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सुप्रीम कोर्ट टिप्पणी : ट्रेन टिकट नहीं मिलने से खत्म नहीं होगा मुआवजे का दावा, रेलवे को देना होगा 8 लाख रुपये

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रेन टिकट नहीं मिलने मात्र से रेलवे दुर्घटना में मुआवजे का दावा खारिज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने 8 लाख रुपये का मुआवजा बहाल करते हुए कहा कि परिस्थितियां यात्री के वास्तविक होने की पुष्टि करती हैं।

Sonali28 सित. 2026, 03:59 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट टिप्पणी : ट्रेन टिकट नहीं मिलने से खत्म नहीं होगा मुआवजे का दावा, रेलवे को देना होगा 8 लाख रुपये

नई दिल्ली।

सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे दुर्घटना में मुआवजे के दावे को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि दुर्घटना के शिकार व्यक्ति के पास से रेलवे टिकट बरामद न होना अपने आप में मुआवजे के दावे को खारिज करने का आधार नहीं बन सकता। कोर्ट ने कहा कि यदि दावेदार शपथपत्र या अन्य विश्वसनीय साक्ष्य के माध्यम से यह प्रारंभिक रूप से साबित कर देता है कि मृतक वास्तविक यात्री था, तो इसके बाद रेलवे पर यह साबित करने का भार आ जाता है कि वह अधिकृत यात्री नहीं था।

जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंद्रूरकर की पीठ ने 25 सितंबर 2026 को Sukhabhai Nanjibhai Makwana एवं अन्य बनाम Union of India मामले में यह फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल द्वारा दिया गया मुआवजा रद्द कर दिया गया था। कोर्ट ने ट्रिब्यूनल द्वारा दिए गए 8 लाख रुपये के मुआवजे को बहाल करते हुए रेलवे को इसे 30 दिनों के भीतर अदा करने का निर्देश दिया।


क्या था पूरा मामला

मामला सितंबर 2017 की एक रेलवे दुर्घटना से जुड़ा था। मृतक महेशभाई कथित तौर पर ट्रेन से गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां एक महीने से अधिक समय तक उनका इलाज चला। इसके बाद 31 अक्टूबर 2017 को उनकी मौत हो गई। मृतक के माता-पिता ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के समक्ष मुआवजे के लिए दावा दायर किया था। ट्रिब्यूनल ने घटना को रेलवे अधिनियम, 1989 के तहत ‘अनटुवर्ड इंसीडेंट’ माना और 8 लाख रुपये का मुआवजा 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ देने का आदेश दिया था। हालांकि, गुजरात हाईकोर्ट ने बाद में यह आदेश पलट दिया। हाईकोर्ट ने टिकट बरामद नहीं होने और ट्रेन से गिरने की घटना के संबंध में पर्याप्त प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं होने को महत्वपूर्ण माना था।


सुप्रीम कोर्ट ने क्यों बहाल किया मुआवजा

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में Union of India v. Rina Devi के सिद्धांत को दोहराया। कोर्ट ने कहा कि घायल या मृत व्यक्ति के पास टिकट नहीं मिलने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वह वास्तविक यात्री नहीं था। दावेदार को पहले अपनी ओर से प्रारंभिक आधार प्रस्तुत करना होता है। इसके बाद परिस्थितियों के अनुसार रेलवे पर उस दावे का खंडन करने का भार आ जाता है। इस मामले में मृतक के पिता ने शपथ लेकर कहा था कि उनके बेटे ने यात्रा के लिए टिकट खरीदा था, लेकिन दुर्घटना के बाद उसके अन्य सामान के साथ टिकट भी खो गया। उन्होंने यह भी बताया था कि टिकट के अलावा रूमाल, कलाई घड़ी, कंघी और करीब 800 से 900 रुपये की नकदी भी गायब थी। कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि रेलवे की ओर से पेश किए गए गवाहों ने जिरह के दौरान स्वीकार किया कि उन्होंने मृतक की जेबों की तलाशी लेकर यह पता नहीं लगाया था कि टिकट मौजूद था या नहीं। ऐसे में रेलवे उस दावे का प्रभावी खंडन करने में सफल नहीं रहा।


एक महीने से अधिक अस्पताल में भर्ती रहने का भी असर

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मृतक दुर्घटना के बाद एक महीने से अधिक समय तक अस्पताल में भर्ती रहा और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। ऐसी परिस्थितियों में यह मानना मुश्किल है कि यात्रा का टिकट सुरक्षित रूप से बचा रहा होगा। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने टिकट की अनुपस्थिति को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया और मृतक के पिता के शपथ पर दिए बयान तथा लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहने की परिस्थिति पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।


रेलवे की देरी से हुई जांच रिपोर्ट पर भी सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे की जांच रिपोर्ट को भी महत्वपूर्ण माना। अदालत के अनुसार, संबंधित जांच रिपोर्ट घटना के करीब सात महीने बाद मई 2018 में तैयार की गई थी और यह दावा आवेदन दाखिल होने के बाद तैयार हुई। कोर्ट ने कहा कि जांच में हुई देरी का जिम्मेदार दावेदारों को नहीं ठहराया जा सकता और रेलवे अपनी ही देरी का लाभ नहीं उठा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने उस विलंबित रिपोर्ट को नजरअंदाज करना उचित माना।


‘बोनाफाइड यात्री’ होने पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले की परिस्थितियों को देखते हुए कहा कि संभावनाओं के संतुलन के आधार पर मृतक को वास्तविक यानी ‘बोनाफाइड’ यात्री माना जा सकता है। केवल रेलवे टिकट की बरामदगी न होने के कारण मुआवजे का दावा खत्म नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 124-A के तहत ‘सख्त दायित्व’ के सिद्धांत का भी उल्लेख किया और कहा कि मामले की परिस्थितियों में यह प्रावधान लागू होता है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के मुआवजा आदेश को बहाल कर दिया। रेलवे को 30 दिनों के भीतर मुआवजा देने का निर्देश दिया गया।