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ICU की ऑक्सीजन सप्लाई बंद करने के आरोप में 3 डॉक्टरों को राहत नहीं, बॉम्बे हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने से किया इनकार

पुणे के एक अस्पताल के ICU में ऑक्सीजन सप्लाई बंद करने के आरोप में फंसे तीन डॉक्टरों को बॉम्बे हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली। कोर्ट ने FIR रद्द करने से इनकार करते हुए कहा कि चार्जशीट में नर्सों, अस्पताल स्टाफ और सुरक्षा गार्ड समेत कई गवाहों के बयान हैं, जो आरोपियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनाते हैं।

Sonali25 सित. 2026, 06:04 PM IST
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ICU की ऑक्सीजन सप्लाई बंद करने के आरोप में 3 डॉक्टरों को राहत नहीं, बॉम्बे हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने से किया इनकार

मुंबई।

 बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुणे के एक अस्पताल के ICU में ऑक्सीजन सप्लाई कथित तौर पर बंद करने के मामले में आरोपी तीन डॉक्टरों के खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने से इनकार कर दिया है। न्यायमूर्ति रंजितसिंहा भोंसले ने कहा कि FIR में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया आरोपियों के खिलाफ मामला बनाते हैं और इस स्तर पर अदालत की अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल कर आपराधिक कार्यवाही को खत्म करने का आधार नहीं बनता। मामला डॉ. रमेश किसानराव सोनावणे, डॉ. भूषण सोनावणे और डॉ. हर्षल सोनावणे से संबंधित है। तीनों एक ही परिवार से हैं और पेशे से डॉक्टर हैं। उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का रुख किया था।


अस्पताल में घुसने और धमकी देने का आरोप

अभियोजन के अनुसार, आरोपी पुणे स्थित उस अस्पताल में पहुंचे थे, जिसे डॉ. महेंद्र चव्हाण संचालित करते हैं। आरोपी डॉक्टरों ने अस्पताल में मौजूद एक बच्चे के परिजनों से कथित तौर पर पूछा कि वे ICU के बाहर क्यों बैठे हैं। उन्होंने बच्चे को किसी दूसरे अस्पताल में ले जाने के लिए कहा और डॉ. चव्हाण को जान से मारने की धमकी देने का भी आरोप है। बताया गया कि आरोपी डॉक्टर, डॉ. चव्हाण के ससुराल पक्ष से हैं। रिकॉर्ड के अनुसार, अस्पताल डॉ. चव्हाण की पत्नी को उपहार के रूप में दिया गया था।


ऑक्सीजन सप्लाई बंद होने से बिगड़ी बच्चे की हालत

अभियोजन का आरोप है कि अस्पताल में अचानक हुए विवाद और हंगामे के बीच डॉ. चव्हाण तथा अस्पताल का स्टाफ मौके पर पहुंचा। इसी दौरान आरोपियों ने कथित तौर पर डॉ. चव्हाण के साथ गाली-गलौज और धमकी दी। आरोप यह भी है कि इसी घटनाक्रम के दौरान ICU की ऑक्सीजन सप्लाई बंद कर दी गई। उस समय एक गंभीर रूप से बीमार बच्चा ICU में भर्ती था। ऑक्सीजन सप्लाई बाधित होने के बाद बच्चे की हालत बिगड़ गई। हालांकि अस्पताल के डॉक्टरों और कर्मचारियों ने उसका इलाज कर उसकी स्थिति को फिर सामान्य किया। इसके बाद डॉ. चव्हाण ने बच्चे के परिजनों को बताया कि आरोपी उनके ससुराल पक्ष से हैं, जिसके बाद FIR दर्ज कराई गई।


आरोपियों ने बताया पारिवारिक विवाद

हाईकोर्ट में आरोपियों की ओर से दलील दी गई कि FIR वास्तविक घटना के बजाय पारिवारिक विवाद का परिणाम है। उनका कहना था कि डॉ. चव्हाण के बच्चे बीमार थे और उन्हें उचित दवा देने के लिए वे अस्पताल गए थे। आरोपियों ने दावा किया कि FIR के जरिए उनके खिलाफ पुराना हिसाब चुकता करने की कोशिश की गई।

कोर्ट ने इन दलीलों को इस स्तर पर स्वीकार नहीं किया। न्यायमूर्ति भोंसले ने कहा कि आरोपियों द्वारा उठाए गए बचाव के सभी पहलुओं की जांच ट्रायल के दौरान की जा सकती है।


चार्जशीट में गवाहों के बयान मौजूद

अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद चार्जशीट का भी उल्लेख किया। इसमें नर्सों, अस्पताल के कर्मचारियों और सुरक्षा गार्ड समेत कई गवाहों के बयान दर्ज हैं। कोर्ट ने कहा कि इन बयानों से घटना के समय आरोपियों की प्रथम दृष्टया मौजूदगी को खारिज नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता के आरोप प्रथम दृष्टया अपराध का मामला बनाते हैं और रिकॉर्ड पर आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सामग्री मौजूद है। ऐसे में CrPC की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्ति का इस्तेमाल कर FIR रद्द करना उचित नहीं होगा। बॉम्बे हाईकोर्ट ने आरोपियों की याचिका खारिज करते हुए FIR रद्द करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपियों द्वारा उठाए गए बचाव और उनके दावों की वास्तविकता का परीक्षण ट्रायल के दौरान किया जाएगा।