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जस्टिस यशवंत वर्मा कैश कांड में CBI जांच की मांग को झटका, दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका की खारिज

जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास पर कथित नकदी बरामदगी मामले में CBI या SIT जांच और FIR की मांग वाली याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया। जस्टिस अमित बंसल ने याचिका को “जंगली चुड़ैल का शिकार” बताते हुए याचिकाकर्ता के लोकस और उपलब्ध वैकल्पिक कानूनी उपायों पर सवाल उठाए। इससे पहले अगस्त में सुप्रीम कोर्ट भी इसी याचिकाकर्ता की FIR और जांच की मांग खारिज कर चुका है।

Sonali26 सित. 2026, 03:09 PM IST
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जस्टिस यशवंत वर्मा कैश कांड में CBI जांच की मांग को झटका, दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका की खारिज

नई दिल्ली: 

जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास पर कथित तौर पर बड़ी मात्रा में नकदी मिलने के मामले में FIR दर्ज करने और CBI या विशेष जांच दल (SIT) से जांच कराने की मांग वाली याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया। जस्टिस अमित बंसल ने अधिवक्ता घनश्याम दयालु उपाध्याय की याचिका को स्वीकार नहीं किया और सुनवाई के दौरान इसे “जंगली चुड़ैल का शिकार” बताया। अदालत ने याचिकाकर्ता के मामले में लोकस यानी याचिका दाखिल करने के अधिकार पर भी सवाल उठाया। प्रतिवादी अधिकारियों की ओर से भी याचिकाकर्ता के लोकस पर आपत्ति जताई गई और कहा गया कि कानून में उनके लिए वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हैं। कोर्ट ने यह भी पूछा कि याचिकाकर्ता ने FIR दर्ज कराने के लिए संबंधित पुलिस और सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष उपलब्ध कानूनी प्रक्रिया का सहारा क्यों नहीं लिया। सुनवाई के दौरान जस्टिस अमित बंसल ने टिप्पणी की, “मैं इस पर सुनवाई नहीं कर रहा हूं। यह जंगली चुड़ैल का शिकार है। आपके पास करने के लिए इससे बेहतर कोई काम नहीं है?”

याचिकाकर्ता ने बाद में वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता के साथ याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। हालांकि, अदालत ने याचिका को स्वीकार नहीं किया और इसे खारिज कर दिया।


क्या है जस्टिस यशवंत वर्मा कैश मामला?

यह मामला 14 मार्च 2025 को सामने आया था। उस समय दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश रहे जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास पर आग लगने के बाद अग्निशमन अभियान के दौरान आवास से जुड़े एक बाहरी हिस्से में कथित तौर पर बड़ी मात्रा में नकदी मिलने की बात सामने आई थी। इस घटना के बाद न्यायपालिका में बड़ा विवाद खड़ा हुआ। तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय आंतरिक समिति गठित की थी। समिति में तत्कालीन पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जी.एस. संधावालिया और कर्नाटक हाईकोर्ट की न्यायाधीश जस्टिस अनु सिवरमन शामिल थीं। जांच के दौरान जस्टिस वर्मा को दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट वापस भेज दिया गया था और जांच लंबित रहने तक उनसे न्यायिक कार्य वापस ले लिया गया था। समिति ने मई 2025 में अपनी रिपोर्ट तत्कालीन CJI को सौंपी थी। रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा की भूमिका को लेकर प्रथम दृष्टया प्रतिकूल निष्कर्ष दर्ज किए गए थे। इसके बाद रिपोर्ट आगे की कार्रवाई के लिए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजी गई थी। जस्टिस वर्मा ने बाद में अप्रैल 2026 में इस्तीफा दे दिया।


सुप्रीम कोर्ट भी अगस्त में खारिज कर चुका है ऐसी याचिका

 इससे पहले अधिवक्ता घनश्याम दयालु उपाध्याय ने इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट का भी रुख किया था। 7 अगस्त 2026 को जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने FIR दर्ज करने और SIT से जांच कराने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए इसे अदालत की प्रक्रिया के इस्तेमाल से जुड़ा मामला बताया था। दिल्ली हाईकोर्ट में दायर याचिका में उपाध्याय ने तर्क दिया था कि मामला केवल FIR दर्ज नहीं किए जाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि क्या किसी व्यक्ति के उच्च संवैधानिक पद पर रहने के कारण सामान्य आपराधिक कानून लागू नहीं हो सकता। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा था कि उनका उद्देश्य जस्टिस वर्मा को दोषी घोषित कराना नहीं, बल्कि कथित घटना की सच्चाई सामने लाने के लिए स्वतंत्र जांच कराना है। हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट ने इस याचिका को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया और याचिकाकर्ता को उपलब्ध वैकल्पिक कानूनी उपायों की ओर जाने का रास्ता बताया।