law-order

आवासीय इलाकों में नहीं चलेगी व्यावसायिक गतिविधि, उल्लंघन मिला तो पहले सील होगा परिसर: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने आवासीय इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर सख्त निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने कहा कि जहां केवल आवासीय उपयोग की अनुमति है, वहां व्यावसायिक गतिविधि मिलने पर परिसर को पहले चरण में सील किया जाए। सुनवाई के दौरान जयपुर के कोचिंग सेंटरों और कोर्ट की सहायता करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता को मिली धमकी का मुद्दा भी सामने आया।

Sonali28 सित. 2026, 08:42 PM IST
खबर शेयर करें:
आवासीय इलाकों में नहीं चलेगी व्यावसायिक गतिविधि, उल्लंघन मिला तो पहले सील होगा परिसर: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। 

सुप्रीम कोर्ट ने आवासीय उपयोग के लिए निर्धारित इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि जिन क्षेत्रों को विशेष रूप से आवासीय उपयोग के लिए निर्धारित किया गया है, वहां यदि व्यावसायिक गतिविधि पाई जाती है तो संबंधित परिसर को प्रथम दृष्टया सील किया जाए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कार्रवाई में किसी तरह का भेदभाव या ‘पिक एंड चूज’ की नीति बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सुनवाई के दौरान जयपुर में व्यावसायिक क्षेत्रों में संचालित हो रहे कोचिंग सेंटरों का मुद्दा भी सामने आया। कोर्ट ऑफिसर के रूप में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राजदीप रस्तोगी ने अदालत को बताया कि जयपुर में कुछ कोचिंग सेंटर ऐसे व्यावसायिक क्षेत्रों से संचालित हो रहे हैं, जिन्हें सरकार और जयपुर विकास प्राधिकरण ने कोचिंग संस्थानों के लिए निर्धारित नहीं किया है। अधिकारियों ने ऐसे संस्थानों को निर्धारित क्षेत्रों में स्थानांतरित होने के नोटिस भी जारी किए हैं। इसी दौरान राजदीप रस्तोगी ने अदालत को बताया कि जयपुर से लौटते समय उन्हें चार मिस्ड कॉल आए, जिनका उन्होंने जवाब नहीं दिया। उनके साथ यात्रा कर रहे Welfare Society के सचिव ने फोन उठाया तो कॉल करने वाले व्यक्ति ने उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी। इस मामले की पुलिस में शिकायत की गई और 12 सितंबर 2026 को FIR दर्ज हुई।


कोर्ट ने इस बात को गंभीरता से लिया कि FIR दर्ज होने के बावजूद अब तक मामले में कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आ रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोर्ट का कोई अधिकारी या अदालत की सहायता करने वाला व्यक्ति बिना किसी डर या आशंका के अपना काम कर सके, यह सुनिश्चित करना अदालत की जिम्मेदारी है। अदालत ने कहा कि यदि मामले में अधिकारियों की ओर से ढिलाई जारी रही तो राजस्थान के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को तलब कर उनसे स्थिति स्पष्ट करने को कहा जाएगा। हालांकि, राजस्थान सरकार की ओर से पेश वकील ने DGP से बात करने के बाद अदालत को आश्वासन दिया कि मामले में जल्द जरूरी कार्रवाई की जाएगी। इस आश्वासन के बाद कोर्ट ने फिलहाल कोई सख्त आदेश जारी नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट ने इसके साथ ही आवासीय और व्यावसायिक उपयोग से जुड़े मामलों में कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि जिन क्षेत्रों में राज्य सरकार या सक्षम प्राधिकरण ने केवल आवासीय उपयोग की अनुमति दी है, वहां व्यावसायिक गतिविधि नहीं होनी चाहिए। यदि ऐसी गतिविधि पाई जाती है तो परिसर को पहले चरण में सील किया जाएगा।


कोर्ट ने उन क्षेत्रों के संबंध में भी स्थिति स्पष्ट की जहां भूमि या भवन के उपयोग को लेकर मास्टर प्लान में स्पष्ट वर्गीकरण नहीं है। ऐसे मामलों में फिलहाल जमीन पर मौजूदा स्थिति में बदलाव नहीं किया जाएगा, लेकिन कागजी कार्यवाही जारी रहेगी। अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी संपत्ति या भवन को लेकर निजी पक्षों के बीच स्वामित्व विवाद या सरकार और संबंधित पक्ष के बीच कोई मुकदमा लंबित है, तो केवल मुकदमे की लंबितता अवैध उपयोग के खिलाफ कार्रवाई में बाधा नहीं बनेगी। यदि भूमि या भवन का उपयोग उस उद्देश्य के विपरीत पाया जाता है जिसके लिए उसे आवंटित या स्वीकृत किया गया था, तो अधिकारी कानून के अनुसार परिसर को सील कर सकते हैं। पूरी तरह बिना किसी अनुमति के बनाए गए निर्माण के संबंध में कोर्ट ने कहा कि कानून के अनुसार सीलिंग या ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया में तेजी लाई जानी चाहिए। साथ ही, अधिकारियों को कार्रवाई में समानता बरतने का निर्देश दिया गया है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि किसी तरह का पक्षपातपूर्ण या चुनिंदा रवैया सामने आया तो वह मामले को गंभीरता से लेगा।

सुनवाई के दौरान भोपाल में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के कथित तौर पर पूर्ण पालन नहीं होने और सील किए गए परिसरों को कुछ घंटों या दिनों बाद बिना किसी नए घटनाक्रम के दोबारा खोल दिए जाने की जानकारी भी अदालत के सामने रखी गई। कोर्ट ने इस पर भी गंभीरता दिखाई। भोपाल के मास्टर प्लान को लेकर अदालत ने राज्य सरकार को ड्राफ्ट मास्टर प्लान प्रकाशित करने की अनुमति दी है। हालांकि, अंतिम रूप देने से पहले सुप्रीम कोर्ट की अनुमति आवश्यक होगी। कोर्ट ने कहा कि किसी भी संपत्ति या निर्माण के संबंध में यह देखा जाएगा कि वह मौजूदा मास्टर प्लान और सक्षम प्राधिकरण के लागू भवन उपनियमों के अनुरूप है या नहीं। मामले में उत्तराखंड के मुख्य सचिव के खिलाफ अवमानना नोटिस भी जारी किया गया है, क्योंकि राज्य की ओर से न तो पेशी हुई, न 50 हजार रुपये की राशि जमा की गई और न ही आवश्यक हलफनामा दाखिल किया गया था। मुख्य सचिव को अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर स्थिति स्पष्ट करने वाला शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अगली सुनवाई से एक सप्ताह पहले अद्यतन स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर 2026 को दोपहर 2 बजे होगी।