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बच्चा पैदा होने के बाद भी मां को खतरा, प्रसवोत्तर रक्तस्राव से हजारों महिलाओं की मौत
बच्चे का जन्म किसी महिला के लिए गर्भावस्था की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया का अंत माना जाता है, लेकिन चिकित्सकीय रूप से प्रसव के साथ मां का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं होता। बच्चे के जन्म के बाद होने वाला अत्यधिक रक्तस्राव यानी प्रसवोत्तर रक्तस्राव मातृ मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल है। यह ऐसी गंभीर प्रसूति आपातस्थिति है, जिसमें महिला की हालत बहुत कम समय में बिगड़ सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के पुराने वैश्विक अनुमानों में हर साल लगभग 70 हजार मातृ मौतों को प्रसवोत्तर रक्तस्राव से जोड़ा गया था। हालांकि, नए वैश्विक अनुमानों में यह संख्या कम हुई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2025 में वर्ष 2023 के लिए लगभग 45 हजार मातृ मौतों को प्रसवोत्तर रक्तस्राव से जोड़ा, जबकि 2026 में प्रकाशित नए वैश्विक अनुमान में हर साल करीब 43 हजार महिलाओं की मौत इस कारण से होने की बात सामने आई। आंकड़ों में बदलाव के बावजूद प्रसवोत्तर रक्तस्राव आज भी दुनिया में मातृ मृत्यु का एक प्रमुख और काफी हद तक रोका जा सकने वाला कारण बना हुआ है।

दुनिया में हर साल लाखों महिलाएं गर्भावस्था और प्रसव से जुड़ी जटिलताओं का सामना करती हैं और कई मामलों में ये स्थितियां जानलेवा साबित होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के नवीनतम वैश्विक अनुमान के अनुसार, 2023 में लगभग 2.60 लाख महिलाओं की मृत्यु गर्भावस्था, प्रसव या उससे संबंधित कारणों से हुई। यानी औसतन हर दो मिनट में एक महिला की मातृ मृत्यु हुई। इसी वर्ष वैश्विक मातृ मृत्यु अनुपात 1 लाख जीवित जन्मों पर 197 था। हालांकि 2000 के मुकाबले इसमें महत्वपूर्ण गिरावट आई है, लेकिन यह अभी भी संयुक्त राष्ट्र के 2030 के लक्ष्य 70 से काफी अधिक है। इन मातृ मौतों में प्रसवोत्तर रक्तस्राव यानी Postpartum Haemorrhage एक प्रमुख और काफी हद तक रोकी जा सकने वाली वजह है। WHO के अक्टूबर 2025 के नवीनतम अपडेट के अनुसार, 2023 में लगभग 45,000 मातृ मौतें PPH से जुड़ी थीं। यह उस वर्ष हुई कुल मातृ मौतों का लगभग 17 प्रतिशत है। इससे स्पष्ट होता है कि बच्चे के जन्म के बाद होने वाला अत्यधिक रक्तस्राव केवल प्रसूति संबंधी जटिलता नहीं बल्कि वैश्विक मातृ मृत्यु को कम करने के प्रयासों में एक बड़ी चुनौती है।
हालांकि PPH से होने वाली मौतों के आंकड़े को लेकर अलग-अलग वर्षों और अध्ययनों में अंतर दिखाई देता है। WHO की पहले की सामग्री में हर साल करीब 70,000 मातृ मौतों का अनुमान दिया गया था, जबकि 2025 के WHO अपडेट में यह संख्या करीब 45,000 बताई गई। इसके अलावा जून 2026 में WHO ने एक नए Lancet Series का हवाला देते हुए बताया कि प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव लगभग 2.7 करोड़ महिलाओं को प्रभावित करता है और इससे हर साल करीब 43,000 महिलाओं की मृत्यु होती है। इसलिए वर्तमान न्यूज़ रिपोर्ट में नवीनतम 