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20 साल पुराने किराया विवाद में कल्याण कोर्ट का फैसला, किरायेदार को एक महीने में मकान खाली करने का आदेश
कल्याण कोर्ट ने करीब 20 साल पुराने किराया विवाद में मकान मालिक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए किरायेदार को विवादित मकान एक महीने के भीतर खाली करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने माना कि किरायेदार ने महाराष्ट्र भाड़े नियंत्रण अधिनियम के तहत बकाया किराए के भुगतान संबंधी आवश्यक शर्तों का पालन नहीं किया। हालांकि, कोर्ट ने मकान मालिक द्वारा मांगी गई 46,878 रुपये की पूरी बकाया राशि को स्वीकार नहीं किया।

कल्याण की अदालत ने करीब 20 साल से लंबित नियमित दिवाणी दावा क्रमांक 343/2006 में 24 सितंबर 2026 को फैसला सुनाते हुए मकान मालिक के पक्ष में आंशिक रूप से आदेश पारित किया है। सह दिवाणी न्यायाधीश कनिष्ठ स्तर, कल्याण संतोष ह. आगे ने किरायेदार को विवादित मकान का खाली कब्जा आदेश की तारीख से एक महीने के भीतर मकान मालिक को सौंपने का निर्देश दिया है। यह मामला डोंबिवली पूर्व के गोग्रासवाडी स्थित भाग्यलक्ष्मी निवास की चौथी मंजिल पर स्थित सदनिका क्रमांक 18 से जुड़ा है। वादी मल्लेश भीमय्या बादरमेना ने वर्ष 2006 में किराया वसूलने और मकान का कब्जा वापस लेने के लिए मुकदमा दायर किया था।
मामले में प्रतिवादी दिनेश हरीशंकर पंडया को किरायेदार बताया गया था। वादी का दावा था कि मकान का मासिक किराया 434 रुपये और महानगरपालिका कर, पानी बिल तथा प्रमाणित वृद्धि मिलाकर कुल 601 रुपये प्रतिमाह था। वादी के अनुसार प्रतिवादी ने अक्टूबर 1999 से किराया और कर का भुगतान नहीं किया था और 78 महीने की कुल 46,878 रुपये की बकाया राशि हो गई थी। इस संबंध में वादी ने 12 अप्रैल 2006 को कानूनी नोटिस भेजकर बकाया किराए की मांग की थी। वहीं, किरायेदार ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि वास्तविक किराया 334 रुपये और महानगरपालिका कर 167 रुपये यानी कुल 501 रुपये प्रतिमाह था। उसने यह भी दावा किया कि उसने अक्टूबर 1999 से मार्च 2006 तक का किराया चुकाने के लिए नोटिस के जवाब के साथ 26,250 रुपये का भुगतान किया था। इसके अलावा महानगरपालिका कर का भुगतान भी खुद करने की बात कही गई। अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद किराया रसीदों का अवलोकन करते हुए माना कि विवादित संपत्ति का मासिक किराया 501 रुपये था। कोर्ट ने कहा कि 601 रुपये मासिक किराया होने के संबंध में वादी ने मौखिक बयान के अलावा पर्याप्त दस्तावेजी साक्ष्य पेश नहीं किया। इसलिए 601 रुपये मासिक किराए का दावा स्वीकार नहीं किया गया। हालांकि, कोर्ट ने यह भी पाया कि किरायेदार ने महाराष्ट्र भाड़े नियंत्रण अधिनियम की धारा 15(2) और 15(3) की आवश्यकताओं का पालन नहीं किया। कोर्ट के अनुसार, नोटिस मिलने के बाद निर्धारित अवधि में पूरी बकाया राशि जमा नहीं की गई थी। बाद में मुकदमे के दौरान अलग-अलग वर्षों में किराए का भुगतान किया गया, लेकिन भुगतान नियमित रूप से नहीं हुआ।
अदालत ने यह भी माना कि वादी द्वारा 12 अप्रैल 2006 को भेजी गई किराया मांग की नोटिस प्रतिवादी को विधिवत प्राप्त हुई थी। कोर्ट ने पाया कि दावा दाखिल किए जाने के समय वास्तविक बकाया राशि वादी द्वारा मांगी गई 46,878 रुपये नहीं, बल्कि 16,150 रुपये थी। हालांकि, अदालत ने यह भी पाया कि प्रतिवादी ने नोटिस के जवाब के साथ 26,250 रुपये का भुगतान कर दिया था। इसके कारण वादी की बकाया किराया राशि की मांग उस सीमा तक कायम नहीं रही। अदालत ने 2006 में दायर दावे में limitation के आधार पर भी केवल तीन वर्ष की बकाया राशि पर विचार किया। कब्जे के संबंध में कोर्ट ने कहा कि किरायेदार बकाया किराएदार साबित हुआ है और किराया मांगने की नोटिस भी विधिवत तामील हुई थी। इसलिए उसे महाराष्ट्र भाड़े नियंत्रण कानून के तहत संरक्षण नहीं मिल सकता और वादी विवादित संपत्ति का कब्जा वापस लेने का हकदार है।
अदालत ने वादी का दावा आंशिक रूप से मंजूर करते हुए प्रतिवादी को आदेश की तारीख से एक महीने के भीतर विवादित मकान का खाली और शांतिपूर्ण कब्जा वादी को सौंपने का निर्देश दिया। अदालत में जमा किराए की राशि, यदि वादी ने पहले प्राप्त नहीं की है, तो अपील की अवधि समाप्त होने के बाद उसे देने का आदेश भी दिया गया है।
मामले में वादी की ओर से अधिवक्ता एच.वी. पाठक और प्रतिवादी की ओर से अधिवक्ता डी.आर. शाह ने पैरवी की।
न्यायनिर्णय की तारीख: 24 सितंबर 2026
न्यायालय: सह दिवाणी न्यायाधीश कनिष्ठ स्तर, कल्याण, जिला ठाणे
केस नंबर: नियमित दिवाणी दावा क्र. 343/2006
दावा: किराया वसूली एवं कब्जा प्राप्त करने के लिए
