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सौतेले पिता ने 6 साल की बच्ची से रेप के बाद की हत्या, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- घर के भीतर यौन अपराध में खुले अपराध जैसी गवाही जरूरी नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने 6 साल की सौतेली बेटी से रेप और हत्या के दोषी वारिस की सजा पर सुनवाई करते हुए कहा कि घर के भीतर हुए यौन अपराध में खुले अपराध जैसी गवाही की पुष्टि नहीं मांगी जा सकती। कोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए मौत की सजा को बिना remission के प्राकृतिक जीवन के अंत तक उम्रकैद में बदल दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि घर की चारदीवारी के भीतर बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों में अदालतें खुले स्थान पर किए गए अपराधों जैसी गवाही या प्रत्यक्ष पुष्टि की अपेक्षा नहीं कर सकतीं। ऐसे अपराध आमतौर पर गोपनीयता में होते हैं और इसलिए उसी स्तर की corroboration यानी पुष्टिकरण की मांग करना ऐसा मानक तय करना होगा, जिसे अपराध की प्रकृति के कारण पूरा करना लगभग असंभव है। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने यह टिप्पणी Waris v. State of Madhya Pradesh मामले में की। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी वारिस की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए उसकी मौत की सजा को बिना किसी remission के उसके प्राकृतिक जीवन के शेष समय तक कारावास में बदल दिया। फैसला 24 सितंबर 2026 को सुनाया गया।
कौन था आरोपी और बच्ची से क्या रिश्ता था?
इस मामले में आरोपी का नाम वारिस है। मृत बच्ची करीब छह साल की थी और वह वारिस की तीसरी पत्नी की पिछली शादी से हुई बेटी थी। इस तरह वारिस बच्ची का सौतेला पिता था। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक बच्ची और उसकी मां वारिस के साथ उसके घर में रहती थीं। बच्ची की मां ही मामले की मुख्य और एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी थीं।
2018 में सामने आया था पूरा मामला
अभियोजन के अनुसार वारिस ने बच्ची का लंबे समय तक यौन शोषण किया। 21 अप्रैल 2018 की घटना के दौरान बच्ची की हालत बिगड़ गई। उसकी मां ने बच्ची की स्थिति देखी और बाद में बच्ची ने अपनी मां को बताया कि वारिस ने उसके साथ गलत काम किया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस बयान को महत्वपूर्ण साक्ष्य माना। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार 21 अप्रैल की रात बच्ची ने अपनी मां को बताया था कि आरोपी ने उसके कपड़े उतारे, खुद कपड़े उतारे और उसके साथ गलत हरकत की। बच्ची बाद में जीवित नहीं बची और उसकी कही बात उसकी मां की गवाही के माध्यम से अदालत के सामने आई। सुप्रीम कोर्ट ने इसे भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) के तहत प्रासंगिक माना।
मां ने आरोपी को बच्ची का गला दबाते देखा
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार बच्ची की मां ने बताया कि घटना के बाद उसने आरोपी को बच्ची के गले से हाथ हटाते देखा था। बच्ची की हालत गंभीर थी। अदालत ने मां की गवाही को मेडिकल और वैज्ञानिक साक्ष्यों के साथ परखा और उसके मूल हिस्से को विश्वसनीय पाया। पोस्टमार्टम में बच्ची की मौत का कारण गला दबाने से हुई अस्फिक्सिया बताया गया। उसके शरीर पर यौन हिंसा से संबंधित चोट भी मिली। DNA जांच में बच्ची के कपड़ों पर मिले पुरुष Y-क्रोमोसोम का मिलान वारिस के Y-क्रोमोसोम DNA प्रोफाइल से हुआ।
आरोपी पर कौन-कौन सी धाराएं लगी थीं?
वारिस को IPC की धारा 376(2)(f), 376(2)(n), 376AB, 302 और 201 तथा POCSO Act की धाराओं 5 और 6 के तहत दोषी ठहराया गया था। ट्रायल कोर्ट ने 17 दिसंबर 2018 को धारा 302 और 376AB के तहत मौत की सजा सुनाई थी। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 18 नवंबर 2019 को दोषसिद्धि और मौत की सजा दोनों को बरकरार रखा था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने मां की गवाही पर क्यों भरोसा किया?
