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संपत्ति पर मालिकाना हक का विवाद है तो सिर्फ कब्जे का मुकदमा काफी नहीं, Sale Deed रद्द कराने की मांग भी जरूरी: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी संपत्ति पर मालिकाना हक को लेकर विवाद है, तो केवल उसका कब्जा वापस पाने के लिए मुकदमा करना काफी नहीं है। ऐसी स्थिति में वादी को संपत्ति के दूसरे व्यक्ति के नाम बने बिक्री दस्तावेज (Sale Deed) को रद्द कराने की मांग भी करनी होगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब प्रतिवादी ठोस सबूतों के साथ वादी के मालिकाना हक को चुनौती देता है, तो उसे केवल कब्जा वापस पाने का दावा करने के बजाय कानून के अनुसार उचित राहत मांगनी चाहिए।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह फैसला सुनाया। मामला एक ऐसे प्लॉट से जुड़ा था, जिसे 1952 में एक हाउसिंग सोसाइटी ने वादी को बेचने के समझौते (Agreement to Sell) के आधार पर आवंटित किया था। वादी ने बाद में प्लॉट अपने भतीजे के नाम करने का अनुरोध किया था।
क्या है पूरा मामला?
1952 में हाउसिंग सोसाइटी ने वादी को एक प्लॉट आवंटित किया था। शर्त थी कि उसे तीन साल के भीतर वहां मकान बनाना होगा। वादी मकान नहीं बना पाया। इसलिए उसने 4 अक्टूबर 1954 को सोसाइटी को पत्र लिखकर प्लॉट अपने भतीजे यानी प्रतिवादी नंबर 1 के नाम करने का अनुरोध किया। सोसाइटी ने यह अनुरोध स्वीकार कर लिया। इसके बाद भतीजे ने प्लॉट का कब्जा ले लिया, बकाया राशि चुकाई और 1959 तक वहां मकान भी बना लिया। साल 1960 में सोसाइटी ने भतीजे के नाम रजिस्टर्ड बिक्री दस्तावेज (Registered Sale Deed) बना दिया। हालांकि, मूल वादी के नाम कभी बिक्री का दस्तावेज नहीं बना था।
21 साल बाद कब्जा पाने के लिए किया मुकदमा
साल 1975 में मूल वादी के कानूनी उत्तराधिकारियों ने संपत्ति का कब्जा वापस पाने के लिए मुकदमा दायर किया। उन्होंने आरोप लगाया कि संपत्ति का हस्तांतरण धोखाधड़ी से किया गया था। हालांकि, उन्होंने न तो भतीजे के नाम बने 1960 के बिक्री दस्तावेज को रद्द करने की मांग की और न ही 1952 के बिक्री समझौते को लागू कराने के लिए मुकदमा किया। ट्रायल कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट ने उनका दावा खारिज कर दिया। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसले को बरकरार रखा। जस्टिस अरविंद कुमार ने कहा कि जब किसी व्यक्ति के मालिकाना हक पर विवाद नहीं होता, तब केवल कब्जा वापस पाने का दावा पर्याप्त हो सकता है। लेकिन जब दूसरा पक्ष ठोस सबूतों के साथ मालिकाना हक को चुनौती देता है, तो केवल कब्जा मांगना पर्याप्त नहीं है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल बिक्री का समझौता (Agreement to Sell) होने से संपत्ति का मालिकाना हक नहीं मिल जाता। इसके लिए कानून के अनुसार जरूरी दस्तावेज और प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए। पीठ ने कहा कि इस मामले में प्रतिवादी नंबर 1 के पास उसके नाम पर रजिस्टर्ड बिक्री दस्तावेज था, जबकि वादी के पक्ष में ऐसा कोई दस्तावेज नहीं था। ऐसे में वादी के कानूनी उत्तराधिकारियों को बिक्री दस्तावेज रद्द कराने या बिक्री समझौते को लागू कराने की मांग करनी चाहिए थी।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी और निचली अदालतों के फैसले को बरकरार रखा।
मामले का नाम: Smt. Rano Singh and Others Versus Sh. Gurbax Singh (D) Through LRs and Others
