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कैंसर की दवाओं पर सरकार का बड़ा फैसला, कीमतों में 70% तक कटौती की उम्मीद; मरीजों को ₹2,500 करोड़ की बचत
कैंसर के महंगे इलाज से जूझ रहे मरीजों के लिए राहत की उम्मीद जगी है। केंद्र सरकार ने नॉन-शेड्यूल्ड एंटी-कैंसर दवाओं की आपूर्ति और बिक्री पर ट्रेड मार्जिन को अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के 30% तक सीमित करने की मंजूरी दी है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इस कदम के दायरे में लगभग 110 दवाएं आ सकती हैं, जिनमें 35 पेटेंटेड दवाएं शामिल हैं। सरकार का अनुमान है कि कुछ दवाओं की कीमतों में 70% तक कमी आ सकती है और मरीजों को सालाना करीब ₹2,500 करोड़ की बचत हो सकती है। हालांकि, वास्तविक राहत दवा की श्रेणी, मौजूदा कीमत और अंतिम अधिसूचना पर निर्भर करेगी।

नई दिल्ली: कैंसर के इलाज का खर्च घटाने की दिशा में बड़ा कदम
कैंसर के इलाज में महंगी दवाओं का खर्च मरीजों और उनके परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। इसी बोझ को कम करने के लिए केंद्र सरकार ने नॉन-शेड्यूल्ड एंटी-कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन की सीमा 30% तक तय करने की मंजूरी दी है। सरकार को उम्मीद है कि इस कदम से दवाओं की कीमतों में उल्लेखनीय कमी आएगी और मरीजों को हर साल करीब ₹2,500 करोड़ की बचत होगी। रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के औषध विभाग ने 8 अक्टूबर 2026 को जारी प्रेस विज्ञप्ति में इस फैसले की जानकारी दी। इसके तहत उन कैंसर दवाओं को भी मूल्य संबंधी सुरक्षा देने का लक्ष्य है, जो पहले से सरकार द्वारा निर्धारित सीलिंग प्राइस वाली सूची में शामिल नहीं हैं।
110 दवाएं और 35 पेटेंटेड दवाएं संभावित दायरे में
Business Standard की रिपोर्ट के अनुसार, नई व्यवस्था में लगभग 110 नॉन-शेड्यूल्ड कैंसर दवाएं शामिल हो सकती हैं। इनमें करीब 35 पेटेंटेड दवाएं बताई गई हैं। यह जानकारी अधिकारियों के हवाले से प्रकाशित की गई है। प्रस्तावित व्यवस्था का दायरा ब्रांडेड और जेनेरिक, घरेलू और आयातित तथा पेटेंटेड और नॉन-पेटेंटेड दवाओं तक हो सकता है। हालांकि, संबंधित श्रेणी में आने वाली प्रत्येक दवा पर नियम लागू होने की पुष्टि अंतिम सूची से ही होगी। अभी मरीजों के लिए सबसे अहम सवाल यह है कि उनकी इस्तेमाल की जाने वाली दवा इस सूची में शामिल होगी या नहीं। इसके लिए विशेषज्ञ समिति की सूची और NPPA की अंतिम अधिसूचना देखनी होगी।
दवाओं की कीमतें 70% तक कैसे घट सकती हैं?
नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) के विश्लेषण में नॉन-शेड्यूल्ड कैंसर दवाओं पर औसत मूल्य मार्क-अप लगभग 170% पाया गया। कुछ मामलों में यह 700% या उससे अधिक था। सरकार का मानना है कि आपूर्ति श्रृंखला में अधिक मार्जिन के कारण मरीजों को कई दवाओं के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है। ट्रेड मार्जिन पर सीमा लगाने का उद्देश्य निर्माता से लेकर वितरक और खुदरा विक्रेता तक कीमत में जुड़ने वाले अंतर को नियंत्रित करना है। इससे उन दवाओं की MRP में कमी आ सकती है, जिनकी मौजूदा कीमतों में ट्रेड मार्जिन का बड़ा योगदान है। लेकिन यहां एक जरूरी बात समझना आवश्यक है, 30% ट्रेड मार्जिन की सीमा का मतलब हर दवा की कीमत में सीधे 70% की कटौती नहीं है। अलग-अलग दवाओं की कीमतों में कमी उनके मौजूदा मार्जिन और लागू मूल्य निर्धारण व्यवस्था पर निर्भर करेगी। कुछ रिपोर्टों में संभावित कटौती का दायरा 20% से 70% तक बताया गया है।
मरीजों को हर साल ₹2,500 करोड़ की बचत का अनुमान
