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मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने के आरोपों पर बंगाल में सियासी संग्राम

पश्चिम बंगाल में मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाए जाने के आरोपों को लेकर राजनीतिक विवाद गहरा गया है। टीएमसी नेताओं और मुस्लिम संगठनों ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा मुद्दा बताते हुए मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप और हाईकोर्ट का रुख करने की बात कही है। वहीं भाजपा का कहना है कि ध्वनि प्रदूषण संबंधी नियमों और अदालत के निर्देशों का पालन सभी धार्मिक स्थलों पर समान रूप से होना चाहिए। इस विवाद ने धार्मिक अधिकार, कानून के समान अनुपालन और प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

Anshuman Mishra07 अग. 2026, 08:08 PM IST
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मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने के आरोपों पर बंगाल में सियासी संग्राम


कोलकाता: पश्चिम बंगाल में मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाए जाने के आरोपों ने राज्य की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। इस मुद्दे पर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), विपक्षी दलों और मुस्लिम संगठनों के बीच तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। मामला अब केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके खिलाफ अदालत जाने और राज्यव्यापी आंदोलन की चेतावनी भी दी गई है।

विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब टीएमसी नेता और जमीयत उलेमा-ए-हिंद (पश्चिम बंगाल) के प्रमुख सिद्दीकुल्ला चौधरी ने आरोप लगाया कि राज्य के विभिन्न जिलों में पुलिस प्रशासन मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने या उनकी आवाज कम करने का दबाव बना रहा है। उन्होंने दावा किया कि कई स्थानों पर बिना पर्याप्त कारण धार्मिक स्थलों से ध्वनि विस्तारक यंत्र हटाए गए, जिससे मुस्लिम समुदाय में असंतोष पैदा हुआ।


क्या है पूरा मामला?

हाल के दिनों में पश्चिम बंगाल के कई जिलों से ऐसी शिकायतें सामने आईं कि प्रशासन ने मस्जिदों में लगे लाउडस्पीकरों को लेकर कार्रवाई की है। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया कि 1,500 से अधिक लाउडस्पीकर हटाए गए हैं। हालांकि राज्य सरकार या पुलिस की ओर से इस संख्या की आधिकारिक पुष्टि सार्वजनिक रूप से नहीं की गई है। प्रशासनिक स्तर पर यह कहा गया कि जहां भी कार्रवाई हुई है, वह सर्वोच्च न्यायालय और ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण संबंधी नियमों के अनुरूप की गई है।


बागी टीएमसी विधायक भी मैदान में

इस मुद्दे पर टीएमसी के कुछ बागी विधायकों ने भी नाराजगी जताई है। विधायक अक्रुज्जामान ने कहा कि उन्हें भी कई क्षेत्रों से शिकायतें मिली हैं। उन्होंने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता देता है। उनके अनुसार मंदिरों में घंटियां बजती हैं, मस्जिदों में अजान होती है और चर्च में प्रार्थना होती है, इसलिए किसी भी धार्मिक परंपरा के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। उन्होंने घोषणा की कि प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात कर इस मामले में हस्तक्षेप की मांग करेगा।


विपक्ष और मुस्लिम संगठनों का रुख

इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) के विधायक नौशाद सिद्दीकी ने कहा है कि इस मामले को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी जाएगी। उन्होंने आरोप लगाया कि यदि धार्मिक संस्थानों के साथ भेदभावपूर्ण कार्रवाई की गई है तो इसकी न्यायिक समीक्षा आवश्यक है।

सिद्दीकुल्ला चौधरी ने भी चेतावनी दी कि यदि कार्रवाई नहीं रुकी तो राज्यभर में लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन किया जाएगा।


बीजेपी का जवाब

भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक बताया। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने कहा कि भारत कानून के शासन वाला लोकतांत्रिक देश है और सभी को अपनी बात रखने का अधिकार है। उन्होंने यह भी कहा कि ध्वनि प्रदूषण और न्यायालय के आदेशों का पालन सभी धर्मों के लोगों को समान रूप से करना चाहिए। उनके अनुसार किसी भी समुदाय के लिए अलग नियम नहीं हो सकते।


कानूनी पहलू क्या कहता है?

भारत में धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर के उपयोग को पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं किया गया है, लेकिन इसका संचालन कानून के तहत निर्धारित शर्तों के अनुसार होता है।सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न फैसलों में स्पष्ट किया है कि धर्म की स्वतंत्रता संविधान का मौलिक अधिकार है, लेकिन यह अधिकार सार्वजनिक स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण के नियमों से ऊपर नहीं हो सकता। ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियम, 2000 के तहत निर्धारित डेसिबल सीमा का पालन करना अनिवार्य है। रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक सामान्य परिस्थितियों में लाउडस्पीकर के उपयोग पर प्रतिबंध रहता है। विशेष अवसरों पर राज्य सरकार सीमित छूट दे सकती है।


क्या धार्मिक स्थलों पर कार्रवाई केवल मस्जिदों तक सीमित है?

देश के विभिन्न राज्यों में समय-समय पर मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च सहित सभी धार्मिक स्थलों पर ध्वनि प्रदूषण नियमों के पालन को लेकर प्रशासनिक कार्रवाई की जाती रही है। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक और अन्य राज्यों में भी अदालतों के निर्देशों के बाद धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर की आवाज नियंत्रित करने या बिना अनुमति लगे उपकरण हटाने जैसी कार्रवाई की गई है। इसी कारण कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी मामले में यह देखना जरूरी है कि कार्रवाई केवल एक समुदाय तक सीमित थी या सभी धार्मिक स्थलों पर समान रूप से नियम लागू किए गए।


यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?

यह विवाद केवल लाउडस्पीकर तक सीमित नहीं है बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता, संवैधानिक अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था और ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों से जुड़ा हुआ है। यदि प्रशासन कानून के तहत समान रूप से कार्रवाई करता है तो यह न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन का हिस्सा माना जाएगा। वहीं यदि किसी एक समुदाय के साथ भेदभाव के आरोप सिद्ध होते हैं तो मामला संवैधानिक अधिकारों और समानता के सिद्धांत से जुड़ सकता है। इसलिए यह मुद्दा राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी तीनों स्तरों पर महत्वपूर्ण बन गया है।


क्या हो सकते हैं संभावित प्रभाव?

यदि सभी धार्मिक स्थलों पर एक समान नियम लागू किए जाते हैं तो ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण को मजबूती मिलेगी और न्यायालय के निर्देशों का बेहतर पालन होगा। वहीं दूसरी ओर यदि कार्रवाई को लेकर पारदर्शिता नहीं रही या किसी समुदाय को निशाना बनाए जाने की धारणा बनी तो सामाजिक तनाव और राजनीतिक विवाद बढ़ सकते हैं। ऐसे मामलों में प्रशासन के लिए समानता, पारदर्शिता और संवैधानिक सिद्धांतों का पालन सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।


ताजा स्थिति

फिलहाल इस मामले में राजनीतिक बयानबाजी जारी है। विपक्षी नेता मुख्यमंत्री से मुलाकात की तैयारी कर रहे हैं, जबकि आईएसएफ ने हाईकोर्ट जाने की घोषणा की है। दूसरी ओर प्रशासन की ओर से आधिकारिक रूप से यह स्पष्ट किया जा रहा है कि सभी कार्रवाई कानून और न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप की जाती है। यदि न्यायालय में याचिका दायर होती है तो आने वाले दिनों में इस विवाद पर कानूनी स्थिति और अधिक स्पष्ट हो सकती है।