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मोबाइल वीडियो में ₹300 रिश्वत मांगने का मामला सामने आया, पुलिसकर्मी को धमकाने के आरोपी पर दर्ज केस बॉम्बे हाईकोर्ट ने किया रद्द
बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुलिसकर्मी को धमकाने के आरोप में एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज केस रद्द कर दिया है। अदालत ने मोबाइल वीडियो और व्हाट्सऐप बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि प्रथमदृष्टया पुलिसकर्मी द्वारा ड्राइविंग लाइसेंस लौटाने के लिए ₹300 मांगने की बात सामने आती है। कोर्ट ने अभियोजन की कहानी को अविश्वसनीय और झूठी-मनगढ़ंत बताते हुए एफआईआर और चार्जशीट रद्द कर दी।

मुंबई।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक पुलिसकर्मी को धमकाने के आरोप में एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला रद्द कर दिया है। अदालत ने मोबाइल फोन की रिकॉर्डिंग और व्हाट्सऐप बातचीत को महत्वपूर्ण माना, जिनसे प्रथमदृष्टया यह सामने आया कि शिकायतकर्ता पुलिस कांस्टेबल ने वाहन चालक से उसका ड्राइविंग लाइसेंस वापस करने के लिए ₹300 की मांग की थी। जस्टिस मिलिंद एन. जाधव ने भारतीय दंड संहिता की धारा 353, 504 और 506 के तहत दर्ज एफआईआर और उसके आधार पर दाखिल चार्जशीट को रद्द करने का आदेश दिया। अदालत ने अभियोजन की कहानी को प्रथमदृष्टया अविश्वसनीय बताते हुए कहा कि आरोपी के खिलाफ आपराधिक धमकी का मामला कथित तौर पर गढ़ा गया प्रतीत होता है।
लाइसेंस लौटाने के बदले ₹300 मांगने का आरोप
मामला उस समय शुरू हुआ जब शिकायतकर्ता पुलिस कांस्टेबल ने आरोपी से वाहन के कागजात और ड्राइविंग लाइसेंस मांगा। आरोप के अनुसार, पुलिसकर्मी ने अन्य दस्तावेज तो वापस कर दिए, लेकिन ड्राइविंग लाइसेंस अपने पास रख लिया। अभियोजन का आरोप था कि आरोपी ने पुलिसकर्मी के साथ दुर्व्यवहार किया, उसकी शर्ट का कॉलर पकड़ा और उसे धमकी दी। इसके आधार पर उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 353, 504 और 506 के तहत मामला दर्ज किया गया। वहीं आरोपी का कहना था कि पुलिसकर्मी ने बिना हेलमेट वाहन चलाने के मामले में कार्रवाई की धमकी दी और लाइसेंस वापस करने के लिए ₹500 जुर्माने के रूप में या मामला खत्म करने के लिए ₹300 रिश्वत की मांग की। आरोपी के अनुसार, जब वह पुलिसकर्मी के खिलाफ गैर-संज्ञेय शिकायत (NC) दर्ज कराने पुलिस स्टेशन पहुंचा, तो उसे वहीं हिरासत में ले लिया गया।
मोबाइल रिकॉर्डिंग बनी अहम साक्ष्य
हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी ने पूरे घटनाक्रम का कुछ हिस्सा अपने मोबाइल फोन में रिकॉर्ड किया था। रिकॉर्डिंग में प्रथमदृष्टया पुलिसकर्मी द्वारा लाइसेंस वापस नहीं करने और ₹300 की मांग किए जाने की बात सामने आई।m अदालत ने पुलिसकर्मी और अन्य पुलिस अधिकारियों के बीच हुई व्हाट्सऐप बातचीत और संदेशों को भी देखा। इन सामग्रियों के आधार पर कोर्ट ने कहा कि प्रथमदृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि शिकायतकर्ता और उसके सहयोगी आरोपी के खिलाफ झूठे आपराधिक धमकी के मामले को खड़ा करने में शामिल थे।
लाइसेंस जब्त करने के अधिकार पर भी सवाल
अदालत ने पुलिसकर्मी की शिकायत में एक महत्वपूर्ण कमी की ओर भी इशारा किया। शिकायत में आरोपी के बिना हेलमेट बाइक चलाने का उल्लेख था, लेकिन ड्राइविंग लाइसेंस कथित रूप से जब्त करने के विवाद को स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि शिकायत में लाइसेंस छीने जाने के मुद्दे से जानबूझकर बचा गया प्रतीत होता है, क्योंकि बिना हेलमेट बाइक चलाने की स्थिति में पुलिस कांस्टेबल के पास लाइसेंस जब्त करने की शक्ति नहीं थी।
पुलिस स्टेशन की सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं
अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस स्टेशन में आरोपी को कथित तौर पर हिरासत में रखने और उसके साथ हुए व्यवहार के आरोपों की सच्चाई जानने के लिए सीसीटीवी फुटेज महत्वपूर्ण हो सकती थी। हालांकि, अभियोजन की ओर से बताया गया कि पुलिस स्टेशन की सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं थी, जबकि ऐसी फुटेज को सुरक्षित रखा जाना चाहिए था। इन परिस्थितियों को देखते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने अभियोजन की कहानी को प्रथमदृष्टया अविश्वसनीय और झूठी एवं मनगढ़ंत माना। इसके बाद अदालत ने आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर और चार्जशीट को रद्द कर दिया।
