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सिर्फ परिवहन दस्तावेज न होने से 32 बैलों को वध के लिए ले जाने की मंशा साबित नहीं होती: SC
छत्तीसगढ़ में 32 बैलों के परिवहन से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि केवल परिवहन संबंधी दस्तावेज नहीं होने के आधार पर यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि मवेशियों को वध (Slaughter) के लिए ले जाया जा रहा था। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने आरोपी की दोषसिद्धि रद्द करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष को पहले यह साबित करना होगा कि मवेशियों का परिवहन वध के उद्देश्य से किया जा रहा था।

सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ में मवेशियों के परिवहन से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि सिर्फ परिवहन के दस्तावेज मौजूद नहीं होने से यह नहीं माना जा सकता कि मवेशियों को वध के लिए ले जाया जा रहा था। कोर्ट ने कहा कि आरोपी पर रिवर्स बर्डन ऑफ प्रूफ (Reverse Burden of Proof - उल्टा प्रमाण भार) तभी लागू होगा, जब अभियोजन पक्ष पहले अपराध के जरूरी तत्वों को साबित कर दे। यह मामला Saurabh Bajaj बनाम State of Chhattisgarh & Ors. का है। सुप्रीम कोर्ट ने 29 सितंबर 2026 को फैसला सुनाते हुए आरोपी की दोषसिद्धि और निचली अदालतों के आदेशों को रद्द कर दिया।
मामला क्या था?
आरोप था कि 32 बैलों को एक ट्रक में छत्तीसगढ़ के केडुवा से ओडिशा की ओर ले जाया जा रहा था। हेड कॉन्स्टेबल (PW3) को मवेशियों के परिवहन की सूचना मिली थी, जिसके बाद ट्रक को रोका गया और मवेशियों को जब्त कर लिया गया। ट्रक के चालक और क्लीनर को गिरफ्तार किया गया था। इसी दौरान ट्रक के आगे चल रही एक बोलेरो कार को भी रोका गया। आरोप लगाया गया कि बोलेरो ट्रक को एस्कॉर्ट (Escort - साथ चलकर निगरानी) कर रही थी और उसमें सवार चार लोग भी मामले में आरोपी बनाए गए। अपीलकर्ता सौरभ बजाज उन छह आरोपियों में शामिल थे, जिन्हें छत्तीसगढ़ कृषि पशु संरक्षण अधिनियम, 2004 के तहत दोषी ठहराया गया था।
निचली अदालत से हाईकोर्ट तक दोषसिद्धि बरकरार
ट्रायल कोर्ट (विचारण अदालत) ने आरोपियों को अधिनियम की धारा 6 के उल्लंघन के लिए दोषी ठहराया और धारा 10 के तहत एक साल के कठोर कारावास तथा 1,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। इसके बाद प्रथम अपीलीय अदालत ने भी दोषसिद्धि बरकरार रखी। बाद में हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण (Revision) में सजा को पहले ही बिताई गई हिरासत की अवधि तक सीमित कर दिया। हालांकि, आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी दोषसिद्धि को चुनौती दी।
सिर्फ दस्तावेज नहीं होने से वध का अनुमान नहीं लगाया जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिनियम की धारा 6 में वध के उद्देश्य से मवेशियों के परिवहन या इस जानकारी के साथ परिवहन करने को अपराध बनाया गया है कि मवेशियों को वध किया जा सकता है। लेकिन कोर्ट के अनुसार, इस मामले में हेड कॉन्स्टेबल की ओर से लगाए गए अनुमान के अलावा रिकॉर्ड में ऐसा ठोस प्रमाण नहीं था, जिससे यह साबित हो सके कि मवेशियों को वध के लिए ले जाया जा रहा था। पीठ ने स्पष्ट किया कि धारा 11 के तहत रिवर्स प्रिजम्पशन (Reverse Presumption - उल्टी धारणा) तभी लागू होगा, जब अभियोजन पक्ष पहले अपराध के आवश्यक तत्वों को साबित करे। इसके बाद आरोपी पर यह साबित करने का दायित्व आ सकता है कि परिवहन या वध कानून के प्रावधानों का उल्लंघन नहीं करता था। कोर्ट ने कहा कि परिवहन के साथ दस्तावेज नहीं होना अपने आप में इस बात का आधार नहीं हो सकता कि मवेशियों को वध के लिए ही ले जाया जा रहा था। यदि किसी अन्य कानून के तहत परिवहन संबंधी दस्तावेज रखना जरूरी है और उसका उल्लंघन हुआ है, तो उसके लिए संबंधित कानून के तहत कार्रवाई हो सकती है। लेकिन केवल दस्तावेजों की कमी से छत्तीसगढ़ कृषि पशु संरक्षण अधिनियम के तहत वध के उद्देश्य का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
पशु चिकित्सक और गौशाला अध्यक्ष की गवाही अहम
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में पशु चिकित्सक की रिपोर्ट और गौशाला समिति के अध्यक्ष की गवाही को भी महत्वपूर्ण माना। पशु चिकित्सक ने बताया था कि जब्त किए गए सभी मवेशी स्वस्थ थे और कृषि कार्यों, विशेषकर हल चलाने के लिए उपयुक्त थे। गौशाला समिति के अध्यक्ष ने भी अदालत के सामने मवेशियों की कृषि उपयोगिता की पुष्टि की थी। कोर्ट ने इन बयानों को अभियोजन पक्ष के उस आरोप के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना, जिसमें मवेशियों को वध के लिए ले जाने की बात कही गई थी।
अभियोजन पक्ष वध के उद्देश्य को साबित नहीं कर सका
पीठ ने पाया कि अभियोजन पक्ष मुख्य रूप से ट्रक को रोके जाने और मवेशियों की जब्ती को साबित कर सका। बोलेरो कार द्वारा ट्रक को एस्कॉर्ट किए जाने का भी पर्याप्त प्रमाण नहीं मिला। मामले के स्वतंत्र गवाहों ने आरोपियों की पहचान नहीं की थी। इसके अलावा, केवल जब्ती की घटना साबित हो जाने से यह जरूरी रूप से साबित नहीं होता कि मवेशियों को वध के लिए ही ले जाया जा रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब अपराध के जरूरी तत्व ही साबित नहीं हुए, तो धारा 11 के तहत आरोपी पर रिवर्स बर्डन डालने का सवाल नहीं उठता।
दोषसिद्धि और सभी संबंधित आदेश रद्द
इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट, प्रथम अपीलीय अदालत और हाईकोर्ट के संबंधित आदेशों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने सौरभ बजाज की दोषसिद्धि भी समाप्त कर दी और अपील मंजूर कर ली। फैसला 29 सितंबर 2026 को सुनाया गया। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि मवेशियों के परिवहन के मामले में केवल दस्तावेजों की अनुपस्थिति के आधार पर वध के उद्देश्य का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। पहले अभियोजन पक्ष को कानून में बताए गए अपराध के आवश्यक तत्वों को प्रमाणित करना होगा, तभी धारा 11 के तहत आरोपी पर रिवर्स बर्डन लागू हो सकेगा।
