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पुरुषों से अलग क्यों होता है महिलाओं में अस्थमा का असर? विशेषज्ञों ने बताए अहम कारण

नई मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं में अस्थमा पुरुषों की तुलना में अधिक गंभीर हो सकता है। हार्मोनल बदलाव, गर्भावस्था, मेनोपॉज, मोटापा और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच इसके प्रमुख कारण हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि महिलाओं के लिए उनकी उम्र और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार व्यक्तिगत उपचार योजना बनाई जानी चाहिए, जिससे गंभीर अटैक और अस्पताल में भर्ती होने के मामलों को कम किया जा सके।

Vindhya Dubey29 जुल. 2026, 02:10 PM IST
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पुरुषों से अलग क्यों होता है महिलाओं में अस्थमा का असर? विशेषज्ञों ने बताए अहम कारण
अस्थमा दुनिया की सबसे आम दीर्घकालिक श्वसन बीमारियों में से एक है। इसमें सांस की नलियों में सूजन और सिकुड़न आ जाती है, जिससे सांस लेने में कठिनाई, सीने में जकड़न, घरघराहट और लगातार खांसी जैसी समस्याएं होती हैं। हालांकि अस्थमा किसी भी उम्र और लिंग के लोगों को प्रभावित कर सकता है, लेकिन हाल के वर्षों में हुए शोध बताते हैं कि वयस्क महिलाओं में यह बीमारी पुरुषों की तुलना में अधिक गंभीर रूप ले सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि हार्मोनल बदलाव, पर्यावरणीय कारक, मोटापा, मानसिक तनाव और स्वास्थ्य सेवाओं तक असमान पहुंच इसके प्रमुख कारण हैं।

क्या कहती है नई रिपोर्ट?
महिलाओं में अस्थमा को केवल एक सामान्य श्वसन रोग के रूप में नहीं देखा जा सकता। किशोरावस्था, मासिक धर्म, गर्भावस्था और रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज) के दौरान होने वाले हार्मोनल बदलाव अस्थमा के लक्षणों और उसकी गंभीरता को प्रभावित करते हैं। कई महिलाओं में मासिक धर्म से पहले या उसके दौरान अस्थमा के दौरे अधिक गंभीर हो सकते हैं, जबकि गर्भावस्था के दौरान कुछ महिलाओं में लक्षण बढ़ जाते हैं और कुछ में कम हो जाते हैं। इसलिए महिलाओं के लिए व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार उपचार योजना बनाना आवश्यक माना जा रहा है।

महिलाओं में अस्थमा अधिक गंभीर क्यों हो सकता है?
विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई कारण एक साथ काम करते हैं। एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन फेफड़ों की वायुमार्गों में सूजन और प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। वयस्क महिलाओं में गंभीर अस्थमा के दौरे, अस्पताल में भर्ती होने की संभावना और जीवन की गुणवत्ता पर प्रभाव पुरुषों की तुलना में अधिक देखा गया है। हालिया अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण में भी पाया गया कि महिलाओं में गंभीर अस्थमा अटैक का वार्षिक जोखिम अधिक होता है, भले ही पिछले वर्ष उन्हें बड़ा अटैक न आया हो।

भारत में स्थिति कितनी गंभीर है?
भारत दुनिया में अस्थमा के सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल है। अनुमान है कि देश में लगभग 3.5 करोड़ लोग अस्थमा से पीड़ित हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बड़ी संख्या में मरीजों का समय पर सही निदान नहीं हो पाता। कई लोग इनहेलर का नियमित उपयोग नहीं करते या बीमारी को सामान्य एलर्जी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की महिलाओं को समय पर विशेषज्ञ इलाज और जांच की सुविधा भी कम मिल पाती है।

इलाज में सबसे बड़ी कमियां
रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं की स्वास्थ्य जरूरतों को ध्यान में रखकर अस्थमा का उपचार अभी भी पर्याप्त रूप से नहीं किया जाता। गर्भावस्था के दौरान कई महिलाएं दवा लेने से डरती हैं, जबकि डॉक्टर की सलाह से अधिकांश इनहेलर सुरक्षित रूप से उपयोग किए जा सकते हैं। इसके अलावा मानसिक तनाव, घरेलू वायु प्रदूषण, रसोई के धुएं, तंबाकू के धुएं और मोटापे जैसे जोखिम कारकों पर भी पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। विशेषज्ञों का कहना है कि महिलाओं के लिए नियमित फेफड़ों की जांच, व्यक्तिगत उपचार योजना और समय-समय पर दवा की समीक्षा आवश्यक है।

अस्थमा के सामान्य लक्षण
अस्थमा में बार-बार खांसी आना, सांस फूलना, सीने में जकड़न महसूस होना, घरघराहट की आवाज आना और रात या सुबह के समय लक्षण बढ़ जाना आम संकेत हैं। यदि ये लक्षण बार-बार दिखाई दें तो विशेषज्ञ चिकित्सक से जांच कराना जरूरी है। समय पर इलाज न मिलने पर गंभीर अटैक जानलेवा भी हो सकता है।

यह रिपोर्ट क्यों महत्वपूर्ण है?
यह रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि महिलाओं में अस्थमा के इलाज के लिए "एक जैसा उपचार सभी पर लागू" वाला तरीका पर्याप्त नहीं है। महिलाओं के जीवन के अलग-अलग चरणों, हार्मोनल बदलावों और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर इलाज की रणनीति बनाई जाए तो बीमारी को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है। इससे अस्पताल में भर्ती होने के मामलों, गंभीर अटैक और बीमारी से होने वाली जटिलताओं को कम किया जा सकता है।

क्या हैं इसके संभावित लाभ?
यदि महिलाओं के लिए व्यक्तिगत अस्थमा प्रबंधन अपनाया जाए तो बीमारी पर बेहतर नियंत्रण, जीवन की गुणवत्ता में सुधार, गर्भावस्था के दौरान मां और शिशु दोनों के लिए बेहतर स्वास्थ्य, अस्पताल में भर्ती होने की कम जरूरत, दवाओं का सही उपयोग और समय पर उपचार संभव हो सकेगा। साथ ही जागरूकता बढ़ने से मरीज इनहेलर और नियमित जांच को लेकर फैली गलतफहमियों से भी बाहर निकल सकेंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि अस्थमा एक नियंत्रित की जा सकने वाली बीमारी है, बशर्ते समय पर पहचान, सही दवाएं, नियमित फॉलो-अप और मरीज की व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार उपचार उपलब्ध कराया जाए। महिलाओं में अस्थमा की अलग प्रकृति को समझना भविष्य में बेहतर स्वास्थ्य नीति और प्रभावी उपचार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।