2025–2026 अनुमान का इस्तेमाल करना अधिक उचित होगा। मातृ मृत्यु के व्यापक आंकड़ों को देखें तो 2023 में दुनिया की लगभग 92 प्रतिशत मातृ मौतें निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले देशों में हुईं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि मातृ मृत्यु केवल चिकित्सकीय समस्या नहीं है, बल्कि समय पर स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता, रक्त और आपातकालीन उपचार की सुविधा तथा मजबूत रेफरल व्यवस्था से भी सीधे जुड़ी हुई है।
भारत जैसे बड़े देश के लिए यह आंकड़े इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि मातृ मृत्यु कम करने की दिशा में प्रगति के बावजूद प्रसव के दौरान और प्रसव के बाद होने वाली आपातस्थितियों को तेजी से पहचानना और उनका उपचार करना जरूरी है। PPH के मामले में समय पर ऑक्सीटोसिन जैसी आवश्यक दवाओं की उपलब्धता, रक्त और रक्त अवयवों तक तत्काल पहुंच, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की मौजूदगी तथा जरूरत पड़ने पर उच्च स्तरीय अस्पताल में तत्काल रेफरल महिला की जान बचाने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
क्या है प्रसवोत्तर रक्तस्राव
प्रसवोत्तर रक्तस्राव का सामान्य अर्थ बच्चे के जन्म के बाद असामान्य या अत्यधिक रक्तस्राव से है। यह सामान्य प्रसव के बाद भी हो सकता है और सिजेरियन यानी शल्य प्रसव के बाद भी। यह प्रसव के तुरंत बाद शुरू हो सकता है और कई मामलों में प्रसव के बाद की अवधि में भी अत्यधिक रक्तस्राव की समस्या सामने आ सकती है। प्रसव के बाद कुछ मात्रा में रक्तस्राव सामान्य होता है। इसे सामान्य प्रसवोत्तर रक्तस्राव या lochia के रूप में देखा जाता है, जो समय के साथ कम होता जाता है और उसका स्वरूप भी बदलता है। लेकिन जब रक्तस्राव असामान्य रूप से ज्यादा हो, तेजी से बढ़ रहा हो या महिला की शारीरिक स्थिति बिगड़ने लगे, तो इसे सामान्य प्रसवोत्तर रक्तस्राव मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
गर्भाशय का सिकुड़ना क्यों है सबसे महत्वपूर्ण
प्रसवोत्तर रक्तस्राव का सबसे सामान्य कारण गर्भाशय का बच्चे के जन्म के बाद पर्याप्त रूप से सिकुड़ न पाना है। चिकित्सा भाषा में इसे uterine atony कहा जाता है। गर्भावस्था के दौरान गर्भाशय काफी बड़ा हो जाता है और उसमें गर्भनाल के जरिए बच्चे तक रक्त पहुंचाने वाली रक्त वाहिकाओं का व्यापक नेटवर्क विकसित होता है। बच्चे और गर्भनाल के बाहर आने के बाद गर्भनाल जहां गर्भाशय से जुड़ी थी, उस स्थान पर रक्त वाहिकाएं खुली रहती हैं। सामान्य स्थिति में बच्चे के जन्म के बाद गर्भाशय सिकुड़ता है। गर्भाशय की मांसपेशियों का यह संकुचन रक्त वाहिकाओं को दबाने में मदद करता है और रक्तस्राव धीरे-धीरे नियंत्रित होने लगता है। लेकिन यदि गर्भाशय पर्याप्त रूप से सिकुड़ नहीं पाता, तो रक्त वाहिकाओं पर पर्याप्त दबाव नहीं बनता और तेजी से रक्तस्राव जारी रह सकता है।
किन कारणों से हो सकता है अत्यधिक रक्तस्राव
