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20 साल पुराने फर्जी राशन कार्ड मामले में कल्याण कोर्ट का फैसला, दो आरोपी बरी और तीन को किया डिस्चार्ज

कल्याण कोर्ट ने करीब 20 साल पुराने फर्जी राशन कार्ड और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी के मामले में दो आरोपियों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि आरोपियों ने फर्जी दस्तावेज तैयार किए या उनका इस्तेमाल किया था। वहीं, मामले में फरार तीन आरोपियों को भी उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर डिस्चार्ज कर दिया गया।

Sonali29 सित. 2026, 08:42 PM IST
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20 साल पुराने फर्जी राशन कार्ड मामले में कल्याण कोर्ट का फैसला, दो आरोपी बरी और तीन को किया डिस्चार्ज

कल्याण।

करीब 20 साल पुराने फर्जी राशन कार्ड और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी के मामले में कल्याण कोर्ट ने दो आरोपियों को बरी कर दिया है। प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी, प्रथम न्यायालय, कल्याण की पीठासीन अधिकारी आरती मा. शिंदे ने 28 सितंबर 2026 को यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त और ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सका। वहीं, मामले में फरार घोषित किए गए तीन अन्य आरोपियों को भी उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर दोषमुक्त (Discharge) कर दिया गया। यह मामला नियमित फौजदारी खटला क्र. 431/2006 और महात्मा फुले चौक पुलिस स्टेशन के गुन्हा रजिस्टर क्र. II-198/2005 से संबंधित था। आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 465, 467, 468, 471 सहपठित धारा 34 और लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत मामला चलाया गया था।


क्या था पूरा मामला?

अभियोजन पक्ष के अनुसार 20 मई 2005 से 6 जून 2005 के बीच कल्याण तहसील कार्यालय में चुनाव आयोग के निर्देशों के तहत मतदाता सूची में नए नाम जोड़ने, नामों में सुधार, मतदाताओं के स्थानांतरण और उम्र में संशोधन से संबंधित प्रक्रिया चल रही थी। इस दौरान मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए आवेदकों से निवास का प्रमाण मांगा गया था। जांच के दौरान कथित तौर पर सामने आया कि एक ही राशन कार्ड की प्रतियां करीब 25 अलग-अलग परिवारों के लिए प्रस्तुत की गई थीं। इन प्रतियों पर एक नगरसेविका और पांच एससीओ अधिकारियों के हस्ताक्षर होने की बात सामने आई थी। इसी आधार पर तहसील कार्यालय के तत्कालीन अधिकारी ने मामले की शिकायत पुलिस में दर्ज कराई थी। शिकायत के आधार पर महात्मा फुले चौक पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी, फर्जी दस्तावेज तैयार करने और उनका इस्तेमाल करने सहित विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया। पुलिस ने जांच के बाद आरोपपत्र दाखिल किया।


अभियोजन ने सिर्फ एक गवाह पेश किया

अदालत के समक्ष अभियोजन पक्ष ने केवल एक गवाह, अरुण विठ्ठल कनोजे, की गवाही दर्ज कराई। वह घटना के समय कल्याण तहसील कार्यालय में नायब तहसीलदार के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने बताया कि जांच के दौरान उन्हें एक ही राशन कार्ड की प्रतियां अलग-अलग परिवारों के लिए इस्तेमाल किए जाने की जानकारी मिली थी। हालांकि, अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष उस कथित राशन कार्ड की मूल या प्रमाणित प्रति भी रिकॉर्ड पर पेश नहीं कर सका। यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि आरोपियों ने कौन से राशन कार्ड की प्रतियों को प्रमाणित किया था और कथित फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किस तरह किया गया।


अदालत ने कहा- मौखिक बयान को दस्तावेजी सबूत का समर्थन नहीं

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आरोप मुख्य रूप से दस्तावेजी साक्ष्य पर आधारित थे। केवल शिकायतकर्ता के मौखिक बयान के आधार पर यह साबित नहीं किया जा सकता कि आरोपियों ने फर्जी राशन कार्ड तैयार किए या उनका इस्तेमाल किया।  अदालत ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता ने स्वीकार किया था कि उन्होंने आरोपियों को व्यक्तिगत रूप से नहीं देखा था। इसके अलावा, जिन 25 राशन कार्ड प्रतियों का उल्लेख किया गया, उनमें से किसी एक की प्रति भी अदालत के रिकॉर्ड पर पेश नहीं की गई।

कोर्ट ने माना कि उपलब्ध साक्ष्य आरोपियों के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसलिए आरोपी नंबर 1 नंद शांताराम म्हात्रे और आरोपी नंबर 5 अरुणा तुकाराम भगत को भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं और लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 31 के आरोपों से बरी कर दिया गया।


तीन फरार आरोपियों को भी डिस्चार्ज

मामले में आरोपी नंबर 2 शंकर लक्ष्मण पाटील, आरोपी नंबर 3 जगदीश कडुराम उपाध्याय और आरोपी नंबर 4 पुष्पा दीपक पाटील फरार थे और उन्हें प्रोक्लेम्ड ऑफेंडर घोषित किया गया था। अदालत ने कहा कि इन तीनों आरोपियों के खिलाफ भी वही साक्ष्य उपलब्ध होने थे, जो आरोपी नंबर 1 और 5 के खिलाफ थे। चूंकि मौजूदा साक्ष्य पहले दो आरोपियों को दोषी ठहराने के लिए ही पर्याप्त नहीं थे, इसलिए उन्हीं साक्ष्यों के आधार पर फरार आरोपियों को मामले में आगे अभियोजन का सामना कराना उचित नहीं होगा। अदालत ने तीनों को भी धारा 239 सीआरपीसी के तहत संबंधित आरोपों से डिस्चार्ज कर दिया। इस तरह 28 सितंबर 2026 को दिए गए फैसले में करीब 20 साल पुराने इस मामले में आरोपी नंबर 1 और 5 को बरी करते हुए आरोपी नंबर 2, 3 और 4 को भी दोषमुक्त कर दिया गया।