general
YES Bank संकट पर सुप्रीम कोर्ट की RBI की भूमिका पर सवाल, कहा- प्रशासनिक चूक का खामियाजा निवेशक क्यों भुगतें?
सुप्रीम कोर्ट ने यस बैंक के ₹8,415 करोड़ के AT-1 बॉन्ड राइट-ऑफ मामले में RBI, केंद्र सरकार और बैंक की अपीलें खारिज कर दीं। कोर्ट ने RBI की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रशासनिक चूक का खामियाजा निवेशकों को भुगतने के लिए मजबूर करना अनुचित है।

15 अक्टूबर 2026 को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यस बैंक के प्रशासक को AT-1 बॉन्ड पूरी तरह राइट-डाउन करने का अधिकार नहीं था, क्योंकि केंद्र सरकार की ओर से अधिसूचित पुनर्गठन योजना में ऐसा कोई प्रावधान शामिल नहीं था। कोर्ट ने कहा कि प्रशासक ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई की थी।
क्या है ₹8,415 करोड़ के AT-1 बॉन्ड का मामला?
यस बैंक ने दिसंबर 2016 में ₹3,000 करोड़ और अक्टूबर 2017 में ₹5,415 करोड़ के Basel III अनुरूप Additional Tier-1 (AT-1) बॉन्ड जारी किए थे। इन बॉन्ड के लिए Axis Trustee Services Limited को ट्रस्टी नियुक्त किया गया था। AT-1 बॉन्ड बैंक की पूंजी जुटाने का एक माध्यम हैं, लेकिन इनमें जोखिम अधिक होता है। बैंक की वित्तीय स्थिति गंभीर होने पर निर्धारित शर्तों के तहत इन बॉन्ड को राइट-डाउन यानी उनकी देय राशि को आंशिक या पूरी तरह समाप्त किया जा सकता है। यस बैंक की वित्तीय स्थिति बिगड़ने पर केंद्र सरकार ने 5 मार्च 2020 को बैंक पर मोरेटोरियम लगाया। उसी दिन RBI ने बैंक के निदेशक मंडल को हटाकर प्रशासक नियुक्त किया। इसके बाद 6 मार्च को बैंक की पुनर्गठन योजना का मसौदा जारी किया गया, जिसमें AT-1 बॉन्ड को पूरी तरह राइट-डाउन करने का प्रावधान था। हालांकि, निवेशकों और बॉन्डधारकों की आपत्तियों के बाद 13 मार्च 2020 को अधिसूचित अंतिम पुनर्गठन योजना से यह प्रावधान हटा दिया गया। इसके बावजूद अगले दिन, 14 मार्च 2020 को बैंक के प्रशासक ने ₹8,415 करोड़ के दोनों AT-1 बॉन्ड पूरी तरह राइट-डाउन कर दिए। इसी कार्रवाई को बॉन्डधारकों ने अदालत में चुनौती दी थी।
अंतिम योजना से प्रावधान हटने के बाद भी बॉन्ड राइट-डाउन क्यों किए?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मसौदा योजना और अंतिम योजना की तुलना करने पर साफ दिखाई देता है कि AT-1 बॉन्ड को पूरी तरह राइट-डाउन करने वाला प्रावधान अंतिम योजना में शामिल नहीं था। अदालत के मुताबिक, केंद्र सरकार ने निवेशकों की आपत्तियों पर विचार करने के बाद योजना को अंतिम रूप दिया था। ऐसे में प्रशासक के लिए उस प्रावधान को लागू करना संभव नहीं था, जिसे अंतिम योजना से हटा दिया गया था। अदालत ने कहा कि प्रशासक यह मानकर नहीं चल सकता था कि पुनर्गठन योजना लागू होने के बाद भी उसके पास बॉन्ड राइट-डाउन करने की अलग से शक्ति बची हुई है। किसी सामान्य प्रावधान के आधार पर ऐसी विशिष्ट शक्ति नहीं मानी जा सकती, जिसे संबंधित योजना में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया हो। पीठ ने यह भी कहा कि प्रशासक ने जिस कार्रवाई को अंजाम दिया, वह पुनर्गठन योजना और RBI के मास्टर सर्कुलर के अनुरूप नहीं थी। इस आधार पर बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला सही ठहराया गया।
