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ट्रेन हादसे में गर्भवती महिला की मौत, 7 महीने के अजन्मे बच्चे के लिए भी ₹8 लाख मुआवजा देगा रेलवे: इलाहाबाद HC
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रेन हादसे में गर्भवती महिला और उसके गर्भ में पल रहे सात महीने के भ्रूण की मौत को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि गर्भ में पांच महीने या उससे अधिक समय के भ्रूण को मुआवजे के लिए अस्तित्व में मौजूद बच्चे के समान माना जा सकता है। अदालत ने भ्रूण की मौत को मां की मौत से अलग स्वतंत्र नुकसान मानते हुए रेलवे को उसके लिए अतिरिक्त ₹8 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया।

प्रयागराज।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रेन हादसे में गर्भवती महिला की मौत के मामले में अजन्मे बच्चे के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि गर्भ में पांच महीने या उससे अधिक समय के भ्रूण को मुआवजे के उद्देश्य से अस्तित्व में मौजूद बच्चे के समान माना जा सकता है। सात महीने के भ्रूण की मौत को मां की मौत से अलग स्वतंत्र नुकसान मानते हुए कोर्ट ने रेलवे को अतिरिक्त ₹8 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की पीठ ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल, लखनऊ के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें अजन्मे बच्चे के लिए मुआवजे का दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया गया था कि भ्रूण रेलवे अधिनियम, 1989 के तहत 'वास्तविक यात्री' नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में रेलवे की वैधानिक मुआवजा देयता लागू होती है।
2017 में ट्रेन से उतरते समय हुआ था हादसा
मामला सावित्री देवी की मौत से जुड़ा है। 13 जून 2017 को वह अपने दो बेटों के साथ जनसाधारण एक्सप्रेस से सीतापुर कैंट से बिसवां रेलवे स्टेशन जा रही थीं। उनके पास द्वितीय श्रेणी का यात्रा टिकट था। बिसवां रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से उतरते समय सावित्री देवी अचानक गिर गईं और गंभीर रूप से घायल हो गईं। बाद में उनकी मौत हो गई। हादसे के समय वह करीब सात महीने के गर्भ से थीं और दुर्घटना में उनके गर्भ में पल रहे भ्रूण की भी मौत हो गई। इसके बाद परिवार ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल के समक्ष मुआवजे की मांग की। हालांकि ट्रिब्यूनल ने भ्रूण के लिए मुआवजा देने से इनकार कर दिया। ट्रिब्यूनल का कहना था कि अजन्मा बच्चा रेलवे अधिनियम की धारा 123(c)(2) और धारा 124-A के तहत वास्तविक यात्री नहीं था।
हाईकोर्ट ने कहा- भ्रूण की मौत भी स्वतंत्र नुकसान
ट्रिब्यूनल के फैसले को परिवार ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने मामले में गर्भ में पल रहे बच्चे के कानूनी संरक्षण और विभिन्न हाईकोर्ट के पूर्व फैसलों का उल्लेख किया।
कोर्ट ने कहा कि गर्भ में पल रहा भ्रूण मां के शरीर में एक अलग जीवन है और भ्रूण का नुकसान वास्तव में बच्चे का नुकसान है। पीठ ने माना कि गर्भ में पांच महीने या उससे अधिक समय के अजन्मे बच्चे को जन्म से पहले ही मुआवजे के उद्देश्य से अस्तित्व में मौजूद बच्चे के समान माना जा सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि जिस अजन्मे बच्चे का जीवित जन्म नहीं हो पाया, उसे उसकी मृत्यु के लिए क्षतिपूर्ति के दावे के संदर्भ में 'व्यक्ति' माना जा सकता है।
रेलवे को देना होगा अतिरिक्त ₹8 लाख
हाईकोर्ट ने रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 124-A का उल्लेख करते हुए कहा कि भले ही कानून में 'भ्रूण' शब्द का विशेष रूप से उल्लेख नहीं है, लेकिन दुर्घटना एक 'untoward incident' थी और इसके कारण महिला तथा उसके गर्भ में पल रहे बच्चे की मृत्यु हुई। इसलिए रेलवे की वैधानिक मुआवजा देयता लागू होगी। कोर्ट ने रेलवे दुर्घटना एवं अप्रिय घटना (मुआवजा) नियम, 1990 की संशोधित अनुसूची का भी उल्लेख किया। 1 जनवरी 2017 से लागू संशोधित नियमों में मृत्यु के लिए ₹8 लाख मुआवजा निर्धारित था। हाईकोर्ट ने सात महीने के भ्रूण को बच्चे के रूप में मानते हुए उसकी मौत को मां की मौत से अलग स्वतंत्र दुर्घटना माना। इसके आधार पर अदालत ने रेलवे को अजन्मे बच्चे की मौत के लिए अतिरिक्त ₹8 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने 26 सितंबर 2023 के रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द करते हुए अपील मंजूर कर ली और मामले के रिकॉर्ड अनुपालन के लिए ट्रिब्यूनल को वापस भेजने का निर्देश दिया।
केस: Ashok Kumar And Others vs. Union Of India Through General Manager, North Eastern Railway, Gorakhpur
फैसला: 23 सितंबर 2026
