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धार्मिक जुलूसों में तेज आवाज वाले पटाखों पर रोक, मंडलों से लिया जाएगा सुरक्षा जमा: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने धार्मिक जुलूसों के दौरान ध्वनि प्रदूषण को लेकर सख्त रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति गिरीश कुलकर्णी और न्यायमूर्ति डॉ. नीला गोखले की खंडपीठ ने कहा कि निर्धारित ध्वनि सीमा से अधिक शोर करने वाले पटाखों पर पूरी तरह रोक लगाई जाएगी। अदालत ने ढोल पथकों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले शोर पैदा करने वाले सिलेंडरों पर भी प्रतिबंध लगाने की बात कही है। इसके साथ ही ध्वनि संबंधी नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए धार्मिक मंडलों से सुरक्षा जमा राशि लेने का प्रस्ताव भी सामने आया है।

Sonali26 सित. 2026, 01:51 PM IST
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धार्मिक जुलूसों में तेज आवाज वाले पटाखों पर रोक, मंडलों से लिया जाएगा सुरक्षा जमा: बॉम्बे हाईकोर्ट

मुंबई। 

धार्मिक जुलूसों और त्योहारों के दौरान बढ़ते ध्वनि प्रदूषण को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति गिरीश कुलकर्णी और न्यायमूर्ति डॉ. नीला गोखले की खंडपीठ ने 22 सितंबर 2026 को कहा कि वह सार्वजनिक सड़कों पर तेज आवाज और प्रदूषण फैलाने वाले पटाखों के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगाने संबंधी विस्तृत आदेश जारी करेगी। अदालत ने धार्मिक जुलूसों में ढोल पथकों द्वारा शोर पैदा करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सिलेंडरों पर भी प्रतिबंध लगाने की बात कही है। 

धार्मिक जुलूसों में ध्वनि सीमा का पालन जरूरी

यह मामला धार्मिक जुलूसों के दौरान होने वाले ध्वनि प्रदूषण पर हाईकोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर शुरू की गई जनहित याचिका से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि धार्मिक आयोजन और उत्सव कानून के दायरे में रहकर होने चाहिए। नागरिकों के स्वास्थ्य और शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 

अदालत ने संकेत दिया कि धार्मिक जुलूसों के दौरान पुलिस और संबंधित सक्षम अधिकारियों को ध्वनि स्तर की निगरानी करनी होगी। निर्धारित सीमा से अधिक शोर होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। अधिकारियों को ध्वनि मापक यंत्रों के माध्यम से शोर का रिकॉर्ड रखने और मीटर की रीडिंग को पंचनामा में दर्ज करने का निर्देश दिए जाने की बात भी सामने आई है। 

मंडलों को जमा करनी पड़ सकती है सुरक्षा राशि

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने धार्मिक मंडलों से सुरक्षा जमा राशि लेने का सुझाव दिया। अदालत के अनुसार, यदि किसी मंडल की ओर से ध्वनि प्रदूषण संबंधी नियमों का उल्लंघन होता है, तो जमा राशि को जुर्माने के तौर पर जब्त किया जा सकता है। अदालत ने इस व्यवस्था को ‘प्रदूषण फैलाने वाला भुगतान करे’ के सिद्धांत से जोड़ा। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उस समय यह व्यवस्था अदालत के प्रस्तावित विस्तृत आदेश का हिस्सा थी। अंतिम आदेश में इसके स्वरूप और लागू होने की शर्तों की पुष्टि होना आवश्यक है। 

जुलूसों की अनुमति सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करनी होगी

खंडपीठ ने यह भी कहा कि धार्मिक जुलूसों और आयोजन स्थलों पर लाउडस्पीकर के इस्तेमाल की अनुमति को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जाना चाहिए। इससे नागरिकों और संबंधित अधिकारियों को यह जानकारी मिल सकेगी कि आयोजन के लिए किन गतिविधियों की अनुमति दी गई है। अदालत ने अधिकारियों से ध्वनि प्रदूषण के नियमों का प्रभावी पालन सुनिश्चित करने को कहा है। नियमों का उल्लंघन करने वाले साउंड सिस्टम के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई और जब्ती जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।

पटाखों और सिलेंडरों के इस्तेमाल पर भी चिंता

सुनवाई के दौरान अदालत ने सार्वजनिक सड़कों पर पटाखे फोड़ने से होने वाले ध्वनि और वायु प्रदूषण पर चिंता जताई। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे पटाखे नागरिकों के स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। इसके अलावा ढोल समूहों द्वारा वाद्य यंत्र के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले शोर पैदा करने वाले सिलेंडरों पर भी रोक लगाने की बात कही गई। महाराष्ट्र के महाधिवक्ता डॉ. मिलिंद साठे ने अदालत को बताया कि पुलिस जुलूसों के लिए अनुमति देती है, लेकिन लाउडस्पीकर, डीजे, ढोल और पटाखों के इस्तेमाल के लिए अलग-अलग अनुमति की आवश्यकता हो सकती है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पटाखों पर सामान्य प्रतिबंध नहीं है, लेकिन पुलिस द्वारा उनके इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी जाती। 

अदालत ने नागरिकों से जिम्मेदारी निभाने को कहा

हाईकोर्ट ने धार्मिक आयोजनों के खिलाफ होने से इनकार करते हुए कहा कि उत्सव और जुलूस जारी रह सकते हैं, लेकिन उन्हें कानून की सीमाओं के भीतर आयोजित किया जाना चाहिए। अदालत ने नागरिकों से समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझने और ध्वनि प्रदूषण संबंधी नियमों का पालन करने की अपील की। मामले में अदालत का विस्तृत आदेश महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि उसी से पटाखों पर प्रस्तावित प्रतिबंध, सुरक्षा जमा राशि और ध्वनि निगरानी से जुड़े निर्देशों का अंतिम स्वरूप स्पष्ट होगा।