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गिरफ्तारी के समय लिखित आधार नहीं बताए तो पुलिस अधिकारी पर होगी विभागीय जांच: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी के नियमों को लेकर बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि आरोपी को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध कराना अनिवार्य है। ऐसा नहीं करने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करनी होगी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अवैध घोषित गिरफ्तारी के बाद दोबारा गिरफ्तारी के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति और लिखित गिरफ्तारी आधार जरूरी होंगे, जबकि आगे की जांच किसी दूसरे अधिकारी को सौंपी जाएगी।

Sonali22 सित. 2026, 08:34 PM IST
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गिरफ्तारी के समय लिखित आधार नहीं बताए तो पुलिस अधिकारी पर होगी विभागीय जांच: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 21 सितंबर 2026 को गिरफ्तारी से जुड़े एक महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार को लेकर अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पुलिस अधिकारी किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय उसे गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध नहीं कराता है, तो ऐसी गिरफ्तारी अवैध मानी जाएगी। साथ ही, संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की जानी चाहिए। जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंद्रकुर की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार की जानकारी लिखित रूप में देना उसका मौलिक अधिकार है। यह जानकारी ऐसी भाषा में दी जानी चाहिए जिसे आरोपी समझता हो। कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी के लिखित आधार की प्रति आरोपी को बिना किसी अपवाद के जल्द से जल्द उपलब्ध कराई जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति की प्रारंभिक गिरफ्तारी को अदालत अवैध घोषित कर देती है और जांच एजेंसी उसे दोबारा गिरफ्तार करना चाहती है, तो इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा। दोबारा गिरफ्तारी से पहले आरोपी को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में बताने होंगे और संबंधित मजिस्ट्रेट से अनुमति लेनी होगी।

दोबारा जांच दूसरे अधिकारी को सौंपनी होगी

कोर्ट ने प्रशासनिक स्तर पर भी महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। यदि किसी पुलिस अधिकारी ने गिरफ्तारी के समय लिखित आधार उपलब्ध नहीं कराए और इसके कारण गिरफ्तारी अवैध हो गई, तो आरोपी की आगे की हिरासत जारी रखने के लिए संबंधित पुलिस अधिकारी को अपने वरिष्ठ अधिकारी से अनुमोदन लेना होगा। इसके अलावा, आगे की जांच उसी अधिकारी के बजाय किसी दूसरे जांच अधिकारी को सौंपी जानी चाहिए। संबंधित वरिष्ठ अधिकारी को उस पुलिस अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच का निर्देश भी देना होगा, जिसने गिरफ्तारी के संवैधानिक नियमों का पालन नहीं किया। यदि विभागीय जांच में पुलिस अधिकारी के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष सामने आते हैं, तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए और कार्रवाई का उल्लेख अधिकारी की सर्विस बुक में भी किया जाना चाहिए।

सभी राज्यों के डीजीपी को भेजा जाएगा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि फैसले की प्रति सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों को भेजी जाए, ताकि पुलिस अधिकारियों को गिरफ्तारी से जुड़े संवैधानिक दायित्वों के बारे में आवश्यक जानकारी दी जा सके। यह मामला शिरोमणि अकाली दल से जुड़े मुल्लांपुर दाखा विधानसभा क्षेत्र के प्रभारी जस्करणजीत सिंह की गिरफ्तारी से संबंधित था। उन्हें नाबालिग से कथित यौन अपराध के आरोपों के संबंध में गिरफ्तार किया गया था। संबंधित अदालत ने उनकी गिरफ्तारी को अवैध मानते हुए तत्काल रिहाई का आदेश दिया था, लेकिन पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने उस आदेश पर रोक लगा दी थी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

गिरफ्तारी के आधार बताना मौलिक अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में अनुच्छेद 22(1) से जुड़े कई सिद्धांत स्पष्ट किए। कोर्ट के अनुसार, गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में और आरोपी की समझ वाली भाषा में होने चाहिए। गिरफ्तार व्यक्ति को इसकी प्रति देना सामान्य नियम है और इसमें कोई अपवाद नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 22(1) के तहत प्राप्त यह मौलिक अधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका उल्लंघन होने पर गिरफ्तारी और उसके आधार पर हुई रिमांड की प्रक्रिया प्रभावित होती है तथा आरोपी की तत्काल रिहाई का आदेश दिया जा सकता है।\ पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि बाद में चार्जशीट दाखिल कर देना या अदालत द्वारा संज्ञान ले लेना ऐसी अवैध गिरफ्तारी को वैध नहीं बना सकता। यह संवैधानिक सुरक्षा भारतीय दंड संहिता के तहत दर्ज मामलों के साथ-साथ विशेष कानूनों के तहत दर्ज अपराधों पर भी लागू होती है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में निर्धारित कानून इस विषय पर सही कानूनी स्थिति को स्पष्ट करता है और उसका पालन किया जाना चाहिए।