प्रसवोत्तर रक्तस्राव के कारणों को समझना उपचार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसका एक प्रमुख कारण गर्भाशय की शिथिलता है, लेकिन इसके अलावा कई अन्य कारण भी हो सकते हैं। प्रसव के दौरान गर्भाशय, गर्भाशय ग्रीवा या योनि में चोट लगने से रक्तस्राव हो सकता है। कभी-कभी प्रसव के बाद गर्भनाल या गर्भनाल के कुछ हिस्से गर्भाशय के अंदर रह जाते हैं। इसे retained placental tissue कहा जाता है। ऐसी स्थिति में गर्भाशय ठीक से सिकुड़ नहीं पाता और रक्तस्राव जारी रह सकता है। इसके अलावा गर्भाशय के अंदर रक्त जमा होना, गर्भाशय का उलट जाना यानी uterine inversion और रक्त के थक्के बनने की प्रक्रिया में गड़बड़ी भी गंभीर रक्तस्राव का कारण बन सकती है। इसलिए प्रसवोत्तर रक्तस्राव में उपचार का पहला लक्ष्य केवल खून रोकना नहीं बल्कि यह पता लगाना भी होता है कि रक्तस्राव किस कारण से हो रहा है।
किस महिला में जोखिम अधिक हो सकता है
प्रसवोत्तर रक्तस्राव किसी भी महिला में हो सकता है। यह जरूरी नहीं कि जिस महिला की गर्भावस्था सामान्य रही हो, उसे प्रसव के बाद रक्तस्राव नहीं होगा। कई मामलों में कोई स्पष्ट जोखिम कारक मौजूद न होने के बावजूद यह आपातस्थिति विकसित हो सकती है। हालांकि कुछ परिस्थितियों में जोखिम बढ़ सकता है। इनमें जुड़वा या एक से अधिक बच्चों की गर्भावस्था, बच्चे का आकार बड़ा होना, गर्भाशय का अत्यधिक फैल जाना, लंबे समय तक चलने वाला प्रसव, प्रसव को तेज या नियंत्रित करने के लिए कुछ दवाओं का उपयोग, प्लेसेंटा से जुड़ी जटिलताएं और पहले प्रसव में गंभीर रक्तस्राव का इतिहास शामिल हो सकता है। गंभीर एनीमिया वाली महिला में भी रक्तस्राव की स्थिति अधिक खतरनाक हो सकती है, क्योंकि उसके शरीर में पहले से ही ऑक्सीजन पहुंचाने की क्षमता कम हो सकती है। रक्त के थक्के बनने से जुड़ी कुछ बीमारियां भी रक्तस्राव को नियंत्रित करना मुश्किल बना सकती हैं।
सिजेरियन के बाद भी हो सकता है PPH
प्रसवोत्तर रक्तस्राव को केवल सामान्य प्रसव से जोड़ना गलत है। सिजेरियन सेक्शन के बाद भी अत्यधिक रक्तस्राव हो सकता है। शल्य प्रसव में चीरा लगने, प्लेसेंटा से जुड़ी जटिलताओं और गर्भाशय के संकुचन से संबंधित समस्याओं के कारण रक्तस्राव का जोखिम हो सकता है। इसलिए प्रसव का तरीका चाहे सामान्य हो या सिजेरियन, बच्चे के जन्म के बाद मां की निगरानी आवश्यक है। बच्चे के जन्म के बाद शुरुआती कुछ घंटे मां की सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इस अवधि में स्वास्थ्यकर्मियों को महिला के रक्तस्राव, नाड़ी, रक्तचाप और सामान्य स्थिति पर लगातार नजर रखनी होती है। यदि गर्भाशय सिकुड़ नहीं रहा हो, गर्भनाल का हिस्सा अंदर रह गया हो या प्रसव के दौरान चोट लगी हो, तो रक्तस्राव तेजी से बढ़ सकता है। शरीर में रक्त की मात्रा कम होने पर हृदय को तेजी से काम करना पड़ता है। नाड़ी तेज हो सकती है और रक्तचाप गिर सकता है। यदि रक्त की कमी गंभीर हो जाए तो शरीर के महत्वपूर्ण अंगों तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती। इससे hemorrhagic shock यानी रक्तस्राव के कारण होने वाला सदमा विकसित हो सकता है। गंभीर स्थिति में किडनी, मस्तिष्क, हृदय और अन्य महत्वपूर्ण अंगों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।
सिर्फ दिखाई देने वाला खून देखकर स्थिति का आकलन क्यों खतरनाक है
