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बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: DPCO प्रक्रिया के बिना दवा की कीमत तय नहीं कर सकता NPPA
बॉम्बे हाईकोर्ट ने दवाओं की कीमत तय करने के मामले में कहा है कि NPPA DPCO 1995 में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी फॉर्मूलेशन पर मनमाने तरीके से कीमत की सीमा नहीं लगा सकता। कोर्ट ने 2009 की व्यापक अधिसूचना रद्द करते हुए कंपनी से कथित अतिरिक्त वसूली के डिमांड नोटिस भी खारिज कर दिए।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने दवाओं की कीमत तय करने के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) किसी दवा के फॉर्मूलेशन पर मनमाने या व्यापक तरीके से कीमत की सीमा तय नहीं कर सकती। इसके लिए Drugs (Prices Control) Order, 1995 (DPCO) में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है। जस्टिस मनीष पिताले और जस्टिस श्रीराम वी. शिरसाट की खंडपीठ ने M/s Pharmed Limited की याचिका पर सुनवाई करते हुए NPPA की 30 जनवरी 2009 की अधिसूचना को DPCO 1995 के अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया और इसे रद्द कर दिया। कोर्ट ने कंपनी से कथित रूप से अधिक कीमत वसूलने के आधार पर जारी किए गए डिमांड नोटिस भी रद्द कर दिए। मामला ‘Cartigen Forte’ नामक फॉर्मूलेशन से जुड़ा था, जिसका इस्तेमाल ऑस्टियोआर्थराइटिस के उपचार में किया जाता है। NPPA ने वर्ष 2007 में मल्टीविटामिन और मिनरल टैबलेट तथा कैप्सूल के लिए सीलिंग कीमत निर्धारित की थी। इसके बाद 2009 की अधिसूचना के जरिए यह प्रावधान किया गया कि ऐसे फॉर्मूलेशन, जो उसके मौजूदा आदेशों के तहत कवर नहीं होते लेकिन उनमें कोई शेड्यूल्ड ड्रग एक घटक के रूप में मौजूद है, उन पर संबंधित सीलिंग कीमत लागू होगी। कंपनी ने हाईकोर्ट में दलील दी कि उसका फॉर्मूलेशन 2007 की अधिसूचना के दायरे में नहीं आता था और 2009 की अधिसूचना के जरिए NPPA ने निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के बिना अत्यधिक व्यापक कीमत सीमा लागू कर दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि DPCO 1995 के तहत NPPA के पास कुछ परिस्थितियों में फॉर्मूलेशन की कीमत तय करने का अधिकार है। यदि निर्माता या आयातक कीमत निर्धारण के लिए आवेदन नहीं करता और आवश्यक जानकारी भी उपलब्ध नहीं कराता, तो प्राधिकरण उपलब्ध जानकारी के आधार पर कीमत तय कर सकता है। हालांकि, इसके लिए DPCO में निर्धारित प्रासंगिक कारकों और फॉर्मूले के आधार पर सीलिंग कीमत की गणना करना जरूरी है। कोर्ट ने पाया कि संबंधित फॉर्मूलेशन के मामले में ऐसी कोई गणना नहीं की गई थी। इसलिए कंपनी पर अधिक कीमत वसूलने का आरोप लगाने का आधार ही समाप्त हो जाता है। हाईकोर्ट ने 27 सितंबर 2007 की अधिसूचना को याचिकाकर्ताओं के फॉर्मूलेशन पर लागू किए जाने की सीमा तक रद्द कर दिया। इसके बाद कोर्ट ने 30 जनवरी 2009 की अधिसूचना की वैधता पर विचार किया। कोर्ट ने इसे बेहद व्यापक बताते हुए कहा कि यह DPCO 1995 के प्रावधानों के विपरीत काम करती है और NPPA को इस तरह की अधिसूचना जारी करने का अधिकार नहीं था। कोर्ट ने कहा कि 2009 की अधिसूचना “अत्यधिक व्यापक” थी और DPCO 1995 के प्रावधानों के खिलाफ संचालित होती थी। इसलिए इसे जारी करने का अधिकार NPPA के पास नहीं था।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि NPPA की ओर से सुनवाई में हुई देरी के कारण कंपनी पर ब्याज की मांग का मुद्दा उठा था। हालांकि, चूंकि संबंधित अधिसूचनाएं ही रद्द की जा रही थीं, इसलिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन के सवाल पर अलग से विचार करना आवश्यक नहीं था। अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए 27 सितंबर 2007 की अधिसूचना को कंपनी के संबंधित फॉर्मूलेशन पर लागू किए जाने की सीमा तक रद्द कर दिया। वहीं 30 जनवरी 2009 की अधिसूचना को पूरी तरह रद्द कर दिया गया।
केस: M/s. Pharmed Limited v. Union of India, Writ Petition No. 595 of 2017
