government

किसान या डेटा सेंटर्स : महाराष्ट्र सरकार से किसानों के पानी पर कांग्रेस का सवाल,

महाराष्ट्र के 358 में से 265 तालुकों में सूखा घोषित होने के बाद पानी के इस्तेमाल और सरकारी प्राथमिकताओं को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने डेटा सेंटर विस्तार के बीच सवाल उठाया है कि जल-संकट के समय पानी पर प्राथमिकता किसानों और आम लोगों की होगी या उद्योगों की। सरकार ने राहत उपाय घोषित किए हैं, लेकिन फसल नुकसान की सीधी आर्थिक सहायता की राशि अभी तय नहीं हुई है।

Kalpana Gautam27 सित. 2026, 11:41 PM IST
खबर शेयर करें:
किसान या डेटा सेंटर्स : महाराष्ट्र सरकार से किसानों के पानी पर कांग्रेस का सवाल,

मुंबई: महाराष्ट्र में बारिश की कमी और लंबे ड्राई स्पेल के बाद राज्य सरकार ने 358 में से 265 तालुकों को सूखा-प्रभावित घोषित किया है। यानी राज्य के करीब 74 प्रतिशत तालुकों में सूखा प्रबंधन व्यवस्था के तहत राहत उपाय लागू होंगे। इसी घोषणा के बाद अब राज्य की जल नीति और तेजी से बढ़ते डेटा सेंटर उद्योग को लेकर राजनीतिक बहस शुरू हो गई है।


कांग्रेस के राज्यसभा सांसद और पार्टी के मीडिया एवं प्रचार विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस सरकार से पूछा है कि जब राज्य के इतने बड़े हिस्से में सूखे की स्थिति है, तब तेजी से बढ़ रहे डेटा सेंटर उद्योग के लिए पानी की व्यवस्था किस तरह की जाएगी।


खेड़ा ने सोशल मीडिया पोस्ट में महाराष्ट्र के डेटा सेंटर विस्तार और सूखे की स्थिति को एक साथ रखते हुए सवाल उठाया कि जल-संकट के बीच किसानों, आम नागरिकों और उद्योगों के बीच पानी के इस्तेमाल की प्राथमिकता क्या होगी।


265 तालुके सूखे की चपेट में

राज्य सरकार के फैसले के मुताबिक 265 तालुके 32 जिलों में फैले हैं। सरकार ने सूखा प्रबंधन व्यवस्था के तहत ‘Trigger-1’ लागू किया है। यह फैसला खरीफ 2026 के दौरान बारिश की कमी और लंबे समय तक बारिश नहीं होने सहित निर्धारित सूचकांकों के आकलन के बाद लिया गया। राज्य में जून से सितंबर के दौरान बारिश में करीब 18.8 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई थी। कुछ क्षेत्रों में स्थिति इससे भी गंभीर रही। मराठवाड़ा और विदर्भ के कई इलाकों में बारिश की कमी ने खरीफ फसलों को प्रभावित किया।


हालांकि यहां एक तथ्य साफ समझना जरूरी है—265 में से 358 तालुके का आंकड़ा तालुकों का अनुपात है। इसका मतलब यह नहीं है कि महाराष्ट्र की 74 प्रतिशत जमीन या 74 प्रतिशत आबादी सूखे से प्रभावित है।


सरकार ने क्या राहत घोषित की?

सूखा घोषित होने के बाद सरकार ने कई राहत उपायों को लागू करने का फैसला किया है। इनमें फसल ऋण का पुनर्गठन, कृषि से जुड़े कर्ज की वसूली पर स्थगन, भूमि राजस्व में रियायत और कृषि पंपों के बिजली बिल में राहत जैसे कदम शामिल हैं। इसके अलावा प्रभावित इलाकों में जरूरत के अनुसार पानी के टैंकर उपलब्ध कराने, पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था करने, ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के नियमों में राहत देने और पेयजल व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं।


जिला कलेक्टरों को फसल नुकसान का सर्वे शुरू करने और प्रभावित खेतों की तस्वीरों तथा GPS विवरण के साथ रिपोर्ट तैयार करने को कहा गया है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी भी सीधी आर्थिक सहायता को लेकर है। सरकार ने कहा है कि फसल नुकसान का आकलन पूरा होने के बाद अलग शासन निर्णय के जरिए वित्तीय सहायता तय की जाएगी। यानी फिलहाल प्रति हेक्टेयर कितनी रकम किसानों को मिलेगी, इसकी अंतिम घोषणा नहीं हुई है। विपक्ष इसी बिंदु को लेकर सरकार पर दबाव बना रहा है।


विपक्ष का सवाल—‘किसानों को पैसा कब मिलेगा?’

