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Mental Disability वाले आरोपी के डिस्चार्ज मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने ट्रायल कोर्ट का आदेश किया रद्द

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने मानसिक अक्षमता से जुड़े एक आरोपी के डिस्चार्ज आवेदन पर ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया है। जस्टिस मेहरोज के. पठान ने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट और तीन डॉक्टरों की गवाही से आरोपी के अपने बचाव में सक्षम नहीं होने की बात सामने आई थी, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने इन सबूतों पर उचित विचार नहीं किया। हाईकोर्ट ने मामले को दोबारा ट्रायल कोर्ट भेजते हुए दो महीने में फैसला करने का निर्देश दिया है।

Sonali06 अक्टू. 2026, 07:26 PM IST
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Mental Disability वाले आरोपी के डिस्चार्ज मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने ट्रायल कोर्ट का आदेश किया रद्द

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने मानसिक अक्षमता से जुड़े एक मामले में भंडारा के अतिरिक्त सत्र न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया है। जस्टिस मेहरोज के. पठान ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह आरोपी के खिलाफ चार्जशीट में उपलब्ध सामग्री के आधार पर पहले यह तय करे कि प्रथमदृष्टया मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार है या नहीं। इसके बाद आरोपी की मानसिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए CrPC की धारा 330(3) के तहत उसकी रिहाई के संबंध में फैसला किया जाए। मामला अपराध क्रमांक 407/2023 से जुड़ा है, जिसमें आरोपी के खिलाफ IPC की धाराओं 323, 354 और 354A के साथ POCSO Act की धाराओं 8, 10 और 12 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। आरोपी ने CrPC की धारा 227 के तहत डिस्चार्ज आवेदन दाखिल किया था। उसका कहना था कि वह मानसिक रूप से सक्षम नहीं है और अपने कृत्य के परिणामों को समझने तथा मुकदमे में अपना बचाव करने की स्थिति में नहीं है। ट्रायल कोर्ट ने 4 अगस्त 2025 को उसका आवेदन खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट के समक्ष रिकॉर्ड से पता चला कि सिविल सर्जन, भंडारा ने आरोपी की मनोचिकित्सकीय जांच कर रिपोर्ट दी थी। रिपोर्ट में आरोपी को ‘माइल्ड इंटेलेक्चुअल डिसेबिलिटी’ से पीड़ित बताया गया था। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने तीन डॉक्टरों- डॉ. अरविंद साखरे, डॉ. सतीश भगत और डॉ. वीरेंद्र बंटे- की गवाही भी दर्ज की थी। हाईकोर्ट ने तीनों डॉक्टरों की गवाही और मेडिकल रिपोर्ट का विस्तार से अध्ययन किया। कोर्ट ने पाया कि तीनों डॉक्टरों की गवाही में यह बात सामने आई थी कि आरोपी अपने कृत्य के परिणामों को समझने में सक्षम नहीं था और स्वतंत्र रूप से अपना बचाव नहीं कर सकता था। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि एक डॉक्टर के अनुसार आरोपी का IQ 68 था। दूसरे डॉक्टर ने कहा कि आरोपी सवालों को समझकर तार्किक जवाब देने की स्थिति में नहीं था। डॉक्टर ने उसकी शारीरिक उम्र करीब 20 वर्ष, जबकि मानसिक उम्र लगभग 14 वर्ष बताई थी। जस्टिस मेहरोज के. पठान ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट और तीनों डॉक्टरों की गवाही पर उचित तरीके से विचार नहीं किया। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की यह टिप्पणी भी गलत मानी कि सभी डॉक्टरों की राय आरोपी के मानसिक रूप से अस्वस्थ होने के संबंध में एक जैसी नहीं थी। कोर्ट ने CrPC की धारा 329 और 330 का भी उल्लेख किया। धारा 329 के तहत यदि कोर्ट को पता चलता है कि आरोपी मानसिक रूप से अस्वस्थ है और अपने बचाव में सक्षम नहीं है, तो कोर्ट को उसकी मानसिक स्थिति निर्धारित करनी होती है। यदि आरोपी बचाव करने में असमर्थ पाया जाता है, तो कोर्ट को यह भी देखना होता है कि उसके खिलाफ प्रथमदृष्टया पर्याप्त मामला बनता है या नहीं। हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 329(2) के तहत डिस्चार्ज की स्थिति में भी कोर्ट को अभियोजन के रिकॉर्ड की जांच करनी होगी। वहीं, धारा 330(3) के तहत आरोपी की मानसिक स्थिति और कथित कृत्य की प्रकृति को देखते हुए उसकी रिहाई के संबंध में निर्णय लिया जा सकता है। हाईकोर्ट ने 4 अगस्त 2025 का ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए मामला वापस भेज दिया। ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह पहले चार्जशीट में उपलब्ध सामग्री के आधार पर प्रथमदृष्टया पर्याप्त आधार होने या न होने का निर्णय करे और इसके बाद धारा 330(3) के तहत आगे की कार्रवाई तय करे। कोर्ट ने यह पूरी प्रक्रिया दो महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया है।