कैंसर का इलाज कई बार लंबे समय तक चलता है और मरीजों को नियमित रूप से महंगी दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। ऐसे में दवाओं की कीमतों में कमी से परिवारों के खर्च पर सीधा असर पड़ सकता है। सरकार ने नई व्यवस्था से मरीजों को सालाना करीब ₹2,500 करोड़ की बचत होने का अनुमान जताया है। यह भविष्य में मिलने वाले संभावित लाभ का अनुमान है, न कि पहले से हासिल हो चुकी बचत। वास्तविक राहत इस बात पर निर्भर करेगी कि अंतिम सूची में कौन-सी दवाएं शामिल होती हैं, उनकी कीमतें कितनी घटती हैं और नई व्यवस्था बाजार में किस तरह लागू होती है।
विशेषज्ञ समिति तय करेगी दवाओं की सूची
सरकार के मुताबिक, स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) के तहत गठित विशेषज्ञ समिति उन दवाओं की सूची को अंतिम रूप देगी, जिन पर नई व्यवस्था लागू होगी। इसके बाद NPPA आवश्यक निर्णय लेकर अधिसूचना जारी करेगा। दवाओं की उपलब्धता बनाए रखने के लिए निर्माताओं को मौजूदा उत्पादन स्तर कायम रखने की आवश्यकता भी बताई गई है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कीमतों में कमी के साथ जीवनरक्षक दवाओं की आपूर्ति प्रभावित न हो।
सुप्रीम कोर्ट में भी उठा था महंगी दवाओं का मुद्दा
कैंसर की दवाओं पर अत्यधिक मार्जिन का मामला हाल में सुप्रीम कोर्ट में भी चर्चा में रहा। India Today और अन्य मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, 29 सितंबर की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने एक दवा का उदाहरण आया, जिसकी कीमत रिटेलर के लिए लगभग ₹2,700 बताई गई, जबकि उसका MRP करीब ₹27,000 था। अदालत ने दवाओं के मूल्य निर्धारण और मार्जिन पर नियमन को लेकर सवाल उठाए थे। अदालत ने 16% रिटेलर मार्जिन जैसे विकल्प पर विचार करने का सवाल उठाया था, लेकिन इसे पूरे देश में लागू करने का अंतिम आदेश नहीं दिया था। सरकार की मौजूदा घोषणा में 30% ट्रेड मार्जिन की सीमा की बात है। दोनों को अलग-अलग घटनाक्रम के रूप में समझना चाहिए।
2019 में भी घटे थे कैंसर दवाओं के दाम
कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन नियंत्रित करने का यह पहला प्रयास नहीं है। फरवरी 2019 में सरकार ने 42 चुनिंदा नॉन-शेड्यूल्ड कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन सीमित किया था। सरकारी जानकारी के मुताबिक, उस कदम से 526 ब्रांड की MRP में कमी आई और सालाना लगभग ₹984 करोड़ की बचत का अनुमान सामने आया। कुछ ब्रांड की कीमतों में 91% तक कमी दर्ज की गई थी। मार्च 2026 में सरकार ने यह भी बताया था कि 131 शेड्यूल्ड कैंसर दवाओं की प्रभावी सीलिंग प्राइस से मरीजों को सालाना लगभग ₹294 करोड़ की बचत होने का अनुमान था। यह पहले से लागू मूल्य नियंत्रण व्यवस्था से संबंधित अलग आंकड़ा है।
आपकी कैंसर की दवा सस्ती होगी या नहीं? ऐसे करें जांच
मरीज और उनके परिवार तीन कदम उठा सकते हैं:
- दवा का नाम जांचें: पैक पर लिखे ब्रांड नेम और सॉल्ट नेम को नोट करें।
- अंतिम सूची देखें: पुष्टि करें कि दवा NPPA की नई व्यवस्था में शामिल है या नहीं।
- नई MRP की पुष्टि करें: संशोधित मूल्य लागू होने के बाद अधिकृत फार्मेसी या अस्पताल से नई कीमत की जानकारी लें।
सिर्फ सरकारी घोषणा के आधार पर दवा बदलना, उसकी खुराक में बदलाव करना या इलाज रोकना उचित नहीं है। किसी भी बदलाव के लिए डॉक्टर की सलाह जरूरी है।
निष्कर्ष: अंतिम सूची और नई कीमतों पर रहेगी नजर
केंद्र सरकार का यह फैसला कैंसर के इलाज को अधिक किफायती बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। 30% ट्रेड मार्जिन की सीमा से उन दवाओं की कीमतों में राहत मिलने की उम्मीद है, जिनकी मौजूदा MRP में आपूर्ति श्रृंखला के मार्जिन का बड़ा योगदान है।
हालांकि, 70% तक की कमी सभी दवाओं पर लागू होने की गारंटी नहीं है। मरीजों को वास्तविक लाभ कब और कितना मिलेगा, यह विशेषज्ञ समिति की अंतिम सूची, NPPA की अधिसूचना और बाजार में नई कीमतों के लागू होने के बाद स्पष्ट होगा।
स्रोत: भारत सरकार का प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB), औषध विभाग, NPPA तथा Business Standard, Financial Express, Hindustan Times, India Today और The Economic Times की संबंधित रिपोर्टें।
