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हिंदू उत्तराधिकार कानून पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, बंटवारा न होने पर भी विधवा का सीमित अधिकार बनेगा पूर्ण स्वामित्व
सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14(1) को लेकर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि 1956 से पहले पति की मृत्यु के बाद संपत्ति में सीमित अधिकार पाने वाली हिंदू विधवा का अधिकार पूर्ण स्वामित्व में बदल सकता है, भले ही संपत्ति का औपचारिक बंटवारा न हुआ हो।

सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14(1) को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि 1956 से पहले पति की मृत्यु के बाद संपत्ति में सीमित अधिकार पाने वाली हिंदू विधवा का अधिकार बाद में पूर्ण स्वामित्व में बदल सकता है। इसके लिए यह जरूरी नहीं है कि विधवा ने संपत्ति का औपचारिक बंटवारा कराया हो।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर विधवा के अधिकार को खत्म नहीं किया जा सकता कि उसने 1937 के कानून के तहत अपने हिस्से की संपत्ति का विभाजन नहीं कराया था। यदि विधवा को अपने पति की मृत्यु के बाद संपत्ति में हित प्राप्त हुआ था, तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14(1) के तहत उसका सीमित अधिकार पूर्ण स्वामित्व में परिवर्तित हो सकता है। यह फैसला जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने सुनाया। मामला उस संपत्ति से जुड़ा था, जिसमें एक हिंदू व्यक्ति की 1949 में मृत्यु के बाद उसकी विधवा को संपत्ति में अधिकार मिला था। यह मृत्यु हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के लागू होने से पहले हुई थी।
मामले में ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत ने विधवा को संपत्ति का पूर्ण मालिक मानने से इनकार किया था। इन अदालतों का मानना था कि विधवा ने हिंदू महिला संपत्ति अधिकार अधिनियम, 1937 के तहत संपत्ति के बंटवारे की मांग नहीं की थी। बाद में कर्नाटक हाईकोर्ट की धारवाड़ पीठ ने इन निष्कर्षों को पलटते हुए विधवा के पूर्ण स्वामित्व के अधिकार को मान्यता दी थी। इसके बाद संपत्ति के एक दावेदार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। वह मृतक की पहली पत्नी से पैदा हुआ पुत्र था और उसके कानूनी प्रतिनिधियों ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि 1937 के कानून के तहत विधवा को प्राप्त सीमित अधिकार, 1956 के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14(1) के प्रभाव से पूर्ण स्वामित्व में बदल जाता है। अदालत ने कहा कि संपत्ति का औपचारिक बंटवारा नहीं होना इस अधिकार के विस्तार में बाधा नहीं है। जस्टिस एसवीएन भट्टी द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि विधवा अपने पति के स्थान पर संपत्ति में अधिकार प्राप्त करती है और धारा 14(1) के तहत उस संपत्ति पर उसका अधिकार पूर्ण हो जाता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही विधवा के कानूनी प्रतिनिधि मौखिक बंटवारे को साबित करने में असफल रहे हों, फिर भी 1937 के अधिनियम और 1956 के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम को साथ पढ़ने पर विधवा के पूर्ण स्वामित्व का अधिकार प्रभावित नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि विधवा और जीवित सहदायिक के बीच औपचारिक बंटवारा होना पूर्ण स्वामित्व के अधिकार के लिए अनिवार्य शर्त नहीं है। इस प्रकार अदालत ने स्पष्ट किया कि 1956 के कानून के लागू होने से पहले पति से मिली संपत्ति में विधवा का सीमित हित केवल इसलिए समाप्त नहीं हो जाता कि उसने अलग से बंटवारे की कार्यवाही नहीं की थी।
