहीं ले पातीं क्योंकि इससे उन्हें पेट दर्द, कब्ज या अन्य परेशानियां महसूस होती हैं। इसके अलावा भोजन में आयरन युक्त पदार्थों की कमी, स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच और जागरूकता की कमी भी बड़ी वजहें हैं।


महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में एनीमिया कम करने के लिए स्वास्थ्य विभाग और महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। अब चुनौती यह है कि आयरन सप्लीमेंट और पोषण योजनाओं की पहुंच के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित किया जाए कि महिलाएं इनका सही तरीके से उपयोग करें और उन्हें पर्याप्त पोषण मिल सके। महिलाओं में एनीमिया को खत्म करने के लिए नियमित हीमोग्लोबिन जांच, आयरन सप्लीमेंट का लगातार सेवन, बेहतर खान-पान और जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी सबसे जरूरी कदम माने जा रहे हैं। महिलाओं का स्वास्थ्य बेहतर होगा तभी आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य में भी सुधार संभव होगा।