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मध्य प्रदेश में 6 साल की सौतेली बेटी से रेप और हत्या के दोषी की फांसी उम्रकैद में बदली, सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश में 6 साल की सौतेली बेटी से रेप और उसकी हत्या के दोषी व्यक्ति की मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए मृत्युदंड को आजीवन कारावास में परिवर्तित किया।

Sonali28 सित. 2026, 08:44 PM IST
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मध्य प्रदेश में 6 साल की सौतेली बेटी से रेप और हत्या के दोषी की फांसी उम्रकैद में बदली, सुप्रीम कोर्ट का फैसला

नई दिल्ली।

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश में छह साल की सौतेली बेटी के रेप और हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति की मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है। हालांकि, कोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि बरकरार रखी। यह फैसला जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने सुनाया। मामले में अपीलकर्ता वारिस को छह साल की अपनी सौतेली बेटी के साथ दुष्कर्म और उसकी हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। निचली अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए उसे मृत्युदंड की सजा सुनाई थी। इसके बाद मामले को उच्च न्यायालय के समक्ष भी चुनौती दी गई और अंततः दोषी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य सवाल दोषसिद्धि के साथ-साथ मृत्युदंड को बरकरार रखने से जुड़ा था। तीन सदस्यीय पीठ ने उपलब्ध रिकॉर्ड और मामले की परिस्थितियों पर विचार करने के बाद दोषसिद्धि में हस्तक्षेप नहीं किया। हालांकि, पीठ ने मृत्युदंड को कम करते हुए आरोपी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।


यह मामला Protection of Children from Sexual Offences (POCSO) Act से संबंधित था। छह साल की बच्ची के खिलाफ किए गए अपराध को लेकर विशेष अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराया था। अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार, आरोपी ने बच्ची के साथ यौन अपराध किया और बाद में उसकी हत्या कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट में अपील के दौरान आरोपी की ओर से मृत्युदंड को चुनौती दी गई थी। अदालत ने मामले के तथ्यों, दोषसिद्धि के आधार और सजा से संबंधित परिस्थितियों का परीक्षण किया। सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपराध के लिए आरोपी की जिम्मेदारी को बरकरार रखा, लेकिन मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदलने का फैसला किया। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश इस मायने में महत्वपूर्ण है कि अदालत ने दोषसिद्धि और सजा के प्रश्न को अलग-अलग आधार पर देखा। यानी आरोपी को अपराध के लिए दोषी ठहराने का फैसला कायम रहा, लेकिन मृत्युदंड की जगह आजीवन कारावास को उचित सजा माना गया। इस तरह वारिस की दोषसिद्धि बरकरार रहने के साथ उसकी मृत्युदंड की सजा अब आजीवन कारावास में परिवर्तित हो गई है। मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अपने आदेश के जरिए सजा के स्तर पर राहत प्रदान की, जबकि अपराध के संबंध में निचली अदालत द्वारा दर्ज दोषसिद्धि को बरकरार रखा।