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पत्नी की पहली शादी से हुए बच्चे को भी देना होगा भरण-पोषण, स्वीकार करने के बाद जिम्मेदारी से नहीं भाग सकता पति: उत्तराखंड HC

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि कोई पति पत्नी की पिछली शादी से हुए बच्चे के बारे में पूरी जानकारी होने के बावजूद उसे वैवाहिक परिवार का हिस्सा स्वीकार करता है, तो बाद में वह बच्चे की जिम्मेदारी से इनकार नहीं कर सकता। कोर्ट ने पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं।

Sonali28 सित. 2026, 12:57 PM IST
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पत्नी की पहली शादी से हुए बच्चे को भी देना होगा भरण-पोषण, स्वीकार करने के बाद जिम्मेदारी से नहीं भाग सकता पति: उत्तराखंड HC


उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पत्नी की पहली शादी से हुए बच्चे के भरण-पोषण को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति महिला से विवाह करते समय उसके पिछले वैवाहिक संबंध और बच्चे के बारे में पूरी जानकारी रखता है और इसके बावजूद बच्चे को अपने वैवाहिक परिवार का हिस्सा स्वीकार करता है, तो बाद में वह उस बच्चे की जिम्मेदारी से इनकार नहीं कर सकता। जस्टिस आलोक महरा ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि जब पति ने मौजूदा परिस्थितियों की पूरी जानकारी होने के बावजूद वैवाहिक संबंध स्वीकार किया और बच्चे को परिवार का हिस्सा माना, तो वह बाद में अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता। कोर्ट के अनुसार, विवाह के समय पति को यह जानकारी थी कि उसकी पत्नी की पिछली शादी से एक बच्चा है। इसके बावजूद उसने महिला से विवाह किया और बच्चे को वैवाहिक परिवार में स्वीकार किया। ऐसे में बाद में बच्चे से यह कहते हुए संबंध या जिम्मेदारी से इनकार करना कि वह उसका जैविक बच्चा नहीं है, स्वीकार नहीं किया जा सकता।


हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि वैवाहिक संबंध केवल पति-पत्नी के बीच का रिश्ता नहीं है, बल्कि उससे जुड़ी परिस्थितियों और परिवार में पहले से मौजूद जिम्मेदारियों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। यदि पति ने बच्चे की स्थिति को जानते हुए उसे अपने परिवार का हिस्सा स्वीकार किया है, तो बाद में केवल जैविक पिता न होने के आधार पर उसके भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बचने की कोशिश नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को उन परिस्थितियों से पीछे हटने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जिन्हें उसने पूरी जानकारी के साथ स्वीकार करते हुए वैवाहिक संबंध स्थापित किया था। न्यायालय ने पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण से संबंधित आदेश को इसी आधार पर बरकरार रखा। इस फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे के साथ पति का व्यवहार और विवाह के बाद उसकी स्वीकार्यता महत्वपूर्ण है। अदालत ने माना कि जब पति ने बच्चे को जानते-बूझते हुए अपने वैवाहिक घर और पारिवारिक जीवन का हिस्सा बनाया, तो बाद में जिम्मेदारी से “मुकरना” उचित नहीं होगा। हाईकोर्ट का यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां विवाह से पहले पत्नी के बच्चे की जानकारी होने के बावजूद पति उसे स्वीकार करता है और बाद में भरण-पोषण की जिम्मेदारी से इनकार करता है।