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202 CrPC के तहत जांच शुरू होने के बाद मजिस्ट्रेट 156(3) पर वापस नहीं जा सकता: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब मजिस्ट्रेट शिकायत का संज्ञान लेकर CrPC की धारा 200 और 202 के तहत कार्यवाही शुरू कर देता है, तो वह वापस संज्ञान-पूर्व चरण में जाकर धारा 156(3) के तहत पुलिस जांच का आदेश नहीं दे सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसी प्रक्रिया कानून की योजना के अनुरूप नहीं है और अवैध आदेश के आधार पर FIR कायम नहीं रखी जा सकती।

मुंबई।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि जब मजिस्ट्रेट किसी शिकायत का संज्ञान लेकर CrPC के अध्याय XV के तहत कार्यवाही शुरू कर देता है, तो वह दोबारा संज्ञान से पहले की स्थिति में लौटकर CrPC की धारा 156(3) के तहत पुलिस जांच का आदेश नहीं दे सकता। अदालत ने कहा कि धारा 202 के तहत जांच के लिए रिपोर्ट मंगाने के बाद धारा 156(3) के तहत जांच का निर्देश देना CrPC की प्रक्रिया और उसकी योजना के अनुरूप नहीं है।
न्यायमूर्ति रंजितसिंहा राजा भोंसले ने CrPC की धारा 482 के तहत दायर आवेदन पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। अब BNSS में धारा 482 के समकक्ष प्रावधान धारा 528 है। आवेदन में Judicial Magistrate First Class द्वारा पारित आदेश और उसके आधार पर IPC की धारा 420, 406, 465, 467 और 34 के तहत दर्ज FIR को रद्द करने की मांग की गई थी।
क्या था मामला?
मामला जमीन से जुड़े कथित धोखाधड़ी और जालसाजी के आरोपों से संबंधित था। शिकायतकर्ता का आरोप था कि आरोपियों ने जमीन से संबंधित पावर ऑफ अटॉर्नी में कथित तौर पर हेरफेर और जालसाजी की और उसके आधार पर शिकायतकर्ता की जमीन का हस्तांतरण कर दिया। शिकायत मिलने के बाद मजिस्ट्रेट ने शिकायतकर्ता को CrPC की धारा 200 के तहत अपना साक्ष्य पेश करने का निर्देश दिया। इसके बाद मजिस्ट्रेट ने धारा 202 के तहत पुलिस से रिपोर्ट भी मंगाई। पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि आरोपों से कोई अपराध बनता हुआ नहीं पाया गया। इसके बावजूद मजिस्ट्रेट ने बाद में CrPC की धारा 156(3) के तहत पुलिस को मामले की जांच करने का निर्देश दे दिया। इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
धारा 156(3) और 202 CrPC में अंतर
हाईकोर्ट ने दोनों प्रावधानों की प्रक्रिया को अलग-अलग बताया। अदालत के अनुसार, धारा 156(3) के तहत मजिस्ट्रेट संज्ञान लेने से पहले पुलिस को अपराध की जांच करने का निर्देश दे सकता है। वहीं, जब मजिस्ट्रेट शिकायत का संज्ञान लेकर अध्याय XV के तहत कार्यवाही शुरू करता है और धारा 202 के तहत जांच या रिपोर्ट की प्रक्रिया अपनाता है, तो वह उसी कार्यवाही के बीच वापस संज्ञान-पूर्व चरण में नहीं जा सकता। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता को धारा 200 के तहत साक्ष्य पेश करने के लिए कहने और धारा 202 के तहत रिपोर्ट मंगाने के बाद धारा 156(3) के तहत पुलिस जांच का आदेश देना प्रक्रियात्मक रूप से गलत था।
हाईकोर्ट ने माना प्रक्रियात्मक अवैधता
न्यायमूर्ति भोंसले ने कहा कि 1 अक्टूबर 2016 को धारा 156(3) के तहत जांच का निर्देश देने वाले आदेश में स्पष्ट प्रक्रियात्मक अवैधता थी। अदालत ने यह भी कहा कि किसी अनुचित या अवैध आदेश के आधार पर FIR दर्ज या कायम नहीं रखी जा सकती। इसके बाद हाईकोर्ट ने चुनौती दिए गए आदेश की वैधता पर विचार किया और मामले में अपनाई गई प्रक्रिया को CrPC की योजना के अनुरूप नहीं पाया। फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेने के बाद अपनाई गई कार्यवाही को बीच में छोड़कर दोबारा संज्ञान-पूर्व चरण में लौटना कानून की निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है। यह फैसला मजिस्ट्रेट द्वारा शिकायत मामलों में धारा 156(3), 200 और 202 CrPC के इस्तेमाल के क्रम को लेकर महत्वपूर्ण है।