प्रसवोत्तर रक्तस्राव की सबसे स्पष्ट पहचान अत्यधिक योनि रक्तस्राव है, लेकिन केवल दिखाई देने वाले रक्त की मात्रा के आधार पर स्थिति का आकलन करना हमेशा सही नहीं होता। कई बार रक्तस्राव शरीर के अंदर जमा हो सकता है या महिला की स्थिति रक्त की वास्तविक कमी की तुलना में अधिक गंभीर हो सकती है। इसलिए अचानक कमजोरी, चक्कर, बेहोशी, तेज धड़कन, सांस लेने में परेशानी, त्वचा का ठंडा या पीला पड़ना और रक्तचाप में गिरावट को गंभीर संकेत माना जाना चाहिए। यदि प्रसव के बाद महिला की हालत अचानक बिगड़ती है तो इसे सामान्य थकान या प्रसव के बाद की कमजोरी समझना खतरनाक हो सकता है।
कब तत्काल चिकित्सा सहायता जरूरी
प्रसव के बाद यदि रक्तस्राव अचानक बहुत ज्यादा बढ़ जाए, बार-बार बड़े रक्त के थक्के निकलें, महिला को चक्कर या बेहोशी महसूस हो, दिल की धड़कन बहुत तेज हो, सांस लेने में परेशानी हो या महिला अत्यधिक कमजोर और सुस्त हो जाए, तो तत्काल चिकित्सा सहायता की जरूरत होती है। ऐसी स्थिति में घर पर निगरानी करते रहना या रक्तस्राव के अपने आप रुकने की प्रतीक्षा करना जानलेवा हो सकता है। प्रसवोत्तर रक्तस्राव एक ऐसी स्थिति है जिसमें उपचार शुरू करने में हर मिनट महत्वपूर्ण हो सकता है। PPH की रोकथाम केवल प्रसव के समय नहीं बल्कि गर्भावस्था के दौरान शुरू हो जाती है। गर्भवती महिला में एनीमिया की समय पर पहचान और उपचार महत्वपूर्ण है। पर्याप्त आयरन और फोलिक एसिड का सेवन, नियमित गर्भावस्था जांच और जोखिम कारकों की पहचान महिला को प्रसव के दौरान होने वाली जटिलताओं से निपटने के लिए बेहतर स्थिति में रख सकती है। गर्भावस्था के दौरान प्लेसेंटा की स्थिति, भ्रूणों की संख्या, गर्भाशय से जुड़ी समस्याओं और अन्य जोखिम कारकों की पहचान भी प्रसव की सुरक्षित योजना बनाने में मदद करती है। जहां जोखिम अधिक हो वहां ऐसी स्वास्थ्य सुविधा का चयन जरूरी है जहां प्रशिक्षित प्रसूति विशेषज्ञ, आवश्यक दवाएं, रक्त और शल्य चिकित्सा जैसी आपातकालीन सेवाएं उपलब्ध हों।
प्रसव के बाद दी जाने वाली दवाओं की भूमिका
प्रसव के बाद गर्भाशय को सिकुड़ने में मदद करने वाली uterotonic दवाएं प्रसवोत्तर रक्तस्राव की रोकथाम और उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऑक्सीटोसिन ऐसी प्रमुख दवाओं में शामिल है। इन दवाओं का उपयोग प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी महिला की स्थिति और उपलब्ध चिकित्सा प्रोटोकॉल के अनुसार करते हैं। इसका उद्देश्य गर्भाशय को प्रभावी रूप से सिकुड़ने में मदद करना और रक्तस्राव को नियंत्रित करना होता है। PPH के मामलों में समय पर पहचान सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक है। यदि रक्तस्राव की शुरुआत में ही स्थिति पहचान ली जाए तो कई मामलों में दवाओं, गर्भाशय की मालिश और अन्य शुरुआती उपायों से रक्तस्राव को नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन यदि रक्तस्राव लंबे समय तक जारी रहता है तो महिला को बड़ी मात्रा में रक्त और रक्त के अवयवों की आवश्यकता पड़ सकती है और शल्य चिकित्सा की जरूरत भी बढ़ सकती है।
PPH का उपचार कैसे किया जाता है
