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पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की डिजिटल जिंदगी खंगालने की कोशिश पर रोक, सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस का नोटिस किया रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के X अकाउंट से तीन महीने का डिजिटल डेटा मांगने वाला उत्तर प्रदेश पुलिस का नोटिस रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि घटना से पहले की अवधि का निजी डेटा मांगना ‘ओवरकिल’ यानी जरूरत से ज्यादा कार्रवाई है और जुटाई गई जानकारी का इस्तेमाल पत्रकार के खिलाफ नहीं किया जाएगा।

Sonali16 अक्टू. 2026, 03:56 PM IST
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पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की डिजिटल जिंदगी खंगालने की कोशिश पर रोक, सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस का नोटिस किया रद्द

  14 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने यह आदेश दिया। सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि कथित घटना की तारीख से पहले के तीन महीने का डेटा हासिल करना जरूरत से ज्यादा कार्रवाई है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस जांच के दौरान निजी और गोपनीय डिजिटल जानकारी हासिल करने की भी सीमाएं हैं। घटना से पहले की अवधि का निजी डेटा नहीं मांगा जा सकता। वहीं, FIR दर्ज होने के बाद की जानकारी भी तब तक नहीं मांगी जानी चाहिए, जब तक आरोपी का पता लगाने या उसे गिरफ्तार करने के दूसरे उपाय अपर्याप्त साबित न हों। यह मामला गाजियाबाद के इंदिरापुरम पुलिस स्टेशन में दर्ज रोड रेज की FIR से जुड़ा है। पुलिस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X को नोटिस भेजकर अभिषेक उपाध्याय के अकाउंट से संबंधित डिजिटल जानकारी मांगी थी। इसमें लॉगिन और लॉगआउट IP एड्रेस, ईमेल आईडी, IMEI नंबर और रजिस्ट्रेशन लॉग जैसी जानकारियां शामिल थीं। सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर से पूछा था कि रोड रेज के मामले में पत्रकार के X अकाउंट की जानकारी क्यों मांगी गई। पुलिस कमिश्नर ने अपने हलफनामे में कहा था कि यह जानकारी पत्रकार का पता लगाने, उसकी गिरफ्तारी और जांच में मदद के लिए मांगी गई थी। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि पुलिस कमिश्नर की ओर से दिया गया स्पष्टीकरण नोटिस में मांगी गई जानकारी की प्रकृति से पूरी तरह मेल नहीं खाता।

क्या है पूरा मामला?

अभिषेक उपाध्याय एक खोजी पत्रकार हैं, जिन्होंने श्री राम जन्मभूमि मंदिर में कथित दान राशि के दुरुपयोग से जुड़ी रिपोर्टिंग की थी। उनके खिलाफ आरोप है कि उन्होंने गाजियाबाद में शिप्रा मॉल के पास अपनी कार से एक मोटरसाइकिल सवार को टक्कर मारी, शिकायतकर्ता को धमकी दी और जातिसूचक टिप्पणी की। उपाध्याय ने इन आरोपों से इनकार किया है। उनका दावा है कि उनकी पत्रकारिता के कारण उन्हें निशाना बनाने के लिए इस घटना को अंजाम दिया गया था। उन्होंने गाजियाबाद के इंदिरापुरम पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। 25 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अंतरिम संरक्षण देते हुए उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाई थी और पुलिस को FIR की प्रति उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था, ताकि वह उचित कानूनी उपाय अपना सकें।

पत्रकार को मिली अंतरिम सुरक्षा जारी, जब्त वाहन छोड़ने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने अभिषेक उपाध्याय को दी गई अंतरिम सुरक्षा को अंतिम सुनवाई तक जारी रखने के बजाय जांच में उनके सहयोग की शर्त पर प्रभावी बनाए रखा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह FIR की सामग्री पर कोई राय व्यक्त नहीं कर रहा है। उपाध्याय को सक्षम हाईकोर्ट में FIR को चुनौती देने की स्वतंत्रता भी दी गई है। इसके अलावा, पत्रकार का वाहन पुलिस ने जब्त कर लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने वाहन तत्काल छोड़ने का निर्देश दिया और कहा कि इसे अधिकतम दो दिनों के भीतर रिलीज किया जाए। निजी और डिजिटल डेटा जुटाने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश तैयार करने के मुद्दे पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस पर किसी उपयुक्त याचिका में विचार किया जा सकता है। कोर्ट ने संबंधित पक्ष को सक्षम न्यायालय का रुख करने की स्वतंत्रता दी। इस मामले में अभिषेक उपाध्याय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप राय और अधिवक्ता अनूप कुमार अवस्थी पेश हुए।