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POCSO केस में हाईकोर्ट का फैसला: बच्ची का अंडरगारमेंट उतारना यौन हमले का प्रयास माना, आरोपी की सजा 7 से घटाकर 3.5 साल की

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि यौन इरादे से किसी बच्ची का अंडरगारमेंट उतारना, भले ही इसके आगे कोई दूसरा कृत्य न किया गया हो, यौन हमले का प्रयास माना जा सकता है। अदालत ने साढ़े तीन साल की बच्ची से जुड़े मामले में आरोपी की सजा पांच साल से घटाकर साढ़े तीन साल के कठोर कारावास में बदल दी। कोर्ट ने यह फैसला लैंगिक अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) की धारा 18 के तहत दिया, जो अपराध करने के प्रयास के लिए सजा का प्रावधान करती है।

Sonali24 अक्टू. 2026, 02:21 PM IST
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POCSO केस में हाईकोर्ट का फैसला: बच्ची का अंडरगारमेंट उतारना यौन हमले का प्रयास माना, आरोपी की सजा 7 से घटाकर 3.5 साल की

जस्टिस अभय एस. वाघवसे ने गणेश होतलप्पा उर्फ प्रभाकर पदमपल्ले की अपील पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। आरोपी ने बीड जिले के बिलौली स्थित विशेष अदालत के 17 दिसंबर 2025 के फैसले को चुनौती दी थी। विशेष अदालत ने उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354 और POCSO Act की धारा 9(एम) के साथ धारा 10 के तहत दोषी ठहराया था।

क्या है पूरा मामला?

अभियोजन पक्ष के अनुसार, 13 जून 2024 को आरोपी बच्ची को उसके पिता के वहां होने की बात कहकर मवेशियों के बाड़े में ले गया। वहां उसने अपना और बच्ची का अंडरगारमेंट उतार दिया। घटना के बाद बच्ची रोते हुए बाहर आई। बच्ची की मां और दादा ने आरोपी को वहां देखा। इसके बाद बच्ची ने उन्हें घटना के बारे में बताया।

परिवार की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच की। शुरुआत में आरोपी पर भारतीय दंड संहिता की धारा 376-AB और POCSO Act की धारा 4(2) के तहत आरोप लगाए गए थे। हालांकि, विशेष अदालत ने इन आरोपों से उसे बरी कर दिया, लेकिन धारा 354 और POCSO Act की धारा 9(एम) के साथ धारा 10 के तहत दोषी ठहराया।

आरोपी ने हाईकोर्ट में दलील दी कि बच्ची और उसकी मां के बयानों में अंतर है और मेडिकल रिपोर्ट से यौन प्रवेश की पुष्टि नहीं हुई। उसके अनुसार, उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर मामला अधिकतम यौन हमला करने के प्रयास का बनता है।

हाईकोर्ट ने साक्ष्यों में क्या पाया?

हाईकोर्ट ने बच्ची, उसकी मां और दादा के बयानों का विश्लेषण किया। अदालत ने पाया कि मां और दादा ने बच्ची द्वारा बताई गई घटना के बारे में अलग-अलग बातें कही थीं। मेडिकल जांच में बच्ची के निजी अंगों में कोई चोट नहीं मिली और डॉक्टर ने यौन प्रवेश की पुष्टि नहीं की। हालांकि, रिपोर्ट में गैर-प्रवेशकारी यौन हमले की संभावना से इनकार नहीं किया गया था। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों से आरोपी द्वारा यौन इरादे से बच्ची का अंडरगारमेंट उतारना साबित हुआ। आरोपी इसके आगे कोई कृत्य नहीं कर पाया। इसलिए उसका कृत्य यौन हमला करने का प्रयास माना जाएगा।

सजा क्यों घटाई गई?

POCSO Act की धारा 9(एम) के तहत 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चे के साथ गंभीर यौन हमले के लिए धारा 10 में कम से कम पांच साल और अधिकतम सात साल की सजा का प्रावधान है। वहीं, धारा 18 के अनुसार अपराध के प्रयास के मामले में अधिकतम सजा की आधी अवधि तक कारावास दिया जा सकता है। हाईकोर्ट ने सात साल की अधिकतम सजा की आधी अवधि यानी साढ़े तीन साल को आधार बनाया। इसके बाद अदालत ने आरोपी की सजा घटाकर साढ़े तीन साल के कठोर कारावास और 20,000 रुपये जुर्माने में बदल दी। जुर्माना नहीं भरने पर उसे छह महीने का अतिरिक्त कठोर कारावास भुगतना होगा। अदालत ने आरोपी की अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निचली अदालत के फैसले में संशोधन किया।

मामले का नाम: Ganesh Hotlappa @ Prabhakar Padampalle बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य।