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कर्मचारियों को सांता क्लॉज की टोपी पहनने के लिए मजबूर नहीं कर सकते, धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कर्मचारियों को सांता क्लॉज की लाल टोपी पहनने के लिए मजबूर किए जाने पर अहम टिप्पणी की है। जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव की पीठ ने कहा कि ऐसी बाध्यता अलग-अलग धर्मों और आस्थाओं वाले लोगों की भावनाओं को आहत कर सकती है और लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर नागरिक को अपने धर्म और विश्वास का पालन करने की स्वतंत्रता है। कोर्ट ने भविष्य में इस तरह के निर्देश दोबारा जारी नहीं करने की चेतावनी दी और मामले में आपराधिक कार्यवाही को लेकर भी महत्वपूर्ण कानूनी निर्देश दिए।

Sonali23 सित. 2026, 08:49 PM IST
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कर्मचारियों को सांता क्लॉज की टोपी पहनने के लिए मजबूर नहीं कर सकते, धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

प्रयागराज:

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कार्यस्थल पर कर्मचारियों को सांता क्लॉज की लाल टोपी पहनने के लिए मजबूर किए जाने के मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी को इस तरह की टोपी पहनने के लिए बाध्य करना अलग-अलग धर्मों और आस्थाओं वाले लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचा सकता है। अदालत ने कहा कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस तरह की कार्रवाई की अनुमति नहीं दी जा सकती, जहां हर नागरिक अपने धर्म और विश्वास का पालन करने के लिए स्वतंत्र है। जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव की पीठ ने यह टिप्पणी विक्रम सिंह उर्फ विश्व विक्रम सिंह की ओर से दायर आवेदन पर सुनवाई करते हुए की। याचिकाकर्ता ने आगरा के सदर बाजार थाने में दर्ज एफआईआर से संबंधित आरोपपत्र, संज्ञान/समन आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी थी।


क्या है पूरा मामला?

याचिकाकर्ता आगरा स्थित वी बाजार में काम करता था। उसके खिलाफ आरोप था कि उसने अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को “सांता क्लॉज रेड कैप” पहनने के लिए मजबूर किया। इस मामले में उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 298 और 504 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। धारा 298 किसी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर ठेस पहुंचाने के इरादे से शब्द आदि बोलने से संबंधित है, जबकि धारा 504 जानबूझकर अपमान करने और शांति भंग के लिए उकसाने से संबंधित थी।

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में आरोपपत्र, संज्ञान लेने के आदेश और उसके खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी।


‘इस तरह की बाध्यता से धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं’

मामले से जुड़े दस्तावेजों की जांच करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि वी बाजार के वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से कर्मचारियों पर सांता क्लॉज की लाल टोपी पहनने की बाध्यता डाली गई थी। अदालत ने कहा कि इस तरह की बाध्यता अलग-अलग धर्मों और विश्वासों को मानने वाले लोगों की भावनाओं को आहत कर सकती है। जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव ने कहा कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसी कार्रवाई स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि हर नागरिक अपने धर्म और विश्वास का पालन करने के लिए स्वतंत्र है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता और उसके वरिष्ठ अधिकारियों को भविष्य में इस तरह के निर्देश दोबारा जारी नहीं करने की चेतावनी दी। अदालत ने कहा कि इस प्रकार के निर्देश कार्यस्थल पर कर्मचारियों के बीच शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण माहौल को प्रभावित कर सकते हैं।


आपराधिक कार्यवाही पर भी हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

आवेदन पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने एक अलग कानूनी आधार भी उठाया। उन्होंने दलील दी कि भारतीय दंड संहिता की धारा 298 और 504 गैर-संज्ञेय अपराध हैं। इसलिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 2(डी) के स्पष्टीकरण के तहत ऐसे मामलों में जांच के बाद पुलिस द्वारा दाखिल रिपोर्ट को शिकायत के रूप में माना जाना चाहिए, न कि सामान्य पुलिस केस के रूप में। राज्य की ओर से इस दलील का विरोध किया गया, लेकिन अपर महाधिवक्ता ने इस कानूनी स्थिति पर कोई आपत्ति नहीं जताई।

हाईकोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 2(डी) के स्पष्टीकरण का उल्लेख करते हुए कहा कि इस मामले में जांच अधिकारी द्वारा धारा 298 और 504 आईपीसी के तहत दाखिल आरोपपत्र को शिकायत के रूप में माना जाना चाहिए। इस आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए संबंधित आपराधिक कार्यवाही के संबंध में आवश्यक आदेश पारित किया। साथ ही, अदालत ने कार्यस्थल पर कर्मचारियों की धार्मिक स्वतंत्रता और अलग-अलग आस्थाओं के सम्मान को लेकर वरिष्ठ अधिकारियों को सावधानी बरतने की चेतावनी दी।