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5 दिन की अवैध हिरासत पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, युवक को ₹50 हजार मुआवजा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पांच दिनों की कथित अवैध पुलिस हिरासत के मामले में कुमार को 50 हजार रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। पुलिस ने उसे 15 अगस्त को प्रयागराज की मेडिकल दुकान से हिरासत में लिया था, जबकि 19 अगस्त को उसे जेल भेजा गया। पुलिस जांच में संबंधित एसएचओ और जांच अधिकारी हिरासत का संतोषजनक कारण नहीं बता सके, जिसके बाद दोनों को गंभीर लापरवाही के लिए निलंबित कर दिया गया।

प्रयागराज:
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति को पांच दिनों तक कथित रूप से अवैध हिरासत में रखे जाने के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए उसे 50 हजार रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने मामले में पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर भी गंभीरता से विचार किया। पुलिस जांच में एसएचओ और जांच अधिकारी द्वारा 15 अगस्त को याचिकाकर्ता की हिरासत का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिए जाने की बात सामने आई, जिसके बाद दोनों अधिकारियों को “गंभीर लापरवाही” के लिए निलंबित कर दिया गया।
मामला क्या है?
कुमार के खिलाफ बाद में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318(4), 336(3), 338, 340(2) और 351(3) के तहत मामला दर्ज किया गया। इसके अलावा इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट, 2025 की धारा 21 और 22 तथा पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 12 भी लगाई गई। पुलिस ने कुमार को 15 अगस्त को प्रयागराज के सोनार तारा इलाके स्थित उसकी मेडिकल दुकान से अपने साथ ले लिया था। हालांकि, उसे अदालत के समक्ष पेश करने के बाद 19 अगस्त को जेल भेजा गया। इसी बीच हिरासत में रखे जाने को चुनौती देते हुए कुमार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह कुमार की राष्ट्रीयता से संबंधित आरोपों के गुण-दोष पर विचार नहीं कर रहा है। अदालत ने अपने विचार को केवल इस सवाल तक सीमित रखा कि 15 अगस्त से कुमार को जिस तरीके से हिरासत में रखा गया, वह कानूनी था या नहीं।
पुलिस अधिकारियों से नहीं मिला संतोषजनक जवाब
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट को बताया गया कि पुलिस विभाग की ओर से इस मामले में जांच की गई थी। जांच में पाया गया कि संबंधित थाना प्रभारी और जांच अधिकारी 15 अगस्त को कुमार को हिरासत में रखने का संतोषजनक कारण नहीं बता सके। इसके बाद दोनों अधिकारियों को “गंभीर लापरवाही” के आरोप में निलंबित कर दिया गया।
एसएचओ ने अपने हलफनामे में दावा किया कि उन्होंने दो कांस्टेबलों को कुमार को थाने में उपस्थित होने के लिए कहने का निर्देश दिया था। हालांकि, एसएचओ के अनुसार कांस्टेबलों ने उनके संदेश को “गलत समझ लिया” और कुमार को थाने आने के लिए कहने के बजाय उसे अपने साथ ले गए। हाईकोर्ट ने इसी अवधि की हिरासत को लेकर सवाल उठाया और मामले में पुलिस कार्रवाई की वैधानिकता पर विचार किया।
राष्ट्रीयता के आरोपों पर कोर्ट ने नहीं की टिप्पणी
अदालत ने स्पष्ट किया कि कुमार के खिलाफ लगाए गए आरोपों में उसकी राष्ट्रीयता से जुड़ा मुद्दा भी शामिल है, लेकिन इस स्तर पर कोर्ट उस विवाद के गुण-दोष पर कोई निष्कर्ष नहीं दे रहा है। हाईकोर्ट का ध्यान मुख्य रूप से इस बात पर था कि क्या पुलिस को कुमार को 15 अगस्त से 19 अगस्त तक इस तरह हिरासत में रखने का कानूनी अधिकार था। कोर्ट ने इसी अवधि में हुई कथित अवैध हिरासत को लेकर राहत पर विचार किया। मामले में हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों की कार्रवाई को गंभीरता से लेते हुए हिरासत की अवधि और पुलिस द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण की जांच की। कोर्ट ने माना कि इस अवधि में हिरासत को उचित ठहराने के लिए संतोषजनक आधार सामने नहीं आया।
इसके बाद अदालत ने कुमार को 50 हजार रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया। यह मुआवजा कथित अवैध हिरासत के कारण उसके मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के संदर्भ में दिया गया है। मामले में कोर्ट की कार्रवाई यह भी रेखांकित करती है कि पुलिस को किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने और उसे थाने लाने के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है। केवल अधिकारियों के निर्देश या मौखिक संदेश के आधार पर किसी व्यक्ति को अनिश्चित अवधि तक हिरासत में रखना उचित नहीं माना जा सकता।
