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घरेलू हिंसा मामले में 6 साल बाद कल्याण कोर्ट का आदेश, नाबालिग बेटे को हर महीने ₹30 हजार देगा पिता
कल्याण कोर्ट ने घरेलू हिंसा के मामले में पति को नाबालिग बेटे के भरण-पोषण के लिए हर महीने ₹30 हजार देने का आदेश दिया। अदालत ने घरेलू हिंसा साबित मानते हुए पति पर पाबंदियां लगाईं, लेकिन पत्नी का ₹55 लाख मुआवजे का दावा खारिज कर दिया।

कल्याण की न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी अदालत ने घरेलू हिंसा के मामले में पति को नाबालिग बेटे के भरण-पोषण के लिए हर महीने 30,000 रुपये देने का आदेश दिया है। अदालत ने पति के खिलाफ घरेलू हिंसा के आरोपों को साबित माना और उसे पत्नी के साथ घरेलू हिंसा नहीं करने तथा उससे संपर्क नहीं करने का निर्देश दिया। हालांकि, पत्नी की ओर से मांगे गए 55 लाख रुपये के मुआवजे और किराये के भत्ते की मांग खारिज कर दी गई। न्यायिक मजिस्ट्रेट निलेश प्रभाकर वासडे ने 6 अक्टूबर 2026 को यह फैसला सुनाया।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला हर्षदा दर्शनकुमार पंडित और उनके पति दर्शनकुमार मयंकभाई पंडित के वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। दोनों की शादी 12 जून 2014 को हुई थी। हर्षदा ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत अदालत में आवेदन दाखिल कर पति और ससुराल पक्ष पर मानसिक प्रताड़ना तथा आर्थिक परेशानियां देने के आरोप लगाए थे। हर्षदा के अनुसार, उन्होंने वैवाहिक जीवन और परिवार की जरूरतों पर बड़ी रकम खर्च की। इसमें नैनो कार के लिए 2 लाख रुपये, संयुक्त खाते में 20 लाख रुपये जमा करना, अमेरिका यात्रा पर करीब 4 लाख रुपये खर्च करना और एलआईसी की किस्तों के रूप में 1,40,527 रुपये देना शामिल था। उन्होंने घरेलू खर्चों का बोझ उठाने की बात भी कही। हर्षदा ने अदालत से सुरक्षा आदेश, किराये का भत्ता, नाबालिग बेटे के लिए हर महीने 55,000 रुपये भरण-पोषण और 55 लाख रुपये मुआवजे की मांग की थी। दंपती का बेटा 19 जून 2019 को पैदा हुआ था।
पति ने आरोपों से किया इनकार
पति ने आरोपों को नकारते हुए कहा कि उनके बीच सामान्य वैवाहिक मतभेद थे और पत्नी ने अपनी इच्छा से खर्च किए थे। पति ने यह भी दावा किया कि वह अब नौकरी नहीं कर रहे हैं। मामले में सास की मृत्यु के कारण उनके खिलाफ कार्यवाही समाप्त हो गई थी, जबकि ससुर के खिलाफ घरेलू हिंसा साबित नहीं हुई। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और पत्नी की गवाही पर विचार करते हुए पति के खिलाफ घरेलू हिंसा के आरोपों को साबित माना। अदालत ने पति को पत्नी के साथ घरेलू हिंसा करने और उससे संपर्क करने से रोकने का आदेश दिया।
नौकरी छोड़ने से बेटे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी खत्म नहीं
भरण-पोषण के मुद्दे पर अदालत ने पति की बेरोजगारी की दलील स्वीकार नहीं की। आदेश के अनुसार, पति ने फरवरी 2024 में इस्तीफा देने के लिए आवेदन किया था, जिसे अप्रैल 2024 में स्वीकार किया गया। यह घटनाक्रम अंतरिम भरण-पोषण की कार्यवाही लंबित रहने के दौरान हुआ था। अदालत ने माना कि नौकरी छोड़ देने मात्र से पिता की नाबालिग बेटे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। इसलिए पति को 6 अक्टूबर 2026 से बेटे के लिए हर महीने 30,000 रुपये देने का निर्देश दिया गया। यह राशि प्रत्येक महीने की 10 तारीख तक बेटे के एसबीआई बैंक खाते में जमा करनी होगी।
पत्नी को किराया भत्ता और 55 लाख रुपये का मुआवजा नहीं
अदालत ने पत्नी की स्वयं की आय को ध्यान में रखते हुए किराये के भत्ते की मांग खारिज कर दी। पत्नी ने अपनी नौकरी से लगभग 85,000 रुपये मासिक आय होने की बात कही थी। अदालत ने 55 लाख रुपये के मुआवजे की मांग भी खारिज कर दी, क्योंकि इस राशि के नुकसान या दावे को पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित नहीं किया गया।
इस तरह अदालत ने आवेदन को आंशिक रूप से मंजूर करते हुए पति के खिलाफ सुरक्षा आदेश और बेटे के भरण-पोषण का निर्देश दिया। अदालत ने दोनों पक्षों को अपने-अपने मुकदमे का खर्च स्वयं उठाने का आदेश दिया। फैसले की प्रति संबंधित संरक्षण अधिकारी और पुलिस थाने को भेजने का भी निर्देश दिया गया।