कांग्रेस और एनसीपी (शरदचंद्र पवार) खेमे के नेताओं ने मांग की है कि किसानों को फसल नुकसान के लिए तत्काल आर्थिक सहायता दी जाए।

एनसीपी (एसपी) नेता महेश तपासे ने सवाल उठाया कि अगर फसलें पहले ही बर्बाद हो चुकी हैं तो किसानों को मुआवजे के लिए सर्वे और अगली सरकारी अधिसूचना का इंतजार क्यों करना पड़े।  कांग्रेस की ओर से प्रति हेक्टेयर तत्काल आर्थिक सहायता की मांग भी सामने आई है।


यानी मौजूदा विवाद सिर्फ इस बात पर नहीं है कि सूखा घोषित हुआ या नहीं, बल्कि इस पर है कि घोषणा के बाद किसान के बैंक खाते तक वास्तविक मदद कब और कितनी पहुंचेगी।


इसी बीच बढ़ रहा है डेटा सेंटर सेक्टर

महाराष्ट्र दूसरी तरफ खुद को देश के प्रमुख डेटा सेंटर हब के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने अगस्त में कहा था कि राज्य में डेटा सेंटर परियोजनाओं के लिए 300 अरब डॉलर से अधिक के MoUs हुए हैं और राज्य की डेटा सेंटर क्षमता को 5.7 GW तक ले जाने का लक्ष्य है।


सितंबर की एक उद्योग रिपोर्ट में भी महाराष्ट्र के लिए 5.7 GW क्षमता का लक्ष्य और 300 अरब डॉलर से अधिक की निवेश रुचि का उल्लेख किया गया।

डेटा सेंटर आधुनिक डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा हैं। लेकिन इनके संचालन में बड़ी मात्रा में बिजली की जरूरत होती है और पानी की आवश्यकता भी इस्तेमाल की जाने वाली cooling technology पर निर्भर करती है। यही वह बिंदु है जहां कांग्रेस ने सूखे को डेटा सेंटर विस्तार से जोड़कर सवाल उठाया है।


क्या डेटा सेंटर सीधे किसानों का पानी ले रहे हैं?

यह दावा फिलहाल स्थापित तथ्य के तौर पर नहीं लिखा जा सकता। कांग्रेस का सवाल जल संसाधनों की प्राथमिकता को लेकर है। उपलब्ध रिपोर्टों में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि सूखा घोषित 265 तालुकों के किसानों से पानी हटाकर सीधे डेटा सेंटरों को दिया जा रहा है।


इसके उलट, महाराष्ट्र में उद्योगों के लिए उपचारित सीवेज के इस्तेमाल की व्यवस्था विकसित की जा रही है। रिपोर्टों के मुताबिक MIDC डेटा सेंटर क्लस्टरों के लिए treated wastewater और desalinated water जैसे वैकल्पिक स्रोतों की योजना पर काम कर रहा है। नवी मुंबई में भी उपचारित सीवेज का इस्तेमाल औद्योगिक इकाइयों के लिए किया जा रहा है और इसमें कुछ डेटा सेंटर शामिल हैं।


इसलिए असली नीति संबंधी सवाल यह है कि भविष्य में डेटा सेंटरों की बढ़ती पानी की जरूरत किस स्रोत से पूरी होगी और क्या इसके लिए freshwater पर दबाव कम किया जा सकेगा।


‘किसानों या डेटा सेंटरों’ का सवाल क्यों महत्वपूर्ण है?

पवन खेड़ा का सवाल राजनीतिक है, लेकिन इसके पीछे एक वास्तविक नीति चुनौती मौजूद है—महाराष्ट्र को एक साथ कृषि, घरेलू जरूरतों और औद्योगिक विकास के लिए पानी की योजना बनानी होगी।


एक तरफ सरकार डेटा सेंटर, AI और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए निवेश और आर्थिक गतिविधियां बढ़ाना चाहती है। दूसरी तरफ राज्य के बड़े हिस्से में बारिश की कमी से खेती प्रभावित हुई है। ऐसे में सवाल केवल ‘किसका पानी’ नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या उद्योगों के लिए पर्याप्त वैकल्पिक जल-स्रोत तैयार किए जा सकते हैं, ताकि कृषि और घरेलू जल आपूर्ति पर अतिरिक्त दबाव न पड़े।


अब आगे क्या?

सरकार के सामने तत्काल तीन मोर्चे हैं—फसल नुकसान का पारदर्शी आकलन, किसानों के लिए प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता का फैसला और प्रभावित इलाकों में पानी-चारा जैसी बुनियादी राहत। दूसरी तरफ डेटा सेंटर विस्तार के लिए पानी की दीर्घकालिक व्यवस्था भी स्पष्ट करनी होगी।

इस पूरी बहस में फिलहाल इतना स्पष्ट है कि महाराष्ट्र में सूखे की सरकारी घोषणा हो चुकी है, 265 तालुकों में राहत व्यवस्था सक्रिय की जा रही है और फसल नुकसान की सीधी आर्थिक सहायता पर अभी अंतिम फैसला बाकी है।


डेटा सेंटरों को लेकर कांग्रेस के सवाल सरकार की जल-प्राथमिकताओं पर राजनीतिक बहस को तेज कर रहे हैं। लेकिन यह कहना कि डेटा सेंटरों ने किसानों का पानी ले लिया है, उपलब्ध तथ्यों से अभी साबित नहीं होता।


महाराष्ट्र के सामने असली चुनौती यही है—सूखे के बीच किसानों और नागरिकों की तत्काल जरूरतों को पूरा करते हुए डिजिटल और औद्योगिक विस्तार के लिए टिकाऊ जल-स्रोत कैसे तैयार किए जाएं।