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फर्जी कानून की डिग्री के आरोप में वकील को इलाहाबाद हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत, यूनिवर्सिटी ने डिग्री को सिर्फ ‘असत्यापित’ बताया था

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कथित फर्जी कानून की डिग्री को लेकर दर्ज एफआईआर का सामना कर रहे एक वकील को अग्रिम जमानत दे दी है। न्यायमूर्ति राजीव लोचन शुक्ला की पीठ ने कहा कि केवल विश्वविद्यालय द्वारा डिग्री को ‘असत्यापित’ लौटाए जाने से प्रथम दृष्टया यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दस्तावेज फर्जी है। अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि विश्वविद्यालय की ओर से अब तक ऐसा कोई निश्चित जवाब नहीं आया है, जिसमें डिग्री को जाली बताया गया हो। मामले में जांच जारी है और अदालत ने माना कि आरोपी से हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं है।

Sonali24 सित. 2026, 01:18 PM IST
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फर्जी कानून की डिग्री के आरोप में वकील को इलाहाबाद हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत, यूनिवर्सिटी ने डिग्री को सिर्फ ‘असत्यापित’ बताया था

इलाहाबाद। 

कथित फर्जी कानून की डिग्री के मामले में एफआईआर का सामना कर रहे एक वकील को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत दे दी है। अदालत ने कहा कि विश्वविद्यालय की ओर से किसी डिग्री को केवल ‘असत्यापित’ (Unverified) बताकर वापस कर देना, प्रथम दृष्टया उस दस्तावेज को फर्जी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत ने यह भी पाया कि संबंधित विश्वविद्यालय ने अभी तक यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा है कि आरोपी की कानून की डिग्री जाली है। न्यायमूर्ति राजीव लोचन शुक्ला की पीठ ने गौऱांग बृजवासी की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धोखाधड़ी और जालसाजी से संबंधित धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी।

प्रमाण पत्र के नवीनीकरण के दौरान सामने आया मामला

मामला आरोपी के Certificate of Practice के नवीनीकरण के दौरान सामने आया। इस प्रक्रिया में उसकी कानून की डिग्री को सत्यापन के लिए संबंधित विश्वविद्यालय भेजा गया था। बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के अनुसार, विश्वविद्यालय की ओर से दस्तावेज को ‘Unverified’ यानी असत्यापित बताते हुए वापस किया गया। इसके बाद आरोपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। यह कार्रवाई इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा Mohammad Kafeel बनाम State of U.P. and Another मामले में दिए गए निर्देशों के बाद की गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि केवल कानून की डिग्री का सत्यापन नहीं होने या विश्वविद्यालय द्वारा उसे ‘Unverified’ बताकर लौटाने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि डिग्री फर्जी है।

अदालत ने दलील में प्रथम दृष्टया आधार माना

हाईकोर्ट ने इस दलील में प्रथम दृष्टया आधार पाया। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता के वकील की दलील में प्रथम दृष्टया दम दिखाई देता है। पीठ ने विशेष रूप से इस तथ्य पर गौर किया कि जांच अभी जारी है और संबंधित विश्वविद्यालय की ओर से ऐसा कोई निश्चित जवाब रिकॉर्ड पर नहीं है, जिसमें यह कहा गया हो कि आरोपी की डिग्री फर्जी है।

अदालत ने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि दस्तावेज को ‘Unverified’ बताकर वापस करने का वास्तविक कारण क्या था।

हिरासत में पूछताछ जरूरी नहीं

हाईकोर्ट ने माना कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप मुख्य रूप से दस्तावेजी साक्ष्य से जुड़े हैं। ऐसे में आरोपी से हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं दिखाई देती। अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि आरोपी का कोई आपराधिक पूर्ववृत्त नहीं है।mअदालत के समक्ष दाखिल हलफनामे के अनुसार, आरोपी ने यह भी दावा किया था कि वह वर्तमान में सक्रिय रूप से वकालत नहीं कर रहा है। इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि पुलिस रिपोर्ट दाखिल होने तक आरोपी को अग्रिम जमानत देने का मामला बनता है।

अदालत ने लगाई ये शर्तें

अग्रिम जमानत देते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी को जांच में सहयोग करने और आवश्यकता पड़ने पर पूछताछ के लिए उपलब्ध रहने का निर्देश दिया। साथ ही उसे मामले से जुड़े लोगों को प्रभावित या धमकाने से बचने, अभियोजन पक्ष के गवाहों पर दबाव नहीं डालने और अदालत की अनुमति के बिना भारत से बाहर नहीं जाने की शर्त लगाई गई। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आदेश में की गई टिप्पणियां केवल अग्रिम जमानत याचिका पर निर्णय लेने के उद्देश्य से की गई हैं। इन टिप्पणियों को मामले के अंतिम गुण-दोष पर अदालत की राय नहीं माना जाएगा। यह आदेश गौऱांग बृजवासी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में पारित किया गया है, जिसका केस सिटेशन 2026 है।