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9 साल पुराने घरेलू हिंसा मामले में कल्याण कोर्ट का फैसला, पत्नी को हर महीने सिर्फ ₹3,000 मासिक भत्ता देने का आदेश
कल्याण की अदालत ने करीब 9 साल पुराने घरेलू हिंसा मामले में पत्नी को राहत देते हुए पति को हर महीने ₹3,000 गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया है। प्रथमवर्ग न्यायिक दंडाधिकारी एस.जी.एस. खेतवाल ने पति समेत चार लोगों को महिला के खिलाफ किसी भी तरह की घरेलू हिंसा करने से भी रोक दिया। अदालत ने माना कि पति पर पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी है और महिला के पास वर्तमान में आय का कोई साधन नहीं है।

कल्याण।
महाराष्ट्र के कल्याण स्थित प्रथमवर्ग न्यायिक दंडाधिकारी के सातवें न्यायालय ने करीब 9 साल पुराने घरेलू हिंसा मामले में पत्नी को राहत देते हुए पति को हर महीने ₹3,000 गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया है। अदालत ने पति समेत चारों सामनेवालों को महिला के खिलाफ किसी भी तरह की घरेलू हिंसा करने से रोक दिया है। यह आदेश न्यायिक दंडाधिकारी एस.जी.एस. खेतवाल ने 21 सितंबर 2026 को सुनाया। मामला म.कौ.हिं.सं.का. अर्ज क्रमांक 151/2016 से संबंधित है। रेखा अमोल देशमुख ने अपने पति अमोल गोपाळराव देशमुख और परिवार के अन्य सदस्यों के खिलाफ महिलाओं को घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005 की धाराओं 12, 18, 19, 20, 21 और 22 के तहत आवेदन दाखिल किया था। आवेदन 15 नवंबर 2016 को दाखिल और पंजीकृत हुआ था।
शादी के बाद मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का आरोप
आवेदिका के अनुसार, उनका विवाह 29 अप्रैल 2002 को कल्याण में हिंदू रीति-रिवाज से अमोल देशमुख के साथ हुआ था। दोनों की कोई संतान नहीं है। महिला का आरोप था कि शादी के करीब एक साल बाद पति और सास ने उसे मानसिक, शारीरिक, मौखिक और आर्थिक रूप से परेशान करना शुरू कर दिया। महिला ने आरोप लगाया कि उसे संतान नहीं होने, खाना बनाने और घर के कामकाज सहित कई बातों को लेकर ताने दिए जाते थे। उसने यह भी आरोप लगाया कि पति उसके साथ मारपीट करता था और कई बार गला दबाकर जान से मारने की कोशिश की। बाद में पति के रिश्तेदार भी वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप कर उसे परेशान करने लगे। अदालत के सामने महिला ने बताया कि 2015 में भी उसके साथ मारपीट की गई थी और 14 नवंबर 2015 को पति उसे मायके छोड़कर चला गया था। इसके बाद जून 2016 में कथित विवाद के बाद पति ने उसे मायके भेज दिया और बाद में फोन कर कहा कि वह उसके साथ नहीं रहना चाहता तथा नाशिक वापस न आए।
पति ने आरोपों से किया इनकार
पति ने अदालत में दाखिल जवाब में पत्नी के सभी आरोपों को झूठा बताया। उसका कहना था कि उसने पत्नी के साथ कभी शारीरिक या मानसिक हिंसा नहीं की। पति ने पत्नी पर खुद झगड़ने और आत्महत्या की धमकी देने के आरोप लगाए। पति ने यह भी दावा किया कि वह 2019 से बीमारी के कारण काम करने में असमर्थ है और उसकी आर्थिक स्थिति कमजोर है। हालांकि, जिरह के दौरान उसने स्वीकार किया कि वह वर्तमान में एक निजी एजेंसी में सुरक्षा गार्ड के रूप में काम करता है और उसे करीब ₹12,000 प्रति माह वेतन मिलता है।
अदालत ने साक्ष्यों पर क्या कहा?
अदालत ने दोनों पक्षों के शपथपत्र और दस्तावेजों का अवलोकन किया। पत्नी ने विवाह की पत्रिका और विवाह के फोटो अदालत में पेश किए थे। अदालत ने माना कि अमोल देशमुख आवेदिका के पति हैं और पति होने के नाते उन पर पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी है अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि पत्नी वर्तमान में कल्याण में पति से अलग रह रही है और उसके पास आय का कोई साधन नहीं है। वहीं पति के पास आय का साधन मौजूद है। जिरह के दौरान पति ने यह भी स्वीकार किया कि उसने पत्नी के नाम पर कोई आर्थिक बचत, निवेश या भविष्य के लिए कोई आर्थिक व्यवस्था नहीं की थी।
₹3 हजार मासिक गुजारा भत्ता देने का आदेश
इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने आवेदिका को संरक्षण और पोटगी की जरूरत मानते हुए आवेदन मंजूर कर लिया। अदालत ने पति अमोल देशमुख को आदेश दिया कि वह आदेश की तारीख से पत्नी को हर महीने ₹3,000 पोटगी उसके बैंक खाते में जमा करे। इसके अलावा पति समेत सामनेवाला क्रमांक 2 से 4 को निर्देश दिया गया कि वे भविष्य में आवेदिका के साथ किसी भी प्रकार की घरेलू हिंसा न करें। अदालत ने आदेश की प्रति महिला एवं बाल संरक्षण अधिकारी तथा बाजारपेठ पुलिस स्टेशन के पुलिस निरीक्षक को भी भेजने का निर्देश दिया, ताकि संरक्षण संबंधी आदेश का पालन सुनिश्चित किया जा सके।