उपचार का तरीका रक्तस्राव के कारण और महिला की स्थिति पर निर्भर करता है। चिकित्सक सबसे पहले महिला की स्थिति को स्थिर करने के साथ-साथ रक्तस्राव के संभावित कारण की पहचान करते हैं। गर्भाशय के ठीक से सिकुड़ नहीं पाने की स्थिति में गर्भाशय की मालिश और uterotonic दवाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है। नस के जरिए तरल पदार्थ दिए जा सकते हैं और जरूरत पड़ने पर रक्त तथा रक्त के अवयव चढ़ाए जा सकते हैं। कुछ परिस्थितियों में रक्तस्राव कम करने वाली दवाओं का उपयोग किया जाता है। यदि दवाओं और शुरुआती उपायों से रक्तस्राव नियंत्रित नहीं होता तो गर्भाशय के अंदर विशेष उपकरण या बैलून लगाया जा सकता है, जो रक्तस्राव को नियंत्रित करने में मदद करता है। यदि रक्तस्राव किसी चोट, गर्भनाल के अंदर रह गए हिस्से या प्लेसेंटा से संबंधित समस्या के कारण हो तो उसके अनुसार अलग उपचार किया जाता है। गंभीर मामलों में शल्य चिकित्सा आवश्यक हो सकती है।
अत्यंत गंभीर स्थिति में गर्भाशय निकालने की आवश्यकता
कुछ मामलों में रक्तस्राव इतना गंभीर हो सकता है कि अन्य उपाय पर्याप्त साबित नहीं होते। ऐसी जीवनरक्षक स्थिति में hysterectomy यानी गर्भाशय निकालने की शल्य चिकित्सा करनी पड़ सकती है। यह निर्णय महिला की जान बचाने के लिए किया जाता है और गंभीर अनियंत्रित रक्तस्राव की स्थिति में यह जीवनरक्षक प्रक्रिया हो सकती है। हालांकि इसका अर्थ यह भी है कि महिला भविष्य में गर्भधारण नहीं कर सकेगी। इसलिए यह गंभीर परिस्थितियों में लिया जाने वाला महत्वपूर्ण चिकित्सकीय निर्णय है। PPH के उपचार में रक्त और रक्त के अवयवों की उपलब्धता कई बार जीवन और मृत्यु के बीच अंतर पैदा कर सकती है। अत्यधिक रक्तस्राव में महिला के शरीर में रक्त की मात्रा तेजी से कम हो सकती है और उसे लाल रक्त कोशिकाओं, प्लाज्मा या प्लेटलेट्स जैसे रक्त अवयवों की आवश्यकता पड़ सकती है। इसीलिए प्रसव कराने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं में रक्त की उपलब्धता, रक्त समूह की जांच और जरूरत पड़ने पर तेजी से रक्त उपलब्ध कराने की व्यवस्था महत्वपूर्ण है।
ग्रामीण क्षेत्रों में चुनौती और बढ़ जाती है
भारत जैसे बड़े देश में PPH से निपटने के सामने केवल चिकित्सकीय चुनौती नहीं बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ी कई चुनौतियां भी हैं। ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की कमी, रक्त बैंक तक पहुंच, परिवहन और रेफरल व्यवस्था कई बार उपचार में देरी का कारण बन सकती है। यदि किसी छोटे स्वास्थ्य केंद्र पर महिला का प्रसव होता है और वहां गंभीर रक्तस्राव को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो उसे उच्च स्तरीय केंद्र तक पहुंचाना जरूरी हो सकता है। लेकिन यदि एंबुलेंस उपलब्ध होने में देरी हो या अस्पताल दूर हो तो महिला की स्थिति रास्ते में और गंभीर हो सकती है। इसलिए प्रसवोत्तर रक्तस्राव की रोकथाम में मजबूत referral system और emergency transport भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने दवाएं और डॉक्टर।
सिर्फ संस्थागत प्रसव बढ़ाना पर्याप्त नहीं
