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13 साल पुरानी संपत्ति-वसीयत की लड़ाई खत्म, भिवंडी जिला कोर्ट ने चुनौती देने वाली अपील खारिज की

13 साल पुरानी संपत्ति और वसीयत की कानूनी लड़ाई में भिवंडी जिला कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने 1989 और 1999 में की गई दोनों वसीयतों को वैध माना और कहा कि संपत्ति की मालकिन चंगुनाबाई नंदकर को अपनी संपत्ति वसीयत करने का पूरा अधिकार था। कोर्ट ने यह भी माना कि वसीयत की जानकारी 2001 में ही होने के बावजूद 2008 में मुकदमा दायर किया गया, इसलिए दावा Limitation Act के तहत समय-सीमा से बाहर था।

Sonali26 सित. 2026, 03:05 PM IST
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13 साल पुरानी संपत्ति-वसीयत की लड़ाई खत्म, भिवंडी जिला कोर्ट ने चुनौती देने वाली अपील खारिज की

भिवंडी जिला कोर्ट ने करीब 13 साल पुरानी संपत्ति और वसीयत से जुड़ी कानूनी लड़ाई में अहम फैसला सुनाते हुए वसीयत को चुनौती देने वाली अपील खारिज कर दी है। जिला न्यायाधीश-3, भिवंडी की अदालत ने माना कि दिवंगत चंगुनाबाई नंदकर संपत्ति की पूर्ण स्वामिनी थीं और उन्होंने 1989 तथा 1999 में जो वसीयत की थी, वे वैध और वास्तविक थीं। अदालत ने यह भी माना कि वसीयत को चुनौती देने वाला मुकदमा Limitation Act के तहत निर्धारित समय-सीमा के बाद दायर किया गया था। जिला न्यायाधीश-3 कुमारी एस.के. चौधरी ने 15 सितंबर 2026 को Regular Civil Appeal No.127/2023 पर फैसला सुनाया। यह अपील मूल रूप से R.C.S. No.40/2008 में 8 अप्रैल 2013 को जव्हार के सिविल जज जूनियर डिवीजन द्वारा दिए गए फैसले के खिलाफ दायर की गई थी।


मामला चंगुनाबाई नंदकर की संपत्ति से जुड़ा था। उनके बेटे नरेंद्र नंदकर के कानूनी वारिसों ने 18 अक्टूबर 1989 और 3 सितंबर 1999 की वसीयतों को चुनौती दी थी। उनका दावा था कि संबंधित संपत्ति पैतृक थी और चंगुनाबाई को उसे वसीयत के जरिए बांटने का पूर्ण अधिकार नहीं था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि वसीयत के समय चंगुनाबाई काफी उम्रदराज और अस्वस्थ थीं तथा वसीयत में संपत्ति का पर्याप्त विवरण नहीं था। दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने कहा कि संपत्ति चंगुनाबाई को उनके पिता की ओर से मिली थी और वह उनकी व्यक्तिगत संपत्ति थी। अदालत के सामने 1924 की एक अधिसूचना भी पेश की गई, जिससे यह सामने आया कि 'मामा साहिबाचा वाडा' नाम की संपत्ति चंगुनाबाई को उनके पिता की ओर से मिली थी। अदालत ने इस दस्तावेज और अन्य राजस्व रिकॉर्ड पर विचार करते हुए कहा कि चंगुनाबाई के पास संपत्ति पर पूर्ण अधिकार था। अदालत ने यह भी माना कि 1956 में Hindu Succession Act लागू होने के समय संपत्ति चंगुनाबाई के कब्जे और अधिकार में थी, इसलिए उनके अधिकार को पूर्ण स्वामित्व के रूप में देखा गया। अदालत ने राजस्व रिकॉर्ड से जुड़े पुराने विवाद को भी महत्वपूर्ण माना। नरेंद्र का नाम पहले संपत्ति के रिकॉर्ड में दर्ज था, लेकिन चंगुनाबाई ने इसे चुनौती दी थी। 21 जुलाई 1986 के राजस्व आदेश में चंगुनाबाई के अधिकार को स्वीकार किया गया और नरेंद्र का नाम हटाने का आदेश दिया गया था। इस आदेश को नरेंद्र ने अपने जीवनकाल में चुनौती नहीं दी।


वसीयत की वैधता पर अदालत ने कहा कि पहली वसीयत 18 अक्टूबर 1989 को की गई थी, जिसमें संपत्ति अविवाहित बेटी मंगला के नाम की गई थी। मंगला की मृत्यु 1998 में होने के बाद चंगुनाबाई ने 3 सितंबर 1999 को दूसरी वसीयत की, जिसमें संपत्ति अपनी अन्य बेटियों के पक्ष में की। अदालत ने वसीयत में नरेंद्र को पूरी तरह से बेदखल किए जाने की दलील भी स्वीकार नहीं की। फैसले के अनुसार, नरेंद्र के कब्जे वाले तीन कमरे उसके पास ही रहने दिए गए थे। अदालत ने माना कि वसीयत में नरेंद्र को संपत्ति से बाहर रखने के कारण भी बताए गए थे और उपलब्ध साक्ष्यों से इन परिस्थितियों की पुष्टि होती है। वसीयत में मेडिकल सर्टिफिकेट नहीं होने, अंगूठे का निशान होने, टाइपराइटर से दस्तावेज तैयार होने और कुछ शब्द अलग फॉन्ट में होने जैसी आपत्तियों को भी अदालत ने पर्याप्त संदेहजनक परिस्थिति नहीं माना। अदालत ने कहा कि किसी बुजुर्ग व्यक्ति की वसीयत के साथ मेडिकल सर्टिफिकेट होना कानूनी अनिवार्यता नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि वसीयतकर्ता स्वस्थ मानसिक स्थिति में अपनी इच्छा व्यक्त करने में सक्षम था या नहीं।


मुकदमे की Limitation पर अदालत ने विशेष रूप से कहा कि वसीयत को चुनौती देने का दावा Limitation Act के Article 59 के तहत आता है और तीन साल की अवधि उस समय से शुरू होती है जब चुनौती का अधिकार पहली बार उत्पन्न होता है। अदालत ने पाया कि नरेंद्र को 2001 में ही दोनों वसीयतों की जानकारी हो गई थी और उन्हें वसीयतों की प्रतियां भी दी गई थीं। इसके बावजूद 2008 में मुकदमा दायर किया गया। अदालत ने माना कि वसीयत को चुनौती देने का कारण 2001 में ही उत्पन्न हो गया था और 2008 में दायर मुकदमा निर्धारित समय-सीमा से बाहर था। अंततः जिला कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने Regular Civil Appeal No.127/2023 को लागत सहित खारिज कर दिया और 8 अप्रैल 2013 के ट्रायल कोर्ट के फैसले और डिक्री को बरकरार रखा। फैसले के अनुसार, दोनों वसीयतें वास्तविक मानी गईं और अपीलकर्ताओं को मांगी गई राहत देने का कोई आधार नहीं पाया गया।