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कर्जत में 32,490 पेड़ों की कटाई पर भड़के सयाजी शिंदे, बोले— ‘सह्याद्री को रेगिस्तान बनाना चाहते हैं क्या?’
मुंबई/रायगढ़: महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के कर्जत तालुका में टोरेंट पावर की प्रस्तावित जलविद्युत परियोजना को लेकर पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच बहस तेज हो गई है। परियोजना के लिए हजारों पेड़ों की कटाई की अनुमति दिए जाने के बाद स्थानीय नागरिकों, पर्यावरण प्रेमियों और विपक्षी नेताओं ने विरोध जताया है। अब अभिनेता और पर्यावरण कार्यकर्ता सयाजी शिंदे ने भी इस मुद्दे पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए राज्य सरकार से जंगलों और जैव विविधता की रक्षा करने की अपील की है।

मुंबई/रायगढ़: महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के कर्जत तालुका में टोरेंट पावर की प्रस्तावित जलविद्युत परियोजना को लेकर पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच बहस तेज हो गई है। परियोजना के लिए हजारों पेड़ों की कटाई की अनुमति दिए जाने के बाद स्थानीय नागरिकों, पर्यावरण प्रेमियों और विपक्षी नेताओं ने विरोध जताया है। अब अभिनेता और पर्यावरण कार्यकर्ता सयाजी शिंदे ने भी इस मुद्दे पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए राज्य सरकार से जंगलों और जैव विविधता की रक्षा करने की अपील की है।
पर्यावरण संरक्षण के लिए ‘सह्याद्री देवराई’ के माध्यम से काम करने वाले सयाजी शिंदे ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और वन विभाग से परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों पर गंभीरता से विचार करने का आग्रह किया है। उन्होंने सवाल उठाया कि विकास और बिजली उत्पादन के लिए क्या बड़े और पुराने पेड़ों तथा वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को नुकसान पहुंचाना जरूरी है? शिंदे के मुताबिक, सह्याद्री का जंगल महाराष्ट्र की नदियों, वर्षा चक्र और प्राकृतिक संतुलन के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने सरकार से अपील की कि विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय पेड़ों, पक्षियों, वन्यजीवों और जलीय जीवों के हितों को भी प्राथमिकता दी जाए। उन्होंने यह भी कहा कि पुराने, बड़े पेड़ों को काटकर दूसरी जगह छोटे पौधे लगाने से पर्यावरणीय नुकसान की पूरी भरपाई नहीं हो सकती। इसलिए सरकार को ऐसे नियम बनाने चाहिए जो प्राकृतिक जंगलों की रक्षा सुनिश्चित करें।
यह विवाद Torrent पावर से जुड़ी सैदोंगर-I कर्जत पंप्ड-स्टोरेज जलविद्युत परियोजना को लेकर है। आधिकारिक परियोजना दस्तावेजों के अनुसार, इसकी प्रस्तावित उत्पादन क्षमता 3,000 मेगावाट है। परियोजना रायगढ़ जिले के कर्जत तालुका के सैदोंगर, पाली, कोतवाल खलाटी और आसपास के गांवों में प्रस्तावित है। परियोजना के लिए लगभग 377 हेक्टेयर भूमि की जरूरत बताई गई है, जिसमें 233 हेक्टेयर वन भूमि और लगभग 144 हेक्टेयर गैर-वन भूमि शामिल है। लोकसत्ता की 26 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, वन विभाग की अनुमति से 32,490 पेड़ों की कटाई का मामला सामने आया है।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्थानीय विरोधियों की आशंका है कि बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से जंगलों का प्राकृतिक स्वरूप प्रभावित हो सकता है। इससे वन्यजीवों के आवास, जैव विविधता और स्थानीय पारिस्थितिकी पर असर पड़ने की चिंता जताई जा रही है। परियोजना के लिए तैयार पर्यावरणीय दस्तावेज में भी वन भूमि के उपयोग और वनस्पति हटाने से वन्यजीवों के आवास पर संभावित प्रभाव का उल्लेख किया गया है। हालांकि, वास्तविक प्रभाव कितना होगा, यह परियोजना के क्रियान्वयन, पर्यावरण प्रबंधन और संरक्षण उपायों पर निर्भर करेगा।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने परियोजना का बचाव करते हुए कहा है कि निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं के तहत आवश्यक मंजूरियां ली गई हैं। सरकार का तर्क है कि पंप्ड-स्टोरेज परियोजना बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने और सौर ऊर्जा उपलब्ध न होने के समय बिजली की आपूर्ति में मदद कर सकती है। सरकार के अनुसार, परियोजना से स्वच्छ ऊर्जा व्यवस्था को मजबूती मिलेगी और महाराष्ट्र को निवेश तथा रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा है कि स्थानीय लोगों की शिकायतों पर विचार किया जाएगा।
इस मामले में एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। सोशल मीडिया और कुछ रिपोर्टों में भीमाशंकर अभयारण्य के भीतर अवैध पेड़ कटाई की आशंका जताई गई थी। हालांकि, महाराष्ट्र वन्यजीव विभाग ने 26 अक्टूबर 2026 को स्पष्ट किया कि अभयारण्य के भीतर परियोजना के लिए अवैध वृक्ष कटाई नहीं हो रही है। विभाग और कंपनी के अनुसार, परियोजना स्थल भीमाशंकर वन्यजीव अभयारण्य से लगभग 16 किलोमीटर और भीमाशंकर मंदिर से करीब 20 किलोमीटर दूर है। उनके दावे के मुताबिक, परियोजना के घटक अभयारण्य की सीमा और पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र से बाहर हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि परियोजना के वन भूमि पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर उठाए गए सभी सवाल निराधार हैं; दोनों मुद्दों को अलग-अलग समझना जरूरी है।
कर्जत की यह परियोजना महाराष्ट्र में विकास, ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर एक बड़ी बहस बनती जा रही है। जहां सरकार इसे भविष्य की बिजली जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण बता रही है, वहीं सयाजी शिंदे और अन्य पर्यावरण समर्थक प्राकृतिक जंगलों को होने वाले संभावित नुकसान पर सवाल उठा रहे हैं। अब इस पूरे मामले में परियोजना की मंजूरियों, पेड़ कटाई के आदेश, वन भूमि के उपयोग और पर्यावरण संरक्षण की शर्तों को पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक करना महत्वपूर्ण होगा। साथ ही, स्थानीय निवासियों की चिंताओं और पुनर्वनीकरण के उपायों की प्रभावशीलता पर भी स्पष्ट जानकारी सामने आनी चाहिए।
मुख्य सवाल यही है कि क्या ऊर्जा जरूरतों को पूरा करते हुए सह्याद्री के जंगलों और उसकी जैव विविधता को सुरक्षित रखने का बेहतर रास्ता निकाला जा सकता है?