CET1 अनुपात 0.6 प्रतिशत तक गिरा, फिर भी RBI ने खुद कार्रवाई नहीं की
फैसले में बैंक की वित्तीय स्थिति का भी विस्तार से उल्लेख किया गया। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, 31 दिसंबर 2019 तक यस बैंक का CET1 अनुपात गिरकर 0.6 प्रतिशत रह गया था, जबकि उस समय नियामकीय आवश्यकता 7.375 प्रतिशत थी। CET1 अनुपात बैंक की मुख्य गुणवत्ता वाली पूंजी को दर्शाता है, जो वित्तीय नुकसान सहने की क्षमता का महत्वपूर्ण संकेतक है। अदालत ने कहा कि RBI के नियमों के तहत बैंक के गैर-व्यवहार्य होने की स्थिति में AT-1 बॉन्ड को राइट-डाउन करने या इक्विटी में बदलने का अधिकार RBI के पास था। लेकिन इस मामले में RBI ने स्वयं यह कार्रवाई नहीं की। इसके बजाय RBI द्वारा नियुक्त प्रशासक ने बॉन्ड राइट-डाउन करने का आदेश जारी कर दिया।
पीठ ने स्पष्ट किया कि RBI के प्रशासक की भूमिका बैंक के निदेशक मंडल के स्थान पर काम करने की थी। वह नियामक की शक्तियों को अपने हाथ में लेकर ऐसी कार्रवाई नहीं कर सकता था, जिसका अधिकार उसे कानून या संबंधित योजना से प्राप्त नहीं था।
व्यक्तिगत निवेशकों को जोखिम भरे बॉन्ड बेचने पर भी नाराजगी
सुप्रीम कोर्ट ने यस बैंक की ओर से व्यक्तिगत निवेशकों को AT-1 बॉन्ड बेचने पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि ये उच्च जोखिम वाले वित्तीय साधन हैं और RBI के मास्टर सर्कुलर के अनुसार इन्हें संस्थागत निवेशकों को पेश किया जाना था। कोर्ट ने पाया कि यस बैंक ने व्यक्तिगत निवेशकों को ऐसे बॉन्ड खरीदने की अनुमति देने के साथ-साथ उन्हें सक्रिय रूप से बेचने का काम भी किया। फैसले में SEBI के जवाब का उल्लेख किया गया, जिसके अनुसार बॉन्ड की बिक्री में भूमिका निभाने वाली एक निजी वेल्थ मैनेजमेंट फर्म और यस बैंक के तत्कालीन प्रबंध निदेशक पर जुर्माना भी लगाया गया था। अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत निवेशकों को ऐसे जोखिम भरे वित्तीय उत्पादों की ओर आकर्षित करने से पहले अधिक सख्त निगरानी और जांच होनी चाहिए थी।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी अपीलें खारिज कीं
सुप्रीम कोर्ट ने यस बैंक, RBI और केंद्र सरकार की ओर से दायर अपीलें खारिज कर दीं और बॉम्बे हाईकोर्ट के 20 जनवरी 2023 के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने निर्देश दिया कि बॉन्ड पर वार्षिक कूपन भुगतान संबंधित सूचना ज्ञापन की शर्तों के अनुसार जारी रहेगा। पक्षकारों को अपना-अपना मुकदमे का खर्च स्वयं वहन करने का निर्देश दिया गया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया कि बैंकिंग संकट के दौरान वित्तीय स्थिरता बनाए रखना महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके नाम पर नियामकीय नियमों और कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार नहीं किया जा सकता। बैंक के पुनर्गठन और निवेशकों के हितों से जुड़े फैसले निर्धारित अधिकारों और नियमों के भीतर ही लिए जाने चाहिए।
