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टीएमसी के 20 बागी सांसदों की अयोग्यता पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, स्पीकर से जल्द फैसला लेने की उम्मीद
सुप्रीम कोर्ट ने टीएमसी के 20 बागी सांसदों के खिलाफ लंबित अयोग्यता याचिकाओं पर जल्द फैसला लेने की जरूरत पर जोर दिया है। CJI सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि दसवीं अनुसूची से जुड़े मामलों का शीघ्र निपटारा जरूरी है और अगली सुनवाई में लोकसभा अध्यक्ष की ओर से संभावित समयसीमा की जानकारी मांगी है।

नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 23 सितंबर 2026 को तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों के खिलाफ लंबित अयोग्यता याचिकाओं पर जल्द निर्णय लिए जाने की उम्मीद जताई। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें लोकसभा अध्यक्ष से संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता याचिकाओं पर समयबद्ध निर्णय की मांग की गई है। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंद्योपाध्याय ने बताया कि लोकसभा अध्यक्ष ने अगस्त में 20 सांसदों को नोटिस जारी किए थे। इन सांसदों को जवाब दाखिल करने के लिए शुरुआती 14 दिन का समय दिया गया था। बाद में यह समय 22 सितंबर तक बढ़ाया गया, लेकिन बागी सांसदों ने फिर अतिरिक्त समय मांगा। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने दसवीं अनुसूची से जुड़े मामलों के शीघ्र निपटारे की आवश्यकता पर जोर दिया। CJI सूर्यकांत ने कहा कि जिस मामले को कानून के अनुसार जल्द तय किया जाना आवश्यक है, उसकी प्रकृति ही शीघ्र निर्णय की मांग करती है। न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने भी कहा कि दसवीं अनुसूची के महत्व को ध्यान में रखते हुए मामले का जल्द समाधान होना चाहिए। पीठ ने 2020 के केशम मेघचंद्र सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख किया। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि उस फैसले में स्पीकर के समक्ष अयोग्यता की कार्यवाही के निपटारे के लिए तीन महीने की अवधि का उल्लेख किया गया था और वर्तमान मामले में यह अवधि अपने अंतिम चरण में है। हालांकि, अदालत ने इस स्तर पर लोकसभा अध्यक्ष के लिए कोई बाध्यकारी समयसीमा तय नहीं की।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने लोकसभा अध्यक्ष की ओर से कहा कि अध्यक्ष एक संवैधानिक प्राधिकारी के रूप में कार्य कर रहे हैं और अदालत को उनके लिए कोई निश्चित समयसीमा तय नहीं करनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अयोग्यता की कार्यवाही में दोनों पक्षों की ओर से साक्ष्य और जवाब लिए जाने के कारण कुछ समय लग सकता है। बागी सांसदों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल और मनिंदर सिंह ने कहा कि फिलहाल न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने बताया कि सांसदों ने केवल एक बार समय बढ़ाने का अनुरोध किया है और वे चार सप्ताह में अपना जवाब दाखिल कर देंगे। सुप्रीम कोर्ट ने अंततः सुनवाई स्थगित कर दी और बागी सांसदों की ओर से चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने के बयान को रिकॉर्ड किया। अदालत ने इस चरण पर कोई बाध्यकारी निर्देश जारी नहीं किया। पीठ ने सॉलिसिटर जनरल से अगली सुनवाई में यह बताने को कहा कि लोकसभा अध्यक्ष की ओर से मामले के निपटारे के लिए क्या समयसीमा प्रस्तावित की जा सकती है। यह विवाद टीएमसी के 20 सांसदों के पार्टी से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) के साथ जुड़ने और लोकसभा में अलग समूह के रूप में मान्यता की मांग से जुड़ा है। टीएमसी का कहना है कि ये सांसद पार्टी के चुनाव चिह्न पर निर्वाचित हुए थे और बाद में दूसरे राजनीतिक गठन के साथ जाने पर संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल विरोधी प्रावधान लागू होते हैं। मामला ‘अभिषेक बनर्जी बनाम माननीय लोकसभा अध्यक्ष एवं अन्य’ के नाम से W.P.(C) No. 1033/2026 के तहत सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
