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PMLA में ED की गिरफ्तारी पर बॉम्बे हाईकोर्ट सख्त, कहा- ‘गिरफ्तारी कठोर कार्रवाई’, नए सबूत के बिना नहीं कर सकते कार्रवाई
PMLA में ED की गिरफ्तारी शक्ति पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी कठोर कार्रवाई है और धारा 50 के तहत पूछताछ की प्रक्रिया को दरकिनार कर उसी सामग्री के आधार पर आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।

मुंबई।
धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत प्रवर्तन निदेशालय (ED) की गिरफ्तारी की शक्ति को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति मिलिंद एन. जाधव ने कहा कि गिरफ्तारी एक ‘कठोर कार्रवाई’ है और ED धारा 50 के तहत पूछताछ की प्रक्रिया को बीच में छोड़कर उसी सामग्री के आधार पर धारा 19 के तहत किसी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में गिरफ्तारी को सही ठहराने के लिए नई आपत्तिजनक सामग्री या ऐसी नई परिस्थितियां सामने आनी चाहिए, जो गिरफ्तारी को आवश्यक बनाती हों। यह फैसला राजेंद्र नरपतलाल लोढ़ा की याचिका पर आया, जो पहले लोढ़ा डेवलपर्स से जुड़े रहे हैं। हाईकोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी से संबंधित रिमांड आदेश को रद्द करते हुए उन्हें 5 लाख रुपये के व्यक्तिगत बॉन्ड और जमानतदारों की शर्त पर रिहा करने का निर्देश दिया। साथ ही उन्हें जांच में सहयोग करने, पासपोर्ट जमा करने और अदालत की अनुमति के बिना भारत से बाहर नहीं जाने का निर्देश दिया गया।
मामले के अनुसार, सितंबर 2025 में मुंबई पुलिस ने लोढ़ा के खिलाफ मूल अपराध से संबंधित एफआईआर दर्ज की थी और उन्हें गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद ED ने 30 सितंबर 2025 को संबंधित ECIR दर्ज कर जांच शुरू की। ED ने उनके आवास की तलाशी ली, दस्तावेज जब्त किए और कुछ बैंक खातों को फ्रीज किया। इसके बाद 29 जनवरी 2026 को ED ने विशेष PMLA अदालत के समक्ष आवेदन देकर PMLA की धारा 50 के तहत लोढ़ा का बयान दर्ज करने और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर उनसे पूछताछ करने की अनुमति मांगी। विशेष अदालत ने 30 जनवरी को ED के आवेदन को मंजूर कर लिया। हालांकि, ED ने लोढ़ा का बयान दर्ज करने की प्रक्रिया पूरी करने के बजाय बाद में गिरफ्तारी की कार्रवाई शुरू कर दी। 12 फरवरी को ED ने गिरफ्तारी की अनुमति मांगते हुए नया आवेदन दाखिल किया और 13 फरवरी 2026 को विशेष अदालत की अनुमति के बाद लोढ़ा को गिरफ्तार कर लिया गया। हाईकोर्ट ने इस घटनाक्रम पर विशेष ध्यान दिया। अदालत ने पाया कि 29 जनवरी से 13 फरवरी के बीच ED के सामने ऐसा कोई नया, आपत्तिजनक या अतिरिक्त तथ्य सामने नहीं आया था, जिसके आधार पर गिरफ्तारी को उचित ठहराया जा सके। यानी जिस सामग्री के आधार पर पहले ED ने अदालत से पूछताछ की अनुमति मांगी थी, गिरफ्तारी भी उसी सामग्री के आधार पर की गई।
ED की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह ने दलील दी कि PMLA की धारा 19 के तहत अधिकृत अधिकारी के पास यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध में शामिल होने का ‘विश्वास करने का कारण’ हो, तो वह कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए गिरफ्तार कर सकता है। अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। न्यायमूर्ति जाधव ने कहा कि धारा 19 में गिरफ्तारी की शक्ति का इस्तेमाल विवेकपूर्ण तरीके से किया जाना चाहिए। यदि ED स्वयं अदालत के समक्ष यह कह चुकी है कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर व्यक्ति से पूछताछ और बयान दर्ज करना जरूरी है, तो बिना उस प्रक्रिया को पूरा किए उसी सामग्री के आधार पर गिरफ्तारी करना उचित नहीं होगा। अदालत ने कहा कि नई आपत्तिजनक सामग्री या कोई ऐसी बाद की परिस्थिति होनी चाहिए, जो गिरफ्तारी को आवश्यक बनाए। हाईकोर्ट ने ED द्वारा पहले के आदेश का उल्लेख बाद की गिरफ्तारी संबंधी अर्जी में नहीं किए जाने को भी महत्वपूर्ण माना। अदालत के अनुसार, गिरफ्तारी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करती है, इसलिए एजेंसी द्वारा पहले अपनाई गई कानूनी प्रक्रिया और अदालत के आदेश को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने अंततः लोढ़ा की गिरफ्तारी और रिमांड को रद्द कर दिया। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि PMLA के तहत ED की जांच समाप्त हो गई है। अदालत ने जांच में सहयोग सहित कई शर्तों के साथ राहत दी है। इस फैसले से यह सिद्धांत सामने आता है कि PMLA के तहत गिरफ्तारी की शक्ति का इस्तेमाल केवल उपलब्ध सामग्री को दोहराकर नहीं, बल्कि कानून में निर्धारित प्रक्रिया और परिस्थितियों के अनुरूप किया जाना चाहिए।
