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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: रिश्वत की मांग साबित किए बिना सिर्फ रकम बरामद होने से नहीं होगी सजा

सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से जुड़े एक अहम मामले में साफ किया है कि केवल रिश्वत की रकम बरामद होना दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष को रिश्वत की मांग और उसके स्वीकार किए जाने का तथ्य भी ठोस सबूतों से साबित करना होगा। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के एक पटवारी की दोषसिद्धि रद्द कर दी, जिसके खिलाफ संपत्ति के नामांतरण के बदले 9,500 रुपये रिश्वत मांगने और लेने का आरोप था।

Sonali24 सित. 2026, 01:19 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: रिश्वत की मांग साबित किए बिना सिर्फ रकम बरामद होने से नहीं होगी सजा

नई दिल्ली। 

सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल रिश्वत की रकम बरामद हो जाना किसी सरकारी कर्मचारी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है। अभियोजन पक्ष को रिश्वत की मांग और उसके स्वीकार किए जाने को भी ठोस साक्ष्यों के आधार पर साबित करना होगा। अदालत ने इसी आधार पर पंजाब के एक पटवारी जसविंदर सिंह की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया। मामले की सुनवाई के दौरान पटवारी की मृत्यु हो चुकी थी और उसके कानूनी प्रतिनिधियों ने अपील जारी रखी थी। न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति अरुण पल्ल की पीठ ने 22 सितंबर 2026 को यह फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने होशियारपुर के विशेष न्यायाधीश और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें आरोपी को भ्रष्टाचार के मामले में दोषी ठहराया गया था। विशेष अदालत ने वर्ष 2004 में आरोपी को दो साल के कठोर कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी, जिसे हाईकोर्ट ने वर्ष 2013 में बरकरार रखा था। मामला मृतक पटवारी पर एक व्यक्ति से 10 हजार रुपये रिश्वत मांगने के आरोप से जुड़ा था। आरोप था कि शिकायतकर्ता अपने मृत भाई की संपत्ति को उसके कानूनी वारिसों के नाम दर्ज कराने के लिए पटवारी के पास गया था। आरोप के अनुसार रिश्वत की रकम पर बातचीत के बाद राशि 9,500 रुपये तय हुई। शिकायत के आधार पर विजिलेंस ब्यूरो ने जाल बिछाया और कथित तौर पर रिश्वत की रकम आरोपी से बरामद की गई।


सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही का बारीकी से परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता ने दावा किया था कि उसने रिश्वत की रकम आरोपी को दी थी, लेकिन छाया गवाह और एक आधिकारिक गवाह ने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्होंने न तो रकम दिए जाते हुए देखा और न ही उसकी बरामदगी उनके सामने हुई। अदालत ने यह भी पाया कि बरामदगी की जगह को लेकर गवाहों के बयानों में विरोधाभास था। शिकायतकर्ता के अनुसार रकम आरोपी की पतलून की जेब से बरामद हुई थी, जबकि छाया गवाह को बताया गया था कि रकम उसकी शर्ट की जेब से मिली। सुप्रीम कोर्ट ने इन परिस्थितियों को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि किसी भी गवाह ने आरोपी को रिश्वत मांगते या शिकायतकर्ता को रकम देते और आरोपी द्वारा स्वीकार करते हुए नहीं देखा था। पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और धारा 13(1)(d) के तहत अपराध साबित करने के लिए रिश्वत की मांग का प्रमाण महत्वपूर्ण है। केवल संदिग्ध या रंगे हाथ बरामद हुई रकम अपने आप में दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकती। अदालत ने पी. सत्यनारायण मूर्ति बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और नीरज दत्ता बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) सहित पूर्व फैसलों के सिद्धांतों को दोहराया।


सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिश्वत की मांग और स्वीकार किए जाने का तथ्य अभियोजन पक्ष को स्वतंत्र रूप से साबित करना होता है। मौजूदा मामले में दोनों ही पहलू संदेह से परे साबित नहीं हो सके। इसलिए अदालत ने विशेष न्यायाधीश, होशियारपुर के 25 फरवरी 2004 के फैसले और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के 28 नवंबर 2013 के फैसले को रद्द कर दिया। इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने मृतक पटवारी जसविंदर सिंह को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत लगाए गए आरोपों से बरी कर दिया। मामले का नाम Jaswinder Singh (Dead Through LRs) v State of Punjab है