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तीन बच्चों की हत्या के मामले में मौत की सजा पाने वाली मां बरी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 8 साल के बच्चे की गवाही को बताया ‘सिखाई-पढ़ाई गई’

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तीन बच्चों की हत्या के मामले में मौत की सजा पाने वाली मां और उसके कथित प्रेमी को बरी कर दिया है। अदालत ने 8 वर्षीय जीवित बच्चे की गवाही में गंभीर और असंगत विरोधाभास पाते हुए कहा कि इसमें ट्यूशन दिए जाने के स्पष्ट संकेत हैं, इसलिए केवल इस गवाही के आधार पर दोषसिद्धि सुरक्षित नहीं मानी जा सकती।

Sonali26 सित. 2026, 03:19 PM IST
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तीन बच्चों की हत्या के मामले में मौत की सजा पाने वाली मां बरी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 8 साल के बच्चे की गवाही को बताया ‘सिखाई-पढ़ाई गई’

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तीन बच्चों की हत्या के मामले में मौत की सजा पाने वाली मां प्रियंका को बरी कर दिया है। कोर्ट ने उसके कथित प्रेमी आशीष उर्फ डैनी को भी बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष दोनों के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। अदालत ने 8 वर्षीय जीवित बच्चे की गवाही को गंभीर विरोधाभासों से भरा और ‘ट्यूटर्ड’ यानी सिखाई-पढ़ाई गई गवाही के स्पष्ट संकेत वाला पाया। जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें प्रियंका को मौत की सजा और आशीष को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट ने दोनों को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया, बशर्ते किसी अन्य मामले में उनकी जरूरत न हो।


मामला और अभियोजन का आरोप

मामला औरैया जिले का है, जहां 27 जून 2024 को सेंगुर नदी से तीन बच्चों माधव उर्फ गूंगा (6), आदित्य उर्फ टिल्ला (5) और मंगल (4) के शव बरामद हुए थे। अभियोजन का आरोप था कि प्रियंका अपने चारों बेटों को सुबह करीब 5 बजे सेंगुर नदी के पुल पर ले गई थी और अपने पति के छोटे भाई आशीष उर्फ डैनी के साथ मिलकर बच्चों को नदी में डुबोने की कोशिश की। एफआईआर के अनुसार, दोनों के बीच कथित संबंध थे और वे बच्चों से छुटकारा पाना चाहते थे। आरोप था कि चारों बच्चों को डुबोने का प्रयास किया गया, लेकिन सबसे बड़ा बेटा सोनू बच गया, जबकि बाकी तीन बच्चों की मौत हो गई। जुलाई 2025 में औरैया के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने दोनों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 सहपठित धारा 120-बी के तहत दोषी ठहराया था। प्रियंका को धारा 302 के तहत मौत की सजा और आशीष को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। दोनों पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था।


8 साल के बच्चे की गवाही बनी मुख्य आधार

ट्रायल कोर्ट का फैसला मुख्य रूप से प्रियंका के चौथे बच्चे सोनू की गवाही पर आधारित था। सोनू ने अदालत को बताया था कि उसकी मां उसे और उसके तीन भाइयों को नदी के पास ले गई और एक-एक करके उन्हें डुबाने की कोशिश की। उसने दावा किया कि वह मरने का नाटक करके बच गया और बाद में बकरियां चरा रहे एक व्यक्ति से मदद मांगी। सोनू के अनुसार, उस व्यक्ति ने उसे एक गली की ओर भेजा, जहां उसकी मुलाकात ग्राम प्रधान जितेंद्र भूषण से हुई। प्रधान उसे अपने घर ले गए, जहां उसने पूरी घटना बताई और इसके बाद प्रधान ने पुलिस को सूचना दी। हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि इस संबंध में अन्य गवाहों के बयान सोनू की कहानी से मेल नहीं खाते थे। प्रथम सूचनाकर्ता मनीष ने बताया कि उसे घटना की जानकारी ग्राम प्रधान के माध्यम से मिली थी। उसने यह भी कहा कि उसे यह नहीं पता था कि उसे घटना की सूचना देने वाला व्यक्ति कौन था।


गवाही में विरोधाभास पर कोर्ट की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि कम उम्र अपने आप में किसी बच्चे को गवाही देने के लिए अयोग्य नहीं बनाती, लेकिन ऐसे साक्ष्य की विश्वसनीयता की बेहद सावधानी से जांच करना जरूरी है। अदालत ने सोनू के बयान में कई गंभीर विरोधाभास पाए। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि सोनू के अनुसार पुलिस उसे घटना के बाद थाने ले गई थी, लेकिन उसका बयान उसी दिन दर्ज नहीं किया गया। उसका बयान 5 जुलाई 2024 को दर्ज किया गया था। इन परिस्थितियों पर गौर करते हुए अदालत ने कहा कि बच्चे की गवाही में वयस्क रिश्तेदारों के प्रभाव के स्पष्ट संकेत दिखाई देते हैं और उसकी कहानी 8 साल के बच्चे की स्वाभाविक प्रतिक्रिया के बजाय कृत्रिम रूप से तैयार की गई प्रतीत होती है। कोर्ट ने माना कि बच्चे की गवाही में ऐसे ‘असंगत विरोधाभास’ हैं, जिनके कारण केवल उसी के बयान को दोषसिद्धि का आधार बनाना सुरक्षित नहीं है।


अभियोजन अपना मामला संदेह से परे साबित नहीं कर सका

पीठ ने प्रथम सूचनाकर्ता मनीष के बयान की भी जांच की और पाया कि उसने घटना की जानकारी मिलने के स्रोत को लेकर अलग-अलग बातें बताईं। अदालत ने इन परिस्थितियों को अभियोजन के मामले की विश्वसनीयता के लिए महत्वपूर्ण माना। हाईकोर्ट ने अंततः कहा कि अभियोजन पक्ष प्रियंका और आशीष के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। इसलिए दोनों की दोषसिद्धि और सजा को रद्द करते हुए उन्हें बरी कर दिया गया तथा तत्काल रिहाई का आदेश दिया गया।