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किसी के खिलाफ केस दर्ज कराने भर से IPC 306 का अपराध नहीं बनता: बॉम्बे HC

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ कानून के तहत कई शिकायतें या कानूनी कार्यवाही शुरू करना मात्र आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संबंधित व्यक्ति द्वारा बाद में आत्महत्या कर लेने भर से शिकायतकर्ता पर IPC की धारा 306 के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

Sonali06 अक्टू. 2026, 07:25 PM IST
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किसी के खिलाफ केस दर्ज कराने भर से IPC 306 का अपराध नहीं बनता: बॉम्बे HC

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ कानून के तहत लगातार या कई कानूनी कार्यवाही शुरू करना अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बनता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि उस व्यक्ति के खिलाफ शिकायत या कानूनी कार्रवाई के बाद संबंधित व्यक्ति आत्महत्या कर लेता है, तो केवल इस आधार पर शिकायतकर्ता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। जस्टिस आर.एम. जोशी की पीठ ने कहा कि कानून के अनुसार अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही शुरू करना और बाद में उस व्यक्ति द्वारा आत्महत्या कर लेना, आत्महत्या के लिए उकसाने की कानूनी कसौटी को पूरा नहीं करता। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध को साबित करने के लिए आरोपी की ओर से ऐसा प्रत्यक्ष या जानबूझकर किया गया कृत्य दिखाना जरूरी है, जिससे मृतक को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने या मजबूर करने की मंशा साबित हो। केवल कानूनी कार्यवाही शुरू करना इस अपराध के लिए पर्याप्त नहीं है।


हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कानून के तहत किसी व्यक्ति के खिलाफ शिकायत या आपराधिक कार्यवाही शुरू करने वाले व्यक्ति को बाद में आत्महत्या के मामले में आरोपी बनाया जाने लगे, तो इससे कानून का इस्तेमाल करने वाले लोगों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसी परिस्थितियों में लोग अपराध या गलत कार्यों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने से भी डर सकते हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि IPC की धारा 306 के तहत अभियोजन के लिए केवल आत्महत्या और आरोपी के किसी पुराने कृत्य के बीच संबंध होना पर्याप्त नहीं है। अभियोजन पक्ष को यह स्थापित करना होगा कि आरोपी ने आत्महत्या के लिए उकसाया, साजिश में भाग लिया या जानबूझकर ऐसा कृत्य किया जो आत्महत्या के लिए प्रेरित करने की श्रेणी में आता है। बॉम्बे हाईकोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण है, जहां किसी व्यक्ति द्वारा की गई कानूनी कार्यवाही के बाद संबंधित व्यक्ति आत्महत्या कर लेता है और शिकायतकर्ता पर आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया जाता है। अदालत ने इस बात को रेखांकित किया कि कानून के अनुसार की गई वैध कार्यवाही को महज उसके बाद हुई आत्महत्या के कारण आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं माना जा सकता।