बचाव पक्ष ने मां की गवाही में कथित विरोधाभास, omissions, improvements और उसके आचरण को आधार बनाकर उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाया था। यह भी तर्क दिया गया कि अगर वह लंबे समय तक बच्ची के साथ हो रहे अपराध के बारे में जानती थी तो उसने तुरंत पुलिस या परिवार के अन्य सदस्यों से शिकायत क्यों नहीं की।
सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को परिस्थितियों के संदर्भ में देखा। फैसले में कहा गया कि महिला की स्थिति, आरोपी का उस पर नियंत्रण और घरेलू माहौल को नजरअंदाज करके उसके व्यवहार को सामान्य परिस्थितियों में रहने वाले व्यक्ति के व्यवहार से नहीं परखा जा सकता। अदालत ने माना कि उसके बयान में मौजूद कुछ कमियां उसके बयान के मूल हिस्से को अविश्वसनीय नहीं बनातीं।
घर के भीतर अपराध में खुले अपराध जैसी corroboration नहीं मांगी जा सकती
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यौन अपराध आमतौर पर प्रत्यक्षदर्शियों की मौजूदगी में नहीं होते। खासकर घर के भीतर बच्चे के यौन शोषण में अपराधी, बच्चा और कभी-कभी परिवार का कोई ऐसा सदस्य मौजूद होता है, जो अपराध रोकने की स्थिति में नहीं होता। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में खुले स्थान पर हुए अपराधों जैसी corroboration मांगना ऐसा असंभव मानक तय करना होगा, जिसे अपराध की प्रकृति के कारण पूरा करना ही मुश्किल है। इससे घर की गोपनीयता का फायदा उठाने वाले अपराधियों को अनुचित लाभ मिल सकता है। पीठ ने State of Punjab v. Gurmit Singh (1996) 2 SCC 384 के सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि यौन अपराधों के मामलों में गवाही का मूल्यांकन संवेदनशीलता और वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। मामूली विरोधाभास या ऐसी छोटी विसंगतियां, जो अभियोजन के मामले के मूल हिस्से को प्रभावित नहीं करतीं, विश्वसनीय गवाही को खारिज करने का आधार नहीं होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा क्यों बदली?
सुप्रीम कोर्ट ने वारिस की दोषसिद्धि बरकरार रखी, लेकिन मौत की सजा को प्राकृतिक जीवन के अंत तक बिना remission वाली उम्रकैद में बदल दिया।
अदालत ने अपराध की गंभीरता को स्वीकार किया। फैसले में बच्ची के लगातार यौन शोषण, उसकी हत्या, अपराध छिपाने के लिए उसकी जान लेने, मेडिकल मदद नहीं दिलाने और शव को जल्दबाजी में ठिकाने लगाने के प्रयास जैसी परिस्थितियों को गंभीर aggravating circumstances माना गया। अदालत ने इसे बच्चे को चुप कराने के लिए की गई हत्या के रूप में भी देखा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी देखा कि मौत की सजा के मामले में आरोपी की व्यक्तिगत परिस्थितियों और सुधार की संभावना का भी मूल्यांकन जरूरी है। अदालत के सामने रखी गई mitigation material में आरोपी का कठिन बचपन, बचपन में मां को खोना, पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं होना और जेल में उसका संतोषजनक आचरण शामिल था। कोर्ट ने कहा कि राज्य यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपी के सुधार की संभावना पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने धारा 302 और 376AB के तहत दी गई मौत की सजा को ऐसी उम्रकैद में बदल दिया, जो आरोपी के प्राकृतिक जीवन के अंत तक चलेगी और जिसमें remission नहीं मिलेगा। बाकी सजाएं भी बरकरार रखी गईं और सभी substantive sentences को साथ-साथ चलाने का निर्देश दिया गया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक तरफ बच्चों के खिलाफ घर के भीतर होने वाले यौन अपराधों में गवाही के मूल्यांकन के लिए संवेदनशील और वास्तविक दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया, वहीं दूसरी तरफ मौत की सजा तय करते समय अपराध की गंभीरता के साथ आरोपी की व्यक्तिगत परिस्थितियों और सुधार की संभावना के स्वतंत्र मूल्यांकन को भी महत्वपूर्ण माना।