भारत में संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने से मातृ और नवजात स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण सुधार हुआ है। लेकिन अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र में प्रसव होना अपने आप में सुरक्षित प्रसव की गारंटी नहीं है। जरूरी यह है कि जिस संस्थान में प्रसव कराया जा रहा है वहां आपातस्थिति की पहचान और शुरुआती उपचार की क्षमता भी हो। स्वास्थ्य केंद्र में प्रशिक्षित स्टाफ, आवश्यक दवाएं, रक्त की उपलब्धता या रक्त तक त्वरित पहुंच, आपातकालीन उपकरण और उच्च केंद्र तक रेफरल की व्यवस्था होनी चाहिए। मां की जान बचाने के लिए health system readiness इसलिए PPH की रोकथाम की महत्वपूर्ण कड़ी है।
PPH का असर सिर्फ मृत्यु तक सीमित नहीं
प्रसवोत्तर रक्तस्राव से बचने वाली महिला भी लंबे समय तक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना कर सकती है। अत्यधिक रक्त की कमी से गंभीर एनीमिया हो सकता है। महिला को लगातार कमजोरी, थकान, सांस फूलने और दैनिक गतिविधियों में परेशानी हो सकती है। यदि रक्तस्राव बहुत गंभीर रहा हो तो शरीर के अन्य अंग भी प्रभावित हो सकते हैं। लंबे समय तक स्वास्थ्य लाभ के लिए पोषण, एनीमिया का उपचार और चिकित्सकीय निगरानी की आवश्यकता हो सकती है। कुछ महिलाओं को गंभीर रक्तस्राव के बाद बड़ी शल्य चिकित्सा से गुजरना पड़ सकता है। अत्यंत गंभीर परिस्थितियों में गर्भाशय निकालना पड़ सकता है, जिससे भविष्य की प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है। जानलेवा प्रसवोत्तर रक्तस्राव का अनुभव महिला के मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डाल सकता है। अचानक गंभीर बीमारी, अस्पताल में आपातकालीन उपचार, रक्त चढ़ना या शल्य चिकित्सा जैसी घटनाएं महिला के लिए भावनात्मक रूप से बेहद कठिन हो सकती हैं। इसलिए PPH से बचने के बाद केवल शारीरिक रिकवरी पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। जरूरत पड़ने पर महिला की मानसिक और भावनात्मक स्थिति की भी जांच और सहायता जरूरी है।
WHO ने PPH को लेकर क्या बदला
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने प्रसवोत्तर रक्तस्राव को मातृ मृत्यु और गंभीर मातृ जटिलताओं की रोकथाम के लिए प्रमुख प्राथमिकता माना है। WHO और सहयोगी संस्थाओं की नई सिफारिशों में केवल रक्तस्राव की एक निश्चित मात्रा पर निर्भर रहने के बजाय समय पर पहचान और तेजी से उपचार पर जोर दिया गया है। 2025 में WHO ने प्रसवोत्तर रक्तस्राव की रोकथाम, पहचान और उपचार से संबंधित अद्यतन समेकित सिफारिशें जारी कीं। इनका उद्देश्य उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों को एक साथ लाकर स्वास्थ्यकर्मियों को बेहतर और अधिक समय पर उपचार उपलब्ध कराने में मदद करना है। इसके बाद इन सिफारिशों को स्वास्थ्य प्रणालियों में लागू करने की दिशा में भी जोर दिया गया है ताकि प्रमाण आधारित उपचार केवल दिशानिर्देशों में दर्ज न रहे बल्कि वास्तविक प्रसव केंद्रों में उपलब्ध हो।
प्रसव के बाद मां की निगरानी को न करें नजरअंदाज
