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सिर्फ जमानत मिलने की आशंका के आधार पर निवारक हिरासत नहीं रखी जा सकती: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने निवारक हिरासत को लेकर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि सिर्फ इस अनुमान पर किसी व्यक्ति को हिरासत में नहीं रखा जा सकता कि उसे जमानत मिल जाएगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डिटेनिंग अथॉरिटी की संतुष्टि ठोस जांच सामग्री पर आधारित होनी चाहिए, महज यह मान लेना कि अपराध में अनिवार्य मृत्युदंड नहीं है, जमानत की संभावना साबित नहीं करता।

मुंबई।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने निवारक हिरासत यानी Preventive Detention को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को केवल इस अनुमान के आधार पर निवारक हिरासत में नहीं रखा जा सकता कि जांच के दौरान उसे जमानत मिल सकती है। हिरासत का आदेश जारी करने वाली अथॉरिटी की संतुष्टि ठोस और प्रासंगिक सामग्री पर आधारित होनी चाहिए। जस्टिस रंजीतसिंहा राजा भोंसले और जस्टिस सारंग वी. कोतवाल की खंडपीठ ने कहा कि केवल यह तथ्य कि संबंधित अपराध में अनिवार्य रूप से मृत्युदंड का प्रावधान नहीं है, इस आधार पर यह मान लेना पर्याप्त नहीं है कि आरोपी को जमानत मिल जाएगी।
जमानत की संभावना का केवल अनुमान पर्याप्त नहीं
कोर्ट ने कहा कि निवारक हिरासत का आदेश जारी करते समय डिटेनिंग अथॉरिटी को यह संतुष्टि दर्ज करनी होती है कि हिरासत में लिया गया व्यक्ति जमानत पर रिहा हो सकता है और रिहाई के बाद उसकी गतिविधियां सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा पैदा कर सकती हैं। लेकिन ऐसी संतुष्टि महज अनुमान या सामान्य धारणा पर आधारित नहीं हो सकती। हाईकोर्ट के अनुसार, जमानत मिलने की संभावना का आकलन उपलब्ध जांच सामग्री और मामले की वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए। यदि अथॉरिटी के पास ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है जिससे यह निष्कर्ष निकले कि आरोपी के जल्द जमानत पर बाहर आने की वास्तविक संभावना है, तो केवल अनुमान के आधार पर निवारक हिरासत का आदेश कायम नहीं रखा जा सकता।
जांच से जुड़ी ठोस सामग्री जरूरी
पीठ ने पाया कि संबंधित मामले में डिटेनिंग अथॉरिटी की यह संतुष्टि कि डिटेनू यानी हिरासत में लिए गए व्यक्ति को जमानत मिल सकती है, जांच से संबंधित किसी ठोस सामग्री पर आधारित नहीं थी। कोर्ट ने इस बात को महत्वपूर्ण माना कि अपराध में मृत्युदंड का अनिवार्य प्रावधान नहीं होने का अर्थ यह नहीं है कि आरोपी निश्चित रूप से या जल्द जमानत पर रिहा हो जाएगा। जमानत का प्रश्न अदालत द्वारा मामले के तथ्यों, आरोपों और उपलब्ध सामग्री के आधार पर तय किया जाता है। इसलिए डिटेनिंग अथॉरिटी को निवारक हिरासत का आदेश जारी करते समय स्वतंत्र रूप से उपलब्ध सामग्री का मूल्यांकन करना आवश्यक है।
निवारक हिरासत के आदेश में संतुष्टि का आधार जरूरी
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि निवारक हिरासत एक गंभीर प्रकृति की कार्रवाई है। इसलिए इसके लिए कानून में निर्धारित आवश्यकताओं का पालन होना चाहिए। अथॉरिटी की व्यक्तिपरक संतुष्टि भी ऐसी सामग्री पर आधारित होनी चाहिए, जो संबंधित व्यक्ति की संभावित रिहाई और उसके बाद की गतिविधियों के संबंध में वास्तविक आधार प्रदान करे।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल यह मान लेना कि आरोपी को जमानत मिल सकती है, निवारक हिरासत को वैध ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है। हाईकोर्ट की यह टिप्पणी निवारक हिरासत से जुड़े मामलों में डिटेनिंग अथॉरिटी की जिम्मेदारी को रेखांकित करती है। अदालत ने कहा कि हिरासत का आधार ठोस जांच सामग्री से जुड़ा होना चाहिए और महज अनुमान के आधार पर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक नहीं लगाई जा सकती।
पीठ: जस्टिस रंजीतसिंहा राजा भोंसले और जस्टिस सारंग वी. कोतवाल
मामला: Preventive Detention से संबंधित याचिका
