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गन्ने से एथेनॉल की मिठास… और पानी के संकट की कड़वाहट! महाराष्ट्र में ‘विकास’ का हिसाब कौन देगा?

महाराष्ट्र देश के सबसे बड़े एथेनॉल उत्पादक राज्यों में शामिल है और जून 2025 तक राज्य की एथेनॉल उत्पादन क्षमता करीब 396 करोड़ लीटर सालाना बताई गई थी। लेकिन इस पूरी कहानी का दूसरा पहलू पानी है। सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, महाराष्ट्र में गन्ना करीब 4% खेती योग्य क्षेत्र में होने के बावजूद सिंचाई के पानी का लगभग 70% तक इस्तेमाल करता है। ऐसे में सवाल सिर्फ एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने का नहीं, बल्कि यह भी है कि इसकी कीमत राज्य के पानी के भंडार को कितनी चुकानी पड़ रही है?

Kalpana Gautam08 अक्टू. 2026, 04:09 PM IST
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गन्ने से एथेनॉल की मिठास… और पानी के संकट की कड़वाहट! महाराष्ट्र में ‘विकास’ का हिसाब कौन देगा?

महाराष्ट्र देश के सबसे बड़े एथेनॉल उत्पादक राज्यों में शामिल है और जून 2025 तक राज्य की एथेनॉल उत्पादन क्षमता करीब 396 करोड़ लीटर सालाना पहुंच चुकी थी। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे पानी का एक गंभीर सवाल खड़ा है। सरकारी रिपोर्टों के मुताबिक, महाराष्ट्र में गन्ना कुल खेती योग्य क्षेत्र के करीब 4% हिस्से में होने के बावजूद सिंचाई के पानी का लगभग 70% इस्तेमाल करता है। यानी एथेनॉल की अर्थव्यवस्था जितनी गन्ने पर टिकी है, उतना ही बड़ा सवाल यह है कि इस गन्ने की खेती की पानी की कीमत आखिर कौन चुका रहा है?


जून 2025 तक उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार, महाराष्ट्र में करीब 396 करोड़ लीटर सालाना एथेनॉल उत्पादन क्षमता थी, जो देश में सबसे अधिक बताई गई। राज्य की एथेनॉल अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा चीनी उद्योग और उससे जुड़े गन्ना-मोलासिस आधारित उत्पादन से जुड़ा हुआ है। यानी गन्ना सिर्फ चीनी की मिठास नहीं बढ़ा रहा, बल्कि एथेनॉल की अर्थव्यवस्था को भी ईंधन दे रहा है।


लेकिन असली सवाल यहां से शुरू होता है—गन्ना उगाने के लिए पानी कितना चाहिए?


महाराष्ट्र से जुड़े सरकारी और संस्थागत दस्तावेजों में यह आंकड़ा सामने आया है कि राज्य के कुल खेती योग्य क्षेत्र में गन्ने की हिस्सेदारी करीब 4% है, लेकिन सिंचाई के पानी की खपत में उसका हिस्सा लगभग 70% तक बताया गया है। यानी जिस फसल का खेती क्षेत्र अपेक्षाकृत छोटा है, वह सिंचाई संसाधनों पर बहुत बड़ा दबाव डालती है। और यही महाराष्ट्र के लिए चिंता की बात है। राज्य का बड़ा हिस्सा पहले से ही सूखे और पानी की कमी की समस्या से जूझता रहा है। महाराष्ट्र जल संसाधन नियामक प्राधिकरण के मुताबिक राज्य का लगभग 40% क्षेत्र सूखा-प्रवण है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि गन्ने से कितनी चीनी या एथेनॉल पैदा हो रहा है। सवाल यह भी है कि उस उत्पादन को बनाए रखने के लिए कितना पानी जमीन और जलाशयों से निकाला जा रहा है।


विडंबना देखिए—एक तरफ देश को पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने के लक्ष्य पूरे करने हैं, दूसरी तरफ महाराष्ट्र जैसे राज्यों में उसी एथेनॉल अर्थव्यवस्था की रीढ़ बना गन्ना पानी पर भारी दबाव डाल रहा है। यानी ईंधन का भविष्य हरा दिख रहा है, लेकिन उसे उगाने वाला पानी लाल निशान पर पहुंच जाए तो तस्वीर कितनी टिकाऊ है?


यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 70% का आंकड़ा एथेनॉल उत्पादन की पानी खपत का नहीं है। यह गन्ने की सिंचाई से संबंधित आंकड़ा है। एथेनॉल अलग-अलग फीडस्टॉक, जैसे मोलासिस और अनाज, से भी बनाया जाता है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि “एथेनॉल महाराष्ट्र के 70% सिंचाई पानी का इस्तेमाल करता है।” लेकिन दूसरी तरफ यह भी तथ्य है कि महाराष्ट्र की एथेनॉल क्षमता और चीनी अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार गन्ना है। ऐसे में गन्ने के विस्तार और पानी की उपलब्धता के बीच संतुलन का सवाल लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है।


2025-26 के लिए कृषि मंत्रालय के तीसरे अग्रिम अनुमान में महाराष्ट्र का गन्ना उत्पादन 1,316.49 लाख टन बताया गया, जो 2024-25 के करीब 1,099.70 लाख टन के अनुमान से काफी अधिक है। यानी गन्ने का उत्पादन बढ़ रहा है, एथेनॉल की क्षमता भी बड़ी है—लेकिन पानी की उपलब्धता असीमित नहीं है।


अब असली सवाल यह है कि महाराष्ट्र विकास की इस दौड़ में “गन्ना, चीनी और एथेनॉल” के साथ-साथ “पानी” को भी बराबर महत्व देगा या नहीं? क्योंकि एथेनॉल की एक लीटर अतिरिक्त क्षमता कागज पर विकास का आंकड़ा हो सकती है, लेकिन अगर उसके पीछे पानी का संकट बढ़ता गया तो आने वाले समय में सवाल यह नहीं होगा कि कितना एथेनॉल बना?


सवाल होगा—

“एथेनॉल तो बना लिया… लेकिन अगली फसल के लिए पानी बचा भी है या नहीं?”