बच्चे के जन्म के बाद परिवार का ध्यान स्वाभाविक रूप से नवजात की ओर चला जाता है। लेकिन इस दौरान मां की निगरानी भी उतनी ही जरूरी है। प्रसव के बाद महिला की अत्यधिक कमजोरी, लगातार या बढ़ता रक्तस्राव, चक्कर, बेहोशी, सांस लेने में परेशानी, तेज धड़कन या अचानक बिगड़ती स्थिति को सामान्य प्रसवोत्तर समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। परिवार के सदस्यों को भी यह समझना जरूरी है कि प्रसव के बाद किसी भी असामान्य बदलाव पर तुरंत स्वास्थ्यकर्मी को जानकारी दी जानी चाहिए।
सुरक्षित मातृत्व का अर्थ सिर्फ स्वस्थ बच्चा नहीं
मातृ स्वास्थ्य की चर्चा में अक्सर गर्भावस्था और बच्चे के जन्म पर सबसे अधिक ध्यान दिया जाता है। लेकिन सुरक्षित मातृत्व का अर्थ केवल स्वस्थ बच्चे का जन्म नहीं है। मां का प्रसव के बाद सुरक्षित रहना, रक्तस्राव से बचाव, संक्रमण की रोकथाम, एनीमिया का उपचार, मानसिक स्वास्थ्य और आगे की शारीरिक रिकवरी भी सुरक्षित मातृत्व का हिस्सा है। PPH इस बात की याद दिलाता है कि प्रसव एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें मां को प्रसव के बाद भी लगातार चिकित्सकीय निगरानी की जरूरत होती है। प्रसवोत्तर रक्तस्राव से होने वाली गंभीर जटिलताओं को कम करने के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था को कई स्तरों पर एक साथ काम करना होगा। गर्भावस्था के दौरान एनीमिया की पहचान और उपचार, जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की पहचान, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता, प्रसव के दौरान उचित निगरानी, प्रसव के बाद महिला की लगातार निगरानी और आपातकालीन उपचार की व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है। इसके साथ ही स्वास्थ्य केंद्रों पर आवश्यक uterotonic दवाओं, रक्तस्राव कम करने वाली दवाओं, IV fluids, आपातकालीन उपकरण और रक्त तथा रक्त अवयवों की उपलब्धता सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है। रेफरल सिस्टम को भी मजबूत करना होगा ताकि गंभीर मरीज को बिना अनावश्यक देरी के उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सुविधा तक पहुंचाया जा सके।
सबसे जरूरी संदेश: प्रसव के बाद भी मां की देखभाल जारी रहे
प्रसवोत्तर रक्तस्राव का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि बच्चे के जन्म के साथ मां की चिकित्सकीय देखभाल समाप्त नहीं होती। प्रसव के बाद के शुरुआती घंटे महिला की जिंदगी बचाने के लिए निर्णायक हो सकते हैं। अत्यधिक रक्तस्राव की समय पर पहचान, महिला की पूरी शारीरिक स्थिति की निगरानी, तत्काल उपचार, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की मौजूदगी, जरूरी दवाओं की उपलब्धता, पर्याप्त रक्त और रक्त अवयव तथा समय पर रेफरल व्यवस्था मिलकर गंभीर परिणामों को रोक सकती हैं। इसलिए सुरक्षित प्रसव की परिभाषा को केवल यह देखकर तय नहीं किया जा सकता कि बच्चा सुरक्षित पैदा हुआ या नहीं। वास्तविक सुरक्षित प्रसव वह है जिसमें मां और नवजात दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो, प्रसव के बाद भी मां की निगरानी जारी रहे और किसी आपातस्थिति में इलाज शुरू करने में एक पल की भी अनावश्यक देरी न हो। प्रसव के बाद खतरा खत्म नहीं होता। मां की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना बच्चे का सुरक्षित जन्म।
