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सबूत बंद होने के बाद भी अंतिम बहस के दौरान पेश हो सकते हैं अतिरिक्त दस्तावेज: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आदेश VII नियम 14(3) CPC को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि साक्ष्य बंद होने और मुकदमा अंतिम बहस के चरण में पहुंचने के बाद भी अदालत अतिरिक्त दस्तावेज रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति दे सकती है। हालांकि, ऐसी स्थिति में दस्तावेज देर से पेश करने के कारणों और उसकी प्रासंगिकता की गहन जांच करना जरूरी होगा।

Sonali24 सित. 2026, 01:18 PM IST
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सबूत बंद होने के बाद भी अंतिम बहस के दौरान पेश हो सकते हैं अतिरिक्त दस्तावेज: इलाहाबाद हाईकोर्ट

लखनऊ। 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश VII नियम 14(3) को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि किसी मुकदमे में साक्ष्य बंद हो जाने और मामला अंतिम बहस के चरण में पहुंच जाने मात्र से अदालत की वह शक्ति समाप्त नहीं हो जाती, जिसके तहत वह अतिरिक्त दस्तावेज रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति दे सकती है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुकदमे के अंतिम चरण में अतिरिक्त दस्तावेज पेश करने की अनुमति मांगने वाले आवेदन की सामान्य मामलों की तुलना में अधिक सावधानी से जांच की जानी चाहिए। हालांकि, केवल देरी के आधार पर आवेदन को खारिज करना जरूरी नहीं है। अदालत को यह देखना होगा कि दस्तावेज मामले के उचित निर्णय के लिए कितना प्रासंगिक है और उसे पहले रिकॉर्ड पर क्यों नहीं लाया जा सका।

अंतिम बहस के चरण में पहुंचा था मुकदमा

मामले में संबंधित सिविल मुकदमा उस चरण में पहुंच चुका था, जहां पक्षकारों के साक्ष्य बंद हो चुके थे और अंतिम बहस की कार्यवाही चल रही थी। इसी दौरान अतिरिक्त दस्तावेज रिकॉर्ड पर लाने की अनुमति मांगी गई। विरोधी पक्ष की ओर से इसका विरोध करते हुए दलील दी गई कि जब साक्ष्य पहले ही बंद हो चुके हैं और मुकदमा अंतिम बहस के चरण में पहुंच गया है, तब इस स्तर पर नए दस्तावेज रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य सवाल यह था कि क्या साक्ष्य बंद होने के बाद और अंतिम बहस के दौरान आदेश VII नियम 14(3) CPC के तहत अतिरिक्त दस्तावेज पेश करने की अनुमति दी जा सकती है।

केवल साक्ष्य बंद होना रोक नहीं

अदालत ने कहा कि साक्ष्य बंद हो जाना अपने आप में अतिरिक्त दस्तावेज रिकॉर्ड पर लेने की अदालत की शक्ति पर पूर्ण रोक नहीं लगाता। आदेश VII नियम 14(3) CPC अदालत को उचित परिस्थितियों में ऐसे दस्तावेज को रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति देने का अधिकार देता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि मुकदमे के किसी भी चरण में बिना पर्याप्त कारण बताए दस्तावेज दाखिल करने की अनुमति आसानी से दी जानी चाहिए। मामले के अंतिम चरण में दाखिल किए गए आवेदन की अदालत को अधिक गंभीरता से जांच करनी होगी।

देरी के कारण और दस्तावेज की प्रासंगिकता देखना जरूरी

हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत को यह जांचना होगा कि संबंधित दस्तावेज मुकदमे के विवादित मुद्दों के लिए कितना महत्वपूर्ण है। साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि दस्तावेज पहले क्यों पेश नहीं किया गया और उसे बाद में रिकॉर्ड पर लाने की आवश्यकता क्यों पैदा हुई। अदालत को इस बात पर भी विचार करना होगा कि अतिरिक्त दस्तावेज स्वीकार करने से दूसरे पक्ष को कोई अनुचित नुकसान या पूर्वाग्रह तो नहीं होगा। यदि दस्तावेज मामले के सही और प्रभावी निर्णय के लिए आवश्यक है, तो केवल इस आधार पर कि आवेदन देर से आया है, अदालत अपनी शक्ति का प्रयोग करने से इनकार नहीं कर सकती।

अंतिम बहस शुरू होने के बाद भी अदालत के पास विवेकाधिकार

फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हाईकोर्ट ने अंतिम बहस के चरण को अतिरिक्त दस्तावेज पेश करने के लिए पूर्ण कानूनी बाधा नहीं माना। अदालत ने माना कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य केवल तकनीकी आधार पर महत्वपूर्ण साक्ष्य को बाहर करना नहीं, बल्कि विवाद का सही निर्णय सुनिश्चित करना भी है। हालांकि, इस शक्ति का इस्तेमाल सावधानी से किया जाना चाहिए ताकि कोई पक्ष मुकदमे को अनावश्यक रूप से लंबा करने या प्रक्रिया में देरी करने के लिए अंतिम चरण में नए दस्तावेज पेश करने की कोशिश न करे। इस प्रकार इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आदेश VII नियम 14(3) CPC के तहत अतिरिक्त दस्तावेज रिकॉर्ड पर लेने का फैसला प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। साक्ष्य बंद होना और अंतिम बहस शुरू हो जाना महत्वपूर्ण परिस्थितियां हैं, लेकिन ये अदालत की शक्ति पर स्वतः पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगातीं।