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ठाणे में मारपीट के 13 साल पुराने मामले में तीन आरोपी बरी, कोर्ट ने कहा- आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं
ठाणे के वाल्मीकीपाड़ा में मारपीट के 13 साल पुराने मामले में अदालत ने तीन आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने पाया कि मुख्य शिकायतकर्ता की मौत हो चुकी थी, अहम प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही नहीं हो सकी और उपलब्ध साक्ष्यों से आरोपियों की मारपीट में संलिप्तता संदेह से परे साबित नहीं हुई।

ठाणे।
वाल्मीकीपाड़ा, वागले एस्टेट में मारपीट और चोट पहुंचाने के 13 साल पुराने मामले में ठाणे की अदालत ने तीन आरोपियों को बरी कर दिया है। प्रथम वर्ग न्यायिक दंडाधिकारी के समक्ष मामले की सुनवाई हुई और 21 सितंबर 2026 को फैसला सुनाया गया। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष चोटों और घटनास्थल से जुड़ा कुछ साक्ष्य तो पेश कर सका, लेकिन यह साबित नहीं कर पाया कि चोटें आरोपियों ने ही पहुंचाई थीं।
क्या था मामला?
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 3 जनवरी 2013 को दोपहर में सतपाल मामचंद चंडालिया के बच्चों और आरोपी पक्ष के बीच मामूली बात को लेकर विवाद हुआ था। उस समय सतपाल ने दोनों पक्षों को समझाकर घर भेज दिया था। उसी रात करीब 7:30 बजे आरोपियों के दोबारा आने और विवाद करने का आरोप लगाया गया। शिकायत के अनुसार, विवाद छुड़ाने पहुंचे सतपाल और उनके भांजे अमन मलिक के साथ मारपीट की गई। आरोप था कि आरोपी संदीप कांगडा ने क्रिकेट की लकड़ी की बैट से सतपाल और अमन के सिर पर वार किया। वहीं सतपाल की पत्नी माया के साथ कमर के बेल्ट से मारपीट करने और उनके बेटे सुनील को भी पीटने का आरोप लगाया गया था। मामले में श्रीनगर पुलिस स्टेशन में अपराध क्रमांक 1/2013 दर्ज किया गया। पुलिस ने जांच के बाद आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 323 और 324 सहपठित धारा 34 के तहत आरोपपत्र दाखिल किया।
मुख्य शिकायतकर्ता की हो चुकी थी मौत
सुनवाई के दौरान मामले के मुख्य शिकायतकर्ता सतपाल चंडालिया की मृत्यु हो चुकी थी। इसलिए उनकी अदालत में गवाही दर्ज नहीं हो सकी। अभियोजन पक्ष के महत्वपूर्ण प्रत्यक्षदर्शी और घायल अमन मलिक को कई बार समन जारी किए गए, लेकिन उसकी गवाही भी दर्ज नहीं हो सकी। अभियोजन के दो अन्य गवाहों सतिश चंडालिया और माया चंडालिया ने भी अदालत में अभियोजन के आरोपों के अनुरूप बयान नहीं दिया। अदालत ने पाया कि उनके मौखिक बयान और पुलिस जांच के दौरान दर्ज बयानों में अंतर था।
मेडिकल रिपोर्ट में चोटें मिलीं
मामले में मेडिकल अधिकारी दीपक भगत ने सतपाल चंडालिया और अमन मलिक की चिकित्सा जांच की थी। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार दोनों के शरीर पर साधारण चोटें मिली थीं। डॉक्टर ने माना कि ये चोटें बैट जैसी कठोर और भोथरी वस्तु से हो सकती हैं। हालांकि, अदालत ने कहा कि केवल चोटों का होना यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि चोटें आरोपियों ने ही पहुंचाई थीं।
बैट और बेल्ट जब्त हुए, लेकिन आरोपियों से संबंध साबित नहीं
जांच के दौरान पुलिस ने घटनास्थल से एक लकड़ी की क्रिकेट बैट और कमर का बेल्ट जब्त किया था। पंच गवाह ने बैट की जब्ती की पुष्टि की, जबकि जांच अधिकारी ने घटनास्थल और जब्ती पंचनामा साबित किया। लेकिन अदालत के अनुसार, रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि जब्त की गई बैट और बेल्ट का इस्तेमाल आरोपियों ने मारपीट में किया था।
अदालत ने तीनों आरोपियों को किया बरी
अदालत ने कहा कि आपराधिक मामले में आरोपियों का दोष साबित करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की होती है। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अभियोजन पक्ष धारा 323 और 324 सहपठित धारा 34 के आरोपों को पर्याप्त और ठोस साक्ष्य से साबित नहीं कर सका। इस आधार पर संदीप सत्यवान कांगडा, कालीया उर्फ रामनिवास बीरा कांगडा और पवन बीरा उर्फ महावीर कांगडा को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 248(1) के तहत सभी आरोपों से निर्दोष मुक्त कर दिया गया। अदालत ने आरोपियों के जमानत और बंधपत्र रद्द करते हुए अपील की स्थिति में प्रत्येक को ₹15,000 का बंधपत्र और जमानत देने का निर्देश दिया। साथ ही जब्त क्रिकेट बैट और बेल्ट को अपील की अवधि समाप्त होने के बाद नियमानुसार नष्ट करने का आदेश दिया गया।
