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11 साल पुराने दुष्कर्म और अपहरण मामले में आरोपी बरी, पीड़िता और माता-पिता ने आरोपों का समर्थन नहीं किया
कल्याण की विशेष पॉक्सो अदालत ने करीब 11 साल पुराने दुष्कर्म और अपहरण मामले में आरोपी ज्ञानेश्वर देवराम मांगे को बरी कर दिया। अदालत ने पाया कि पीड़िता और उसके माता-पिता ने अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया। पीड़िता ने आरोपी द्वारा अपहरण या यौन हमला किए जाने से इनकार किया, जबकि अभियोजन पक्ष पीड़िता की उम्र भी कानूनी रूप से साबित नहीं कर सका। विशेष न्यायाधीश लक्ष्मीकांत ए. बिडवई ने आरोपी को आईपीसी की धारा 376, 363 और पॉक्सो अधिनियम की धारा 4, 6 व 8 के आरोपों से बरी कर दिया।

कल्याण:
ठाणे जिले के कल्याण स्थित विशेष पॉक्सो अदालत ने करीब 11 साल पुराने दुष्कर्म और अपहरण के मामले में आरोपी ज्ञानेश्वर देवराम मांगे को बरी कर दिया है। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। मामले में पीड़िता और उसके माता-पिता ने अदालत में अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया और पीड़िता ने स्पष्ट रूप से कहा कि आरोपी ने उसका अपहरण नहीं किया था और उसके साथ कोई गलत काम नहीं किया। यह फैसला 21 सितंबर 2026 को कल्याण स्थित सत्र न्यायालय के विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो) लक्ष्मीकांत ए. बिडवई ने Atro Spl. Case No. 114/2015 में सुनाया।
क्या था पूरा मामला?
मामला कासारा पुलिस स्टेशन में दर्ज Crime No. 27/2015 से संबंधित था। अभियोजन के अनुसार, घटना 17 मई 2015 की है। पीड़िता करीब 15 वर्ष की थी और आरोपी उसके पड़ोस में रहता था। दोनों के बीच दोस्ती थी और वे आपस में बातचीत करते थे। 17 मई 2015 को पीड़िता सब्जी खरीदने के लिए घर से निकली, लेकिन वापस नहीं लौटी। परिवार ने उसकी तलाश शुरू की। इसी दौरान उन्हें पता चला कि आरोपी भी अपने घर पर मौजूद नहीं है। पीड़िता के पिता को संदेह हुआ कि आरोपी उनकी बेटी को अपने साथ ले गया है। इसके बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई। जांच के दौरान पुलिस ने पीड़िता को रेलवे स्टेशन से बरामद किया और उसके माता-पिता को सौंप दिया। पुलिस के अनुसार, जांच में पीड़िता के बयान से यह सामने आया था कि आरोपी उसे बहला-फुसलाकर विरार ले गया था और वहां एक कमरे में दोनों रुके थे। अभियोजन का आरोप था कि आरोपी ने वहां पीड़िता के साथ यौन संबंध बनाए। इसके बाद पुलिस ने आरोपी और पीड़िता के कपड़े जब्त किए, उन्हें फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा और पीड़िता का दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत बयान दर्ज कराने की प्रक्रिया की। पीड़िता की उम्र से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने के कारण उसका अस्थि-परीक्षण भी कराया गया।
अदालत में आरोप साबित नहीं हुए
आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 376 और 363 तथा पॉक्सो अधिनियम की धारा 4, 6 और 8 के तहत आरोप तय किए गए थे। आरोपी ने सभी आरोपों से इनकार किया और खुद को झूठे मामले में फंसाए जाने की बात कही। मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने पीड़िता के पिता, पीड़िता और उसकी मां को गवाह के तौर पर पेश किया।
पीड़िता के पिता ने अदालत में कहा कि उन्होंने आरोपी के खिलाफ शिकायत केवल संदेह के आधार पर दर्ज कराई थी। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि वह अदालत में भी संदेह के आधार पर ही बयान दे रहे हैं।
पीड़िता ने आरोपों का किया खंडन
मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि पीड़िता ने अदालत में आरोपी के खिलाफ कोई आपत्तिजनक बयान नहीं दिया। उसने बताया कि वह आरोपी के साथ घूमने के उद्देश्य से गई थी। उसने स्पष्ट रूप से इनकार किया कि आरोपी ने उसका अपहरण किया था या उसके साथ यौन हमला किया था। अभियोजन पक्ष की ओर से पीड़िता से जिरह के दौरान अग्रणी प्रश्न पूछने की अनुमति मांगी गई, लेकिन उससे भी अभियोजन की कहानी साबित नहीं हो सकी। पीड़िता ने अपने धारा 164 के बयान में दर्ज कथनों को भी स्वीकार नहीं किया। उसने आरोपी की ओर से जिरह के दौरान कहा कि आरोपी ने उसका अपहरण नहीं किया था और उसके पिता ने गलतफहमी के कारण उसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। पीड़िता ने यह भी कहा कि उसे आरोपी से पहले या वर्तमान में कोई शिकायत नहीं है। पीड़िता की मां ने भी अभियोजन का समर्थन नहीं किया। उन्होंने कहा कि उनकी बेटी सब्जी बाजार गई थी और वापस नहीं लौटी, जिसके बाद केवल संदेह के आधार पर उनके पति ने आरोपी के खिलाफ शिकायत की थी। उन्होंने भी आरोपी द्वारा अपहरण या यौन हमला किए जाने के आरोपों से इनकार किया।
पीड़िता की उम्र साबित नहीं कर सका अभियोजन
अदालत ने पॉक्सो के आरोपों के संदर्भ में पीड़िता की उम्र साबित किए जाने को भी महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा कि मामले में पीड़िता का मैट्रिकुलेशन प्रमाणपत्र, समकक्ष प्रमाणपत्र या जन्म प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं था। हालांकि, उसका अस्थि-परीक्षण कराया गया था, लेकिन उस जांच के परिणाम को साबित करने के लिए संबंधित चिकित्सा अधिकारी को अदालत में गवाह के रूप में पेश नहीं किया गया। इसलिए अभियोजन पक्ष पीड़िता की उम्र को कानूनी रूप से साबित करने में विफल रहा। कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों को उनके मूल रूप में देखने पर भी अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपी ने पीड़िता के साथ यौन हमला किया था। इसी आधार पर अदालत ने आईपीसी और पॉक्सो अधिनियम के तहत सभी आरोपों पर अभियोजन के पक्ष में निष्कर्ष देने से इनकार कर दिया।
आरोपी को सभी आरोपों से बरी किया
विशेष न्यायाधीश लक्ष्मीकांत ए. बिडवई ने ज्ञानेश्वर देवराम मांगे को आईपीसी की धारा 376 और 363 तथा पॉक्सो अधिनियम की धारा 4, 6 और 8 के तहत आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने आरोपी के जमानत बांड रद्द कर दिए और जमानतदारों को मुक्त कर दिया। साथ ही दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437(ए) के अनुपालन के लिए आरोपी को 25,000 रुपये का व्यक्तिगत बांड और इतनी ही राशि की जमानत प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। मामले में 3 अगस्त 2015 को केस दर्ज हुआ था और 21 सितंबर 2026 को फैसला सुनाया गया। इस प्रकार मामले की न्यायिक कार्यवाही लगभग 11 वर्ष तक चली।
