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‘धनुष-बाण’ पर SC का ECI से सवाल—विधायी बहुमत ही निर्णायक था तो दोनों गुटों को प्रतीक न देने पर विचार क्यों नहीं?

सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना के चुनाव चिह्न ‘धनुष-बाण’ को लेकर चुनाव आयोग (ECI) के फैसले पर सवाल उठाते हुए पूछा कि आयोग ने विधायी बहुमत (Legislative Majority) को आधार बनाकर एक गुट को चुनाव चिह्न देने के बजाय दोनों गुटों को इस आरक्षित प्रतीक से वंचित करने के विकल्प पर विचार क्यों नहीं किया।

Sonali08 अक्टू. 2026, 01:11 PM IST
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‘धनुष-बाण’ पर SC का ECI से सवाल—विधायी बहुमत ही निर्णायक था तो दोनों गुटों को प्रतीक न देने पर विचार क्यों नहीं?

नई दिल्ली।

 शिवसेना के चुनाव चिन्ह विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को चुनाव आयोग (Election Commission of India-ECI) की कार्यप्रणाली पर अहम सवाल उठाए। कोर्ट ने पूछा कि अगर प्रतिद्वंद्वी गुटों में से किसी एक को असली शिवसेना मानने के लिए उपलब्ध परीक्षण (Test) निर्णायक नहीं थे, तो चुनाव आयोग ने किसी भी गुट को पार्टी का आरक्षित चुनाव चिन्ह न देने का विकल्प क्यों नहीं अपनाया? यह मामला उद्धव ठाकरे गुट की उस चुनौती से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसके तहत एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना माना गया और उसे ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिन्ह इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई। मामले की सुनवाई CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ कर रही है।

ECI ने केवल तीन विकल्पों पर विचार क्यों किया?

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने चुनाव आयोग द्वारा ‘Legislative Majority Test’ यानी विधायी बहुमत परीक्षण पर भरोसा करने को लेकर सवाल उठाया।

जस्टिस बागची ने कहा कि चुनाव आयोग के सामने चार संभावित रास्ते थे। इनमें पार्टी के संविधान और संगठनात्मक ढांचे की जांच, संगठनात्मक बहुमत परीक्षण, विधायी बहुमत परीक्षण और आखिरी विकल्प के तौर पर किसी भी गुट को आरक्षित चुनाव चिन्ह न देना शामिल था। उन्होंने सवाल किया कि आयोग ने तीसरे विकल्प यानी विधायी बहुमत परीक्षण को तो अपनाया, लेकिन चौथे विकल्प पर विचार तक क्यों नहीं किया। जस्टिस बागची ने कहा कि अगर आयोग यह मानता कि किसी गुट को चिन्ह न देना संभव नहीं है, तो वह इस संबंध में कारण बता सकता था। लेकिन इस विकल्प पर विचार न करना सवाल खड़ा करता है।

‘टेस्ट मजबूत नहीं है तो किसी एक को पुरस्कार क्यों?’

जस्टिस बागची ने सुनवाई के दौरान कहा कि अगर उपलब्ध परीक्षणों में से कोई भी इतना मजबूत नहीं है कि किसी एक गुट को वास्तविक राजनीतिक दल माना जा सके, तो फिर किसी एक गुट को चुनाव चिन्ह देने के बजाय उसे रद्द क्यों न किया जाए। उन्होंने कहा, “अगर इनमें से कोई भी टेस्ट मजबूत नहीं लगता, तो फिर क्या? किसी एक को पुरस्कार क्यों दें? इसे रद्द कर दीजिए।”

शिंदे गुट ने ECI के फैसले का किया बचाव

एकनाथ शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने चुनाव आयोग के विधायी बहुमत परीक्षण अपनाने का बचाव किया। उन्होंने कहा कि Election Symbols Order (चुनाव चिन्ह आदेश) के पैराग्राफ 15 में किसी एक विशेष परीक्षण को अनिवार्य नहीं किया गया है। उनके मुताबिक, चुनाव आयोग मामले के तथ्यों के आधार पर उपयुक्त परीक्षण तय करने के लिए स्वतंत्र है। कौल ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग ने पार्टी के संविधान और संगठनात्मक बहुमत से जुड़े विकल्पों पर विचार किया था और परिस्थितियों को देखते हुए विधायी बहुमत को आधार बनाया।

‘Subhash Desai’ फैसले का भी जिक्र

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने संविधान पीठ के फैसले Subhash Desai v. Principal Secretary, Governor of Maharashtra का उल्लेख किया। इस फैसले में पैराग्राफ 15 के तहत राजनीतिक दल के विवादों को तय करने में विधायी बहुमत परीक्षण की सीमाओं पर चर्चा की गई थी। जस्टिस बागची ने कहा कि संविधान पीठ ने विधायी बहुमत परीक्षण को पूरी तरह खारिज नहीं किया था, लेकिन उसकी कमजोरियों पर विस्तार से चर्चा की थी। उन्होंने बताया कि संविधान पीठ ने इस परीक्षण के लिए ‘weak’, ‘diluted’, ‘futile’ और ‘debatable’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा था कि पैराग्राफ 15 के विवादों के लिए कोई एक निश्चित परीक्षण निर्धारित नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने पूछा- कमजोर टेस्ट के बावजूद अकेले इसी को आधार कैसे बनाया?

जस्टिस बागची ने सवाल उठाया कि अगर संविधान पीठ ने विधायी बहुमत परीक्षण की कमजोरी और सीमाओं पर टिप्पणी की थी, तो फिर ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग द्वारा केवल इसी आधार पर किसी एक गुट को असली पार्टी मानने को कैसे उचित माना जाए? वरिष्ठ अधिवक्ता कौल ने कहा कि संविधान पीठ की टिप्पणियों का यह अर्थ नहीं है कि विधायी बहुमत परीक्षण पूरी तरह अस्वीकार्य हो गया है। उनके अनुसार, चुनाव आयोग ने उपलब्ध परीक्षणों पर विचार करने के बाद विधायी बहुमत को अपनाने के कारण भी बताए हैं। हालांकि, जस्टिस बागची ने कहा कि इसे ऐसी परिस्थितियों में विधायी बहुमत को अकेले निर्णायक आधार मानने की अनुमति के रूप में जरूरी नहीं पढ़ा जा सकता, जहां संविधान पीठ ने स्वयं इस परीक्षण को कमजोर या अप्रभावी बताया हो। मामले की सुनवाई जारी है। सुप्रीम कोर्ट के सवालों का केंद्र यह है कि प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच पार्टी की पहचान तय करते समय चुनाव आयोग को किस परीक्षण या प्रक्रिया का पालन करना चाहिए और ऐसी स्थिति में क्या किया जाना चाहिए, जब कोई भी परीक्षण किसी एक गुट के पक्ष में पर्याप्त रूप से मजबूत आधार न देता हो।