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गवाहों के अभाव और दोषसिद्धि की कम संभावना के चलते 2003 के लूट मामले का निपटारा
करीब 23 साल पुराने लूट के मामले में केवल FIR प्रमाणित होने और अन्य ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं होने के कारण कल्याण कोर्ट ने आरोपी को आरोपमुक्त कर दिया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जब दोषसिद्धि की संभावना नहीं दिखती और आरोपी की पेशी भी सुनिश्चित होने की उम्मीद कम है, तो मुकदमे को अनिश्चितकाल तक लंबित रखना उचित नहीं है।

शिकायतकर्ता नीलेश शिवाजी देशमुख ने बयान में बताया कि 3 अप्रैल 2003 को रात करीब 10 बजे वह अपनी दुकान बंद करके घर जा रहे थे। इसी दौरान आरोपी ने कथित तौर पर उनका रास्ता रोका, चाकू दिखाकर धमकाया, गाली-गलौज और मारपीट की तथा उनकी सोने की चेन छीनकर फरार हो गया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। इस मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 392 और धारा 34 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। धारा 392 लूट के अपराध से संबंधित है, जबकि धारा 34 साझा इरादे से किए गए आपराधिक कृत्य से जुड़ी है।
वारंट और उद्घोषणा के बावजूद अदालत में पेश नहीं हुआ आरोपी
मामले का आरोपपत्र दाखिल होने के बाद आरोपी लंबे समय से फरार रहा। अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि वारंट और उद्घोषणा जारी किए जाने के बावजूद आरोपी की उपस्थिति सुनिश्चित नहीं हो सकी। इसके बाद दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 299 के तहत गवाहों के बयान दर्ज कराने की प्रक्रिया अपनाई गई।
शिकायतकर्ता नीलेश देशमुख ने अदालत में अपना बयान दर्ज कराया और प्राथमिकी (FIR) पर अपने हस्ताक्षर की पुष्टि करते हुए उसकी सामग्री को सही बताया। अदालत ने FIR को साक्ष्य के रूप में प्रमाणित माना। हालांकि, अन्य गवाह अदालत में पेश नहीं हुए। रिकॉर्ड में यह भी उल्लेख था कि कुछ गवाह दिए गए पते पर नहीं मिले और उनके बारे में कोई जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी।
केवल FIR के आधार पर दोष साबित करना पर्याप्त नहीं
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि FIR प्रमाणित होने के बावजूद, अन्य ठोस साक्ष्यों के अभाव में आरोपी के अपराध को साबित करने के लिए यह अपने आप में पर्याप्त नहीं है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के Satish Mehra बनाम Delhi Administration मामले में दिए गए सिद्धांत का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि जब मुकदमे में दोषसिद्धि की संभावना नहीं दिखाई देती, तो केवल औपचारिक प्रक्रिया पूरी करने के लिए न्यायालय का बहुमूल्य समय खर्च करना उचित नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि इतने लंबे समय बाद आरोपी की उपस्थिति भविष्य में सुनिश्चित होने की संभावना नहीं दिख रही थी। ऐसे में मामले को अनिश्चित समय तक लंबित रखने से कोई सार्थक परिणाम मिलने की उम्मीद नहीं थी।
CrPC की धारा 239 के तहत आरोपमुक्त करने का आदेश
कल्याण के प्रथम वर्ग न्यायिक दंडाधिकारी के छठे न्यायालय की न्यायाधीश के.एस. कातकाडे ने 28 सितंबर 2026 को आदेश पारित करते हुए विनोद उर्फ विक्की श्रीपाद सोनावणे को CrPC की धारा 239 के तहत आरोपमुक्त कर दिया। अदालत ने जमानत बांड, यदि कोई हो, रद्द करने का निर्देश भी दिया। आदेश में यह भी कहा गया कि जब्त की गई सोने की चेन अपील की अवधि समाप्त होने के बाद उसके वास्तविक हकदार को सौंप दी जाए। यदि कोई हकदार सामने नहीं आता है, तो चेन सरकारी खजाने में जमा कराई जाए। इसके साथ ही अदालत ने मामले का निपटारा कर दिया।
