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POCSO पीड़िता को मुआवजे से नहीं कर सकते इनकार, चोट के निशान न मिलने पर भी मिलेगा ₹3 लाख: हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने स्पष्ट किया है कि मेडिकल रिपोर्ट में शारीरिक चोट या प्रवेशात्मक यौन हमले (Penetrative Sexual Assault) के निशान नहीं मिलने के आधार पर POCSO पीड़िता को मुआवजा देने से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला सम्मान कोष योजना के तहत मुआवजा पीड़िता को यौन हमले का सामना करने के कारण दिया जाता है, न कि केवल शरीर पर चोट लगने के आधार पर। न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने राज्य के अधिकारियों को पीड़िता को ₹3 लाख का मुआवजा आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने के 10 दिनों के भीतर देने का निर्देश दिया।

यह मामला लखनऊ के सरोजनी नगर थाने में दर्ज वर्ष 2022 के अपराध से संबंधित है। पीड़िता के पिता ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला सम्मान कोष नियम, 2015 के तहत पात्र होने के बावजूद उनकी बेटी को मुआवजा नहीं दिया गया। मामले में 7 दिसंबर 2022 को एफआईआर दर्ज हुई थी और 13 जनवरी 2023 को आरोपपत्र (Charge Sheet) दाखिल किया गया। आरोपपत्र में POCSO अधिनियम की धारा 4 के तहत प्रवेशात्मक यौन हमले का अपराध दर्शाया गया था। राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि जिला संचालन समिति ने मेडिकल रिपोर्ट में प्रवेशात्मक चोट के प्रमाण नहीं मिलने के आधार पर मुआवजे का दावा रोक दिया था। समिति का कहना था कि भविष्य में फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) की रिपोर्ट से आरोप की पुष्टि होने पर मामले पर दोबारा विचार किया जा सकता है।
चोट के निशान होना अनिवार्य नहीं: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने POCSO अधिनियम की धारा 3 और 4 का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रवेशात्मक यौन हमले के लिए शरीर पर चोट का मिलना अनिवार्य नहीं है। मेडिकल रिपोर्ट में चोट नहीं होने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि ऐसा अपराध हुआ ही नहीं। पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के Dalip Kumar @ Dalli बनाम State of Uttaranchal और Lok Mal @ Loku बनाम State of Uttar Pradesh मामलों का भी उल्लेख किया। इन फैसलों में कहा गया है कि यौन हमले के मामलों में शारीरिक चोटों का न होना अपने आप में पीड़िता के आरोपों को खारिज करने का आधार नहीं है।
मुआवजा तय करना समिति का ट्रायल नहीं
अदालत ने कहा कि योजना के तहत एफआईआर, चोट संबंधी मेडिकल रिपोर्ट और आरोपपत्र जैसे दस्तावेजों की उपलब्धता आवश्यक है। यदि एफआईआर और आरोपपत्र में POCSO अधिनियम की धारा 4 का अपराध दर्शाया गया है, तो जिला संचालन समिति केवल चोट के निशान नहीं मिलने के आधार पर विपरीत निष्कर्ष निकालकर मुआवजा खारिज नहीं कर सकती। पीठ ने यह भी कहा कि पीड़ितों को राहत देने के उद्देश्य से बनाई गई कल्याणकारी योजना की उदार व्याख्या की जानी चाहिए। मुआवजे का उद्देश्य यौन हमले से पीड़ित व्यक्ति को राहत और पुनर्वास उपलब्ध कराना है। हाईकोर्ट ने जिला संचालन समिति के फैसले को कानून और योजना के विपरीत बताते हुए याचिका का निस्तारण कर दिया। साथ ही, पीड़िता को ₹3 लाख का मुआवजा आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने के 10 दिनों के भीतर देने का निर्देश